उदारीकरण और कोयला प्रेस का जमाना

भूपेन सिंह

"...कोयला घोटाले में शामिल चार मीडिया कंपनियों का जायया लिया जाए तो यह बात साबित हो जाएगी कि किस तरह कॉरपोरेटमीडिया और सरकार को चला रहे हैं. इससे कॉरपोरेट साजिशों को समझना भी और आसान होगा..."

भारत में कोयला घोटाले ने एक बार फिर तथाकथित लोकतांत्रिक संस्थाओं के चेहरे से नकाब हटाने के काम किया है. एक लाख छियासी हज़ार करोड़ की कोयले की दलाली में केंद्र और राज्य सरकारों के साथ पक्ष-विपक्ष के कई नेता तो कटघरे में हैं ही, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का दम भरने वाला समाचार मीडिया भी इससे अछूता नहीं है. इस घोटाले में दैनिक भास्कर चलाने वाली कंपनी डीबी कॉर्प लिमिटेड, प्रभात ख़बर की मालिक कंपनी ऊषा मार्टिन लिमिटेड, लोकमत समाचार ग्रुप और इंडिया टुडे ग्रुप में बड़ी हिस्सेदारी रखने वाले आदित्य बिड़ला ग्रुप का नाम सामने आया है. छोटी-छोटी बातों पर बड़ी-बड़ी बहस चलाने वाला सरकारी और कॉरपोरेट मीडिया इन कंपनियों की करतूत पर या तो चुप्पी साधे खड़ा है या ख़बर को घुमा-फिराकर पेश कर रहा है.

मार्च दो हज़ार बारह में सरकारी ऑडिटरभारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में कोयला खदान आवंटन में हुई गड़बड़ी सामने आई तो इसमें कई मीडिया कंपनियों के शामिल होने की चर्चाएं भी थीं. आख़िरकार इंटर मिनिस्टीरियल ग्रुप (अंतर मंत्रिमंडलीय समूह) की बैठक में यह साफ़ हो गया कि कौन-कौन सी मीडिया कंपनियां इस घोटाले में शामिल हैं. इस घटना से एक बार फिर यह साफ़ हो गया है कि किस तरह कॉरपोरेट मीडिया जनता के साथ धोखेबाज़ी करता है. पहले भी टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले और कॉमनवेल्थ घोटाले में मीडिया की आपराधिक भूमिका सामने आ चुकी है. यह इस बात का भी उदाहरण है कि किस तरह भारतीय लोकतंत्र का प्रहरी (वॉच डॉग) ख़ुद लूट में शामिल होकर लोकतंत्र का मजाक बना रहा है. सीएजी की रिपोर्ट से पता चलता है कि दो हज़ार चार से दो हज़ार नौ के दौरान हुए कोयला खदानों के आवंटन में भारी घोटाला किया गया. रिपोर्ट कहती  है कि सरकार ने को औने-पौने दामों में कोयला खदानों को निजी कंपनियों के हवाले कर दिया. इस भ्रष्टाचार से सरकारी खजाने को एक लाख छियासी हज़ार करोड़ की रकम का नुकसान हुआ. यह घोटाला इस बात का भी पुख्ता सबूत है कि देश के बहुराष्ट्रीय व्यापारी घराने सरकारी नीतियों को मन मुताबिक़ तोड़ने-मोड़ने किस तरह जुटे हुए हैं.

यह बात जग ज़ाहिर है कि विज्ञापन और अन्य प्रलोभनों के चलते समाचार मीडिया लगातार पूंजीपतियों के हाथ की कठपुतली बना रहता है. पूंजीपति भी अपने पक्ष में जनमत बनाने और सत्ता पर प्रभाव जमाने में मीडिया की भूमिका से अनजान नहीं हैं, इसलिए कई पूंजीपति सीधे मीडिया को अपने नियंत्रण में ले लेते हैं. कोयला घोटाले में फंसी कंपनियों ने भी इसी रणनीति के तहत मीडिया को अपने कब्ज़े में लिया है, उनके गैरकानूनी काम इस बात की खुलेआम गवाही देते हैं. यह कॉरपोरेट मीडिया का ही कमाल है कि कोयला घोटाले की पोल खुलने के बाद भी बहस सिर्फ़ कोयला खदानों के आवंटन में हुई गड़बड़ी पर केंद्रित है. यह सवाल नही उठाया जा रहा है कि आख़िर कोयला खदानों को निजी हाथों में सौंपने की ज़रूरत ही क्या है इस तरह के नीतिगत सवाल कॉरपोरेट मीडिया के ख़िलाफ़ जाते हैं इसलिए वह मरे मन से सिर्फ़ आवंटन का सवाल उठा रहा है (ऐसा करना उसकी विश्वसनीयता को बरकरार रखने के लिए ज़रूरी है, बिना विश्वसनीयता के बाज़ार में टिकना उसके लिए मुश्किल है). कॉरपोरेट  का धंधा अपराध के बिना चलना कठिन है. वे ख़ुद उन नियमों का भी पालन नहीं करते जो उनके पक्षधर नीति निर्माताओं ने उन्ही के लिए बनाई होती हैं. वरना कोयला खदानों की खुली नीलामी से उन्हें क्यों दिक्कत होनी चाहिए थीखुली प्रतियोगिता के नाम पर बाजार की माला जपने वालों ने इसमें तो ईमानदारी दिखाई होती?  असल बात तो यह है कि मुनाफ़े की होड़ में शामिल कॉरपोरेट साजिशों का कोई अंत नहीं है और कॉरपोरेट मीडिया भी साजिशों के बिना नहीं चल सकता.


कोयला घोटाले में शामिल चार मीडिया कंपनियों का जायया लिया जाए तो यह बात साबित हो जाएगी कि किस तरह कॉरपोरेट, मीडिया और सरकार को चला रहे हैं. इससे कॉरपोरेट साजिशों को समझना भी और आसान होगा. पहले बात करते हैं लोकमत ग्रुप की. यह अख़बार अपने प्रसार के हिसाब से मराठी का सबसे बड़ा अख़बार है. महाराष्ट्र के कई ज़िलों से इसका प्रकाशन होता है. मराठी के अलावा हिंदी में भी लोकमत समाचार प्रकाशित होता है. इस कंपनी का रिश्ता मुकेश अंबानी-राघव बहल-राजदीप सरदेसाई से भी है, मराठी न्यूज़ चैनल आइबीएन-लोकमत इसका उदाहरण है. लोकमत के मालिक विजय दर्डा कांग्रेस पार्टी के सांसद भी हैं और कंपनी के दूसरे मालिक और विजय के भाई राजेंद्र दर्डा महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार में शिक्षा मंत्री हैं. विजय दर्डा पत्रिकारिता के उसूलों की धज्जियां उड़ाते हुए पत्रकार, व्यापारी और राजनीतिज्ञ एक साथ हैं. उन्हें उऩ्नीस सौ नब्बे-इक्यानबे में फिरोज़ गांधी मेमोरियल अवॉर्ड फॉर एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म मिल चुका है. इसके अलावा उन्नीस सौ सतानबे में जायंट इंटरनेशनल जर्नलिज्म अवॉर्ड और दो हज़ार छह में ब्रिजलालजी बियानी जर्नलिज्म अवॉर्ड भी मिला हुआ है.

विजय दर्डा मीडिया मालिकों के प्रभाव वाली संस्था ऑडिट ब्यूरो ऑफ़ सर्कुलेशन के अध्यक्ष रहने के अलावा इंडियन न्यूज़पेपर सोसायटी के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. ये दोनों संस्थाएं मीडिया मालिकों के प्रभाव वाली संस्थाएं हैं आम पत्रकारों की इनमें कोई पूछ नहीं. ज़्यादा वक़्त नहीं बीता जब श्रमजीवी पत्रकारों ने वेजबोर्ड की सिफारिशें लागू करने की मांग की थी तो इंडियन न्यूज़पेपर सोसायटी प्रेस मालिकों की तरफ़ से पत्रकारों के ख़िलाफ़ अभियान चलाने उतर पड़ी थी. दर्डा साउथ एशियन एडिटर्स फोरम के अध्यक्ष रहकर भी उसे धन्य कर चुके हैं. भारत में प्रेस की नैतिकता को बनाये रखने वाली संस्था प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया (पीसीआइ) के सदस्य रहकर भी उन्होंने पत्रकारीय नैतिकता की रक्षा की है! वर्ल्ड न्यूज़ पेपर एसोसिएशन के सदस्य होने के साथ और भी कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठनों के सदस्य हैं. कुल मिलाकर पत्रकारिता के नाम पर मालिक होकर भी जितने फ़ायदे हो सकते हैं उन्होंने दोनों हाथों से बटोरे है. फिर, कोयले पर तो उनका हक़ बनता ही था! जब पेड न्यूज का मामला जोर-शोर से उठ रहा था तब लोकमत का नाम उसमें सबसे ऊपर था. अब कोयला घोटाले में भी विजय दर्डा और राजेंद्र दर्डा आरोपी कंपनी जेडीएस यवतमाल कंपनी के मालिक/डायरेक्टर होने के साथ ही दूसरी आरोपी कंपनी जैस इंफ्रास्क्चर के भी सात फ़ीसदी के मालिक हैं.

दूसरी मीडिया कंपनी है दैनिक भास्कर अख़बार को प्रकाशित करने वाली कंपनी डीबी कॉर्प लिमिटेड. दैनिक भास्कर के उत्तर भारत के सात राज्यों से कई संस्करण प्रकाशित होते हैं. यह दैनिक जागरण के बाद  हिंदी का दूसरा सबसे बड़ा अख़बार है. डीबी स्टार, बिजनेस भास्कर, गुजराती में दिव्य भास्कर और अहा ज़िंदगी पत्रिका भी इसी के प्रकाशन हैं. चार राज्यों से निकलने वाले अंग्रेजी अख़बार डीएनए में भी इसकी हिस्सेदारी है. भोपाल के गिरीश, रमेश, सुधीर और पवन अग्रवाल कंपनी के मालिक है. पिछले कुछ वर्षों में दैनिक भास्कर मीडिया बाज़ार में अपनी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों को किनारे लगाते हुए बड़ी तेज़ी से उभरा है. मार्केटिंग का हर हथकंडा अपनाते हुए इसने उत्तर भारत में अपने लिए एक ख़ास जगह बनाई है लेकिन इसके कर्मचारियों और पत्रकारों पर छंटनी की तलवार  हमेशा लटकी रहती है. प्रबंधन की नीतियों के मुताबिक़ उनकी नौकरी कभी भी छीनी जा सकती है. डीबी कॉर्प के चार भाषाओं में प्रकाशित होने वाले अख़बारों के उनहत्तर संस्करण और एक सौ पैंतीस उप-संस्करण जनता के बीच पहुंचते हैं. कंपनी माई एफएम नाम से देश के सत्रह शहरों से रेडियो भी संचालित करती है.

डीबी कॉर्प का धंधा सिर्फ़ मीडिया ही नहीं है. इसकी मौज़ूदगी और भी कई धंधों में है. भारतीय बाज़ार के रेग्युलेटर सेक्योरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ़ इंडिया (सेबी) ने इस कंपनी की वित्तीय स्थिति के बारे में कहा  है कि इसके पास उनहत्तर अन्य कंपनियों का मालिकाना भी है. जिनमें खनन, ऊर्जा उत्पादन, रियल एस्टेट और टैक्सटाइल जैसे कई धंधे शामिल हैं. कहा जाता है कि कंपनी ने भोपाल में जो मॉल बनाया है वैसा भव्य मॉल एशिया में और कहीं नहीं है. मुनाफ़ा कमाने के लिए जहां भी इस कंपनी को रास्ता दिखता है ये वहीं चल पड़ती है और रास्ते में कोई दिक्कत आ गई तो मीडिया का इतना बड़ा साम्राज्य किस दिन के लिए है!  डीबी कॉर्प के कामों को आगे बढ़ाने में दैनिक भास्कर लगातार उसके साथ रहता है. जहां-जहां कंपनी को धंधा करना होता है वहां से वो अख़बार निकालना नहीं भूलती ताकि जनमत और सत्ता को साधने में आसानी बनी रहे. कोयला घोटाले में नाम आने से पहले ही छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में जनता के विरोध के बावजूद भाजपा सरकार ने इसे 693.2 हेक्टेयर ज़मीन स्वीकृत कर दी, वहां जनता का आक्रोश फूट पड़ा और आख़िरकार छत्तीसगढ़ हाइ कोर्ट ने पाया कि कंपनी ने पर्यावरण के मानकों का बुरी तरह उल्लंघन किया है. कोर्ट ने आदेश दिया कि आगे से इस कंपनी को पर्यावरण मानकों को लेकर हरी झंडी न दी जाए. हाईकोर्ट में कंपनी के ख़िलाफ़ याचिका डालने वाले डीएस मालिया का कहना है कि दैनिक भास्कर ने उनके तथ्यों को झुठलाने के लिए अपने अख़बार के कई पृष्ठ रंग डाले और सही ख़बर को दबाने के लिए हर संभव कोशिश की. दैनिक भास्कर ने राहुल सांस्कृत्यायन के भागो नहीं, दुनिया को बदलो की तर्ज पर अपने लिए जिद करो, दुनिया बदलो की टैग लाइन चुनी है. जिस तरह से भास्कर देश के संसाधनों की लूट में शामिल हो रहा है उससे ज़ाहिर है कि वो कैसी बेशर्म ज़िद का शिकार होकर देश का बेड़ा गर्क करना चाहता है! लोकमत समाचार की तरह ही यह कंपनी भी पेड न्यूज़ छापकर अपना नाम  कमा चुकी है पेड न्यूज़ पर भारतीय प्रेस परिषद की परंजॉय गुहा ठकुरता और के श्रीनिवास रेड्डी वाली रिपोर्ट में इन दोनों कंपनियों का नाम दर्ज है.  

कोयले की दलाली में शामिल तीसरा अख़बार प्रभात ख़बर है. बिहारझारखंड और पश्चिम बंगाल से इसके कई संस्करण निकलते हैं. इसका प्रकाशन उन्नीस सौ चौरासी में खनन  उद्योग से जुड़ी कंपनी उषा मार्टिन लिमिटेड ने शुरू किया. उषा मार्टिन ग्रुप के और भी कई  धंधे हैं. अपने राजनीतिक संपर्कों के लिए पहचाने जाने वाले हरिवंश उन्नीस सौ नवासी से इसके संपादक हैं. चंद्रशेखर के प्रधानमंत्रित्व काल में वे प्रधानमंत्री ऑफिस में पब्लिक रिलेशन का काम भी कर चुके हैं. हरिवंश उषा मार्टिन कंपनी के मालिक प्रशांत झावर के ख़ास आदमी हैं. समाजवादी हलकों में उनका आना-जाना है. अपने संपर्कों की वजह से वे पत्रिकारिता से जुड़ी कई कमेटियों की भी शोभा बढ़ाते हैं. ऊषा मार्टिन कंपनी का मुख्य धंधा बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में ही चलता है. कंपनी पर आरोप लगता रहा है कि इस इलाक़े में अपने धंधे के पक्ष में माहौल बनाने के लिए ही उसने अख़बार का भी सहारा लिया है. कोयला घोटाले में नाम आने से इस सच्चाई पर पक्की मोहर लग जाती है.

चौथी दागी कॉरपोरेट आदित्य बिड़ला ग्रुप है. यह एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कॉन्लोमरेट है जिसका धंधा देश-विदेश में कई क्षेत्रों में फ़ैला हुआ है. यह ग्रुप ख़ाद, रसायन सीमेंट रीटेल, टेलीकॉम जैसे अनगिनत धंधों से जुड़ा हुआ है. हिंडाल्को, आइडिया सेल्यूलर और अल्ट्राटेक सीमेंट इसकी कुछ कंपनियो के नाम हैं. इस ग्रुप ने अरुण पुरी के लिविंग मीडिया इंडिया ग्रुप से 27.5 फीसदी की  हिस्सेदारी है. अरुण पुरी इंडिया टुडे के विभिन्न प्रकाशनों और टीवी टुडे ग्रुप के चैनलों के मालिक हैं, जिनमें आजतक और हेडलाइंस टुडे जैसे चैनल भी शामिल हैं. आदित्य बिड़ला ग्रुप ने मीडिया में क्यों पैसा लगाया है इसके लिए कोई थिसिस लिखने की ज़रूरत नहीं है!

जिन भी कंपनियों का नाम कोयला घोटाले में आया है क्या उनसे उम्मीद की जा सकती है कि वे अपने मालिकाने वाले मीडिया में कोयाला घोटाले को सही तरह से रिपोर्ट कर पाएंगेइस सरल से सवाल के जवाब को आज का मीडिया परिदृश्य काफ़ी कठिन बना ता है जिससे हक़ीक़त पर हमेशा के लिए पर्दा पड़ा रहे. बाज़ार अर्थव्यवस्था जन-पक्षधर नियमों को ढीला किए बिना चल ही नहीं सकती. सरकारें भी कॉरपोरेट दबाव में मीडिया नियमन के सवाल को लगातार अनदेखा करती रहती हैं. इस मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए बड़े-बड़े बिजनेस कॉन्गलोमरेट मीडिया को ख़रीदकर उसकी आड़ में अपने बाक़ी धंधों को चमका रहे हैं. उन्हें ऐसा कदम उठाने से रोकने वाला कोई कानून नहीं है, यही वजह है कि चावल से लेकर सीमेंट का धंधा करने वाली और बिल्डरों से लेकर कोयला बेचने वाली कंपनियां तक मीडिया में पैसा लगा रही हैं. नई आर्थिक नीतियों को अपनाने और तथाकथित सूचना क्रांति के अस्तित्व में आने के बाद सरकारें निजी कंपनियों के सामने ज़्यादा आत्मसमर्पण की मुद्रा हैं. कॉरपोरेट अपराधों के ख़िलाफ़ कोई नियम बनाने से उन्हें लगता है कि इससे देश की ग्रोथ रेट रुक जाएगी, विदेशी निवेश घट जाएगा.

वैसे आज़ादी के बाद से ही व्यापारिक घरानों द्वारा मीडिया को इस्तेमाल करने की शुरूआत हो चुकी थी, इसलिए उस दौरान भारतीय प्रेस को जूट प्रेस भी कहा जाता था. टाइम्स ऑफ़ इंडिया जैसा अख़बार निकालने वाला शाहू जैन परिवार तब जूट मिलें भी चलाया करता था. देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और उनके रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन जूट प्रेस की आलोचना करते रहे लेकिन उन्होंने कभी मीडिया में दूसरे धंधों के मालिकों के आने के ख़िलाफ़ कोई नियम नहीं बना पाए. बाद में भारतीय प्रेस को स्टील प्रेस भी कहा जाने लगा क्योंकि टाटा जैसी कंपनी का तब के प्रभावशाली अख़बार स्टेट्समैन में पैसा लगा था. इसी तरह इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका ने भी उऩ्नीस सौ साठ के दशक में इंडियन आयरन एंड स्टील कंपनी का नियंत्रण अपने हाथ में लेने की कोशिश की थी. धंधेबाज़ कंपनियां हमेशा से अपने व्यापारिक फ़ायदों के लिए मीडिया की मदद से लॉबिंग करती रही हैं. कुछ समय पहले जिस तरह मुकेश अंबानी की कंपनी रियायंस इंडस्ट्रीज ने नेटवर्क 18 और इनाडु का अधिग्रहण किया है उसे भी इसी क्रम मे देखा जा सकता है. इसी तरह कहा जाता है कि कई मीडिया कंपनियों में मुकेश के भाई अनिल अंबानी और रतन टाटा का भी पैसा लगा हुआ है.

भारत में मीडिया के मालिकाने पर बात करते हुए इस बात को ध्यान में रखना ज़रूरी है कि बड़ी पूंजी वाले लोग मीडिया पर पूरी तरह कब्ज़ा जमाना चाहते हैं. अख़बार, टेलीविजन, रेडियो और इंटरनेट से लेकर सभी प्रकार के मीडिया को वे अपने नियंत्रण में ले रहे हैं. मीडिया संकेंद्रण और एकाधिकार की यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे छोटी पूंजी के बल पर निकलने वाले समाचार मीडिया को ख़त्म कर रही है. बड़ी कंपनियां अपने फायदे के मुताबिक़ देश के जनमत को हांकने की प्रवृत्ति से ग्रसित हैं. वे आम जनता  के हितों से जुड़ी ख़बरों को बड़ी आसानी से छुपा देती  हैं और ऊल-जलूल ख़बरों को प्राथमिकता देती  हैं. यही वजह है कि मीडिया में फिल्मी  सितारों, सेलिब्रिटीज और देश की तरक्की की ख़बरें छाई रहती हैं. मीडिया के मालिकाने का कुछ ही बड़ी कंपनियों के पास केंद्रीकरण स्वस्थ देश और समाज के लोकतांत्रिक के लिए बहुत ही ख़तरनाक है. इसका उपाय यही है कि क्रास मीडिया होल्डिंग यानी एक ही मीडिया कंपनी के सभी तरह के मीडिया में पैसा लगाने पर रोक लगाई जाए. एक ही अख़बार को अनगिनत संस्करण निकालने की छूट देकर भी विचारों की विविधता पर चोट न की जाए साथ ही तरह-तरह के धंधों से जुड़े बड़े-बड़े बिजनेस कॉन्गलोमरेट को मीडिया में पूंजी निवेश की अनुमति न दी जाए वरना होगा यही कि पूंजीपति ही मीडिया और देश को चलाते रहेंगे. अमेरिका और ब्रिटेन जैसे पूंजीवादों देशों में भी मीडिया में पूंजी निवेश को लेकर कोई न कोई नियम हैं लेकिन भारत सरकार इस मामले में अब तक सोयी हुई है. फिलहाल देश के प्रिंट मीडिया पर 9 बड़े मीडिया घरानों का प्रभुत्व बना हुआ है. टाइम्स (ऑफ़ इंडिया) ग्रुप, हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप, इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप, द हिंदू ग्रुप, आनंद बाज़ार पत्रिका ग्रुप, मलयाला मनोरमा ग्रुप, सहारा ग्रुप, भास्कर ग्रुप और जागरण ग्रुप ने पूरे मीडिया बाज़ार पर कब्जा कर रखा है. इसी तरह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में स्टार इंडिया, टीवी 18, एनडीटीवी, सोनी, ज़ी ग्रुप, इंडिया टुडे ग्रुप और सन नेटवर्क का बोलबाला है. इस स्थिति को देखकर कहा जा सकता है कि भारत के मीडिया मालिकाने में ऑलिगोपोली (उद्योग में कुछ ही कंपनियों का कब्ज़ा) कती प्रवृत्ति साफ़ झलकती दिखाई दे रही है. यही हाल रहा तो आने वाले वक़्त में पूरी तरह से मीडिया एकाधिकार (मोनोपली) के हालात भी पैदा हो सकते हैं. दो हज़ार नौ में टेलीकॉम रेग्युलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राइ) ने क्रॉस मीडिया ऑनरशिप संकेंद्रण को लेकर अपनी चिंता जताई थी. अपने कन्सल्टेशन पेपर में उसने सख्त नियम बनाने की वकालत भी की थी लेकिन कमज़ोर राजनीतिक इच्छा शक्ति की वजह से इसको लेकर कोई ठोस कानून नहीं बन पाया.

जिस तरह लोकमत, उषा मार्टिन, डीबी कॉर्प और आदित्य बिडला ग्रुप का नाम कोयला घोटाले में आया है उससे सबक लेने की ज़रूरत है कि देश में मीडिया मालिकाने  को लेकर ठोस नियम बनें. जूट प्रेस और स्टील प्रेस की तरह ही कोयला प्रेस भी पत्रकारिता के उसूलों के ख़िलाफ़ है. मीडिया साबुन, तेल या लोहे, सीमेंट का धंधा नहीं है, यह सूचनाओं और विचारों के संचार का साधन है, अगर इसमें व्यापारिक हित हावी होते रहे तो समाज के लोकतांत्रीकरण की प्रक्रिया रुक जाएगी.

भूपेन पत्रकार और विश्लेषक हैं। 
कई न्यूज चैनलों में काम। अभी आईआईएमसी में अध्यापन कर रहे हैं। 
इनसे bhupens@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।