कुंद पड़ा अमेरिकी लोकतंत्र

सत्येंद्र रंजन

"...असली समस्या धन एवं चुनावी फ्रॉड का वो वर्चस्व है, जिसने एक सदी से भी अधिक समय से राजनीति को सिर्फ दो पार्टियों के दायरे में बांट रखा है। उनसे अलग किसी विकल्प की वहां कोई व्यावहारिक उपस्थिति नहीं है। इस साल ऑक्यूपाई वॉल स्ट्रीट आंदोलन ने नई शक्तियों के उदय की उम्मीद जगाई। लेकिन उसे नियंत्रित करने में अमेरिकी शासक वर्ग फिलहाल सफल रहा है।..." 


न् 2000 के राष्ट्रपति चुनाव में अमेरिकी लोकतंत्र की साख में गहरा सुराख़ हुआ। महीने भर से अधिक समय तक चुनाव परिणाम के अधर में रहने के बाद आखिरकार अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तहत फ्लोरिडा राज्य के मतदाताओं के वोट को बिना गिने रिपब्लिकन पार्टी के जॉर्ज डब्लू बुश जूनियर को विजेता घोषित कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट का विचित्र तर्क था कि चूंकि नए राष्ट्रपति के पद संभालने का वक्त करीब आ गया है, इसलिए चुनाव परिणाम को रोके नहीं रखा जा सकता। एक पूरे राज्य के जनादेश की अनदेखी कर- जिससे पलड़ा इधर से उधर होने की स्थिति थी- चुनाव नतीजा घोषित कर देने से ये प्रश्न उठा कि आखिर अमेरिकी लोकतंत्र में मतदाता का कितना महत्त्व है? आखिर वयस्क मताधिकार पर आधारित व्यवस्थाओं का यह आधार सिद्धांत है कि एक-एक वोट की कीमत है। फ्लोरिडा में विवाद वोटों की गिनती में कथित धोखाधड़ी से उठा, लेकिन उसकी पृष्ठभूमि कहीं बड़ी थी। उस राज्य में जॉर्ज बुश के भाई जेब बुश गवर्नर थे। आरोप था कि उनके प्रशासन ने मतदाता सूची बनाने के दौरान ऐसे तरीके अपनाए, जिनसे अश्वेत, समलैंगिक, महिला और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के लिए बतौर मतदाता अपना नाम दर्ज कराना कठिन हो गया। फिर मतदान केंद्रों की जगह इस तरह चुनी गई कि इन वर्गों के लोगों के लिए वोट डालना कठिन हो जाए। गौरतलब है कि इन समुदायों का बहुमत डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ रहता है। फिर मतगणना के दौरान भी गड़बड़ी के आरोप लगे, जिसमें जॉर्ज बुश को 537 वोटों से विजेता घोषित कर दिया गया। डेमोक्रटिक पार्टी ने दोबारा मतगणना अथवा मतदान की मांग की, जिसे ठुकरा दिया गया। इसीलिए आज भी अमेरिका और दुनिया में लाखों लोग ये मानते हैं कि सन् 2000 का चुनाव डेमोक्रेट एल गोर से जबरन छीन लिया गया था।


मगर यह घटना इस कहानी का अंतिम अध्याय नहीं है। बल्कि कहा तो ये जा सकता है कि रिपब्लिकन पार्टी ने ‘फ्लोरिडा के फ्रॉ़ड’ को सफलता का फॉर्मूला मान लिया। पिछले चार वर्षों में विभिन्न राज्यों में रिपब्लिकन सरकारों ने खास वर्ग के मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने के लिए अनेक कानून पास किए हैं। इनमें अफ्रीकी अमेरिकी समुदाय के लोगों- खासकर महिलाओं को निशाना बनाया गया है। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ लॉ के ब्रेनन सेंटर फॉर जस्टिस के मुताबिक 2011 में 16 राज्यों ने मतदान को प्रतिबंधित करने वाले कानून पास किए। इन राज्यों से राष्ट्रपति निर्वाचन मंडल के के 214 प्रतिनिधि चुने जाने हैं। नए कानूनों के जरिए नए वोटरों के नाम दर्ज कराने की राह में अवरोध खड़े किए गए, मतदाताओं की पहचान के नए एवं महंगे फॉर्म के प्रावधान किए गए और कुछ कानूनों के जरिए मतदान के समय सरकार द्वारा जारी पहचान पत्र लाना अनिवार्य कर दिया गया। ब्रेनन सेंटर के मुताबिक, “मतदान में अवरोध की मुहिम एवं इसके संभावित प्रभाव का दायरा व्यापक है... 11 प्रतिशत वैध मतदाताओं के पास, जिनकी संख्या मोटे तौर पर दो करोड़ दस लाख है, सरकार द्वारा जारी नया या ऐसा फोटो पहचान-पत्र नहीं है, जिसकी अवधि समाप्त नहीं हो गई हो। बुजुर्गों, अफ्रीकी अमेरिकियों एवं अन्य अल्पसंख्यकों, मेहनतकश तबकों, विकलांगों और छात्रों में यह प्रतिशत और भी ऊंचा है, जो परंपरागत रूप से डेमोक्रेटिक पार्टी के वोटर हैं और जिनके मताधिकार से वंचित रहने का किसी कड़े संघर्ष वाले चुनाव में निर्णायक परिणाम हो सकता है।”          

वेबसाइट ओपनडेमोक्रेसी.नेट पर प्रकाशित एक लेख में रुथ रोजेन ने लिखा- “1980 के बाद से अफ्रीकी अमेरिकी महिलाओं ने उस लैंगिंक खाई (जेंडर गैप) का निर्माण करने में निर्णायक भूमिका निभाई है, जिससे डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपतियों के निर्वाचन में मदद मिली है। 2012 में अकेली रहने वाली और बुजुर्ग महिलाओं के अलावा इन महिलाओं को भी संभवतः (बराक) ओबामा की स्वास्थ्य देखभाल (हेल्थ केयर) योजना, महिलाओं के प्रजनन अधिकारों, गर्भपात के अधिकार, नियोजित मातृत्व योजना, सामाजिक सुरक्षा एवं मेडिकेयर की रक्षा करने से वंचित कर दिया जाएगा। ये वो सुरक्षा कवच हैं, जिन्हें खत्म करने या बुनियादी रूप से उन्हें बदल देने के लिए (राष्ट्रपति एवं उप-राष्ट्रपति पद के) रिपब्लिकन उम्मीदवारों (मिट) रोमनी- (पॉल) रेयान ने अभियान छेड़ा हुआ है।”      

पेनसिलवेनिया राज्य में मतदाता पहचान पत्र को अनिवार्य बनाने के फैसले को जब वहां के एक न्यायाधीश ने वैध ठहरा दिया, तो न्यूयॉर्क टाइम्स ने उसकी आलोचना करते हुए लिखा- “इससे नवंबर के चुनाव में राज्य के हजारों गरीब एवं अल्पसंख्यक निवासी मताधिकार से वंचित हो सकते हैं।” अखबार ने चेतावनी दी कि “अब बहुत से मतदाता कभी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा नहीं ले पाएंगे। जो बाधाएं खड़ी की गई हैं, कई मतदाता उनसे उबरने को अनिच्छुक होंगे और मतदान केंद्रों पर नहीं जाएंगे, जबकि दूसरे कई मतदाता वोट डालने की कोशिश करेंगे, लेकिन पाएंगे कि उनके मतपत्र नामंजूर कर दिए गए हैं।” गौरतलब तथ्य यह है कि रिपब्लिकन नेता खुलेआम चुनाव जीतने की इस रणनीति को स्वीकार करते रहे हैं। 2009 में फ्लोरिडा के रिपल्किन पार्टी के अध्यक्ष जिम ग्रीयर ने माना था कि पार्टी की एक बैठक में अश्वेतों को मतदान से अलग रखने और मतदान को सीमित करने के उपायों पर विचार हुआ। धुर दक्षिणपंथी और रिपब्लिकन समर्थक फॉक्स न्यूज टीवी चैनल के विशेषज्ञ एन कॉल्टर ने न्यूयॉर्क ऑब्जर्वर नामक अखबार से कहा था कि अगर महिलाओं के मताधिकार छीन लिए जाएं, तो हमें आगे कभी डेमोक्रेटिक पार्टी के किसी उम्मीदवार के  राष्ट्रपति चुने जाने की चिंता नहीं करनी पड़ेगी।

पिछले महीने चुनाव, लोकतंत्र एवं सुरक्षा पर बने विश्व आयोग ने एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें हाशिये पर के समूहों- खासकर अफ्रीकी अमेरिकी गरीब मजदूरों- के मताधिकार के दमन और वित्तीय भ्रष्टाचार के लिए अमेरिका की कड़ी आलोचना की गई। रिपोर्ट में कहा गया कि इन तरीकों से राजनीतिक समता की अनदेखी की गई है, चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता कमजोर पड़ी है, और अमेरिकी संस्थाओं एवं चुनावों में नागरिकों का भरोसा हिल गया है। ध्यान दिलाया गया कि रिपोर्ट तैयार करने के दौरान तकरीबन दो तिहाई अमेरिकियों ने राय जताई कि चुनाव अधिकारियों पर आम अमेरिकी नागरिकों की तुलना में बड़ा चंदा देने वालों का प्रभाव ज्यादा है, जिसकी वजह से वे सरकार पर कम भरोसा करते हैं। (स्रोत- फ्रंटलाइन)   

अमेरिका में जजों को राजनीतिक आधार पर नियुक्त किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट में उनकी नियुक्ति ताउम्र होती है। इसीलिए अक्सर वहां राजनीति से जुड़े न्यायिक फैसलों पर सियासी रुझान हावी रहता है। अभी सुप्रीम कोर्ट में धुर दक्षिणपंथी रुझान वाले जजों की बहुसंख्या है। 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों में खर्च की सीमा पर जो फैसला दिया, माना गया है कि  उससे रिपब्लिकन पार्टी को भारी मदद मिली है। उस फैसले के जरिए बाहरी समूहों को बिना धन का स्रोत बताए अपने पंसदीदा उम्मीदवारों के पक्ष में और विरोधी उम्मीदवार के खिलाफ प्रचार के उद्देश्य से खर्च करने का अधिकार मिल गया। उस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा था कि उससे चुनाव को प्रभावित करने के लिए थैलीशाहों को खुली आजादी मिल गई है। ओपनडेमोक्रेसी.नेट पर अपने लेख में रुथ रोजेन ने लिखा- “जब सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम मामले में फैसला दिया कि (संविधान में) प्रथम संशोधन के तहत बड़ी कंपनियों और ट्रेड यूनियनों को उम्मीदवारों को असीमित मात्रा में धन देने का अधिकार है, तो उससे चुनाव चंदा जुटाने की होड़ में तब्दील हो गए।” उपभोक्ता अधिकार कार्यकर्ता और ग्रीन पार्टी के पूर्व राष्ट्रपति उम्मीदवार राल्फ नैडर ने कहा- “अब कंपनियां सीधे, स्वतंत्र ढंग से खर्च करते हुए विशाल मात्रा में धन चुनावों में झोंक सकती हैं, जबकि पहले से ही चुनावों पर कॉरपोरेट डॉलरों का शिकंजा कायम रहा है।”     

चूंकि रिपब्लिकन पार्टी हथियार, तेल और उपभोक्ता सामग्रियों के कारोबार में हित रखने वाली बड़ी कंपनियों, रूढ़िवादी धनी किसानों और कट्टरपंथी ईसाई समूहों एवं चर्च के हितों का प्रतिनिधित्व करती है, इसलिए उसके पक्ष में खर्च करने वालों की लंबी कतार है। गैर-सरकारी संस्था सेंटर फॉर रेस्पॉन्सिव पोलिटिक्स के एक अध्ययन में बताया गया है कि अमेरिकी चुनावों में खर्च होने वाले धन का 77 फीसदी हिस्सा वित्त, बीमा और रियल एस्टेट का कारोबार करने वाले समूहों से आता है। धन का ये प्रभाव इतना गहरा है कि पूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने कुछ समय पहले कहा कि अमेरिकी चुनाव प्रक्रिया दुनिया की सबसे बुरी प्रक्रियाओं में एक है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी व्यवस्था वित्तीय भ्रष्टाचार की मारी है, जहां आबादी का सबसे धनी एक प्रतिशत हिस्सा चुनाव प्रणाली और नीति संबंधी बहसों को अपने पक्ष में झुका लेता है। (स्रोत- फ्रंटलाइन)  

इसका सबसे ज्यादा फायदा रिपब्लिकन पार्टी को मिलता है। मगर डेमोक्रेटिक पार्टी भी बिल्कुल वंचित नहीं है। इसलिए कि इन दोनों पार्टियों के आर्थिक एजेंडे में ज्यादा फर्क नहीं है। उनमें फर्क सामाजिक एवं सांस्कृतिक नीतियों पर है। चूंकि प्रगतिशील सामाजिक नीतियों के कारण ही डेमोक्रेटिक पार्टी अश्वेतों, हिस्पैनिक एवं अन्य अल्पसंख्यकों, महिलाओं एवं समलैंगिक समुदायों का समर्थन पाती है, इसलिए उसे अपनी आर्थिक नीतियों में इन वर्गों के हितों का सीमित ख्याल रखना पड़ता है। कॉरपोरेट सेक्टर और अति धनी तबकों को यह भी मंजूर नहीं है। इसलिए हर चुनाव में वे रिपब्लिकन पार्टी के पक्ष में अपनी पूरी ताकत झोंकते हैं। बराक ओबामा के रूप में एक अश्वेत का राष्ट्रपति बन जाना और उनका हेल्थ केयर जैसे सीमित कल्याणकारी कदम उठाना धनी एवं रूढ़िवादी तबकों को रास नहीं आया। उन्होंने इसके खिलाफ बागी तेवर अपना रखे हैं, जिसकी सबसे बड़ी झलक टी-पार्टी आंदोलन के रूप में  देखने को मिली। अब उन तमाम तबकों की प्राथमिकता ह्वाइट हाउस में ओबामा की मौजूदगी को सिर्फ एक कार्यकाल तक सीमित कर देना है।    

बहरहाल, अमेरिकी लोकतंत्र की मुख्य समस्या यह नहीं है। असली समस्या धन एवं चुनावी फ्रॉड का वो वर्चस्व है, जिसने एक सदी से भी अधिक समय से राजनीति को सिर्फ दो पार्टियों के दायरे में बांट रखा है। उनसे अलग किसी विकल्प की वहां कोई व्यावहारिक उपस्थिति नहीं है। इस साल ऑक्यूपाई वॉल स्ट्रीट आंदोलन ने नई शक्तियों के उदय की उम्मीद जगाई। लेकिन उसे नियंत्रित करने में अमेरिकी शासक वर्ग फिलहाल सफल रहा है। इस रूप में कुंद पड़े अमेरिकी लोकतंत्र के लिए अगले छह नवंबर को होने वाले मतदान से कोई नई दिशा नहीं मिलेगी। फिर भी दुनिया की उसमें दिलचस्पी इसलिए है, क्योंकि बराक ओबामा और मिट रोमनी में से कौन अगले चार साल के लिए ह्वाइट हाउस में पहुंचेगा, इसका भी महत्त्व है। मिट रोमनी का घोर कंजरवेटिव और एक हद तक युद्ध-उन्मादी एजेंडा विश्व शांति एवं विकास संबंधी बहस के लिए नई चुनौतियां पैदा करेगा। ओबामा का पहला कार्यकाल उन तमाम लोगों का लिए निराश करने वाला रहा है, जिन्होंने उनके लच्छेदार भाषणों पर यकीन कर उनसे किसी नई शुरुआत की उम्मीद जोड़ी थी। ओबामा ने अपनी पूरी ताकत शासक एवं धनी वर्ग से तालमेल बनाने और मध्यमार्गी बनने में लगा दी। इस तरह उन्होंने उन युवा एवं प्रगतिशील मतदाताओं को मायूस किया, जिनके उत्साह ने उन्हें अमेरिका का पहला अश्वेत राष्ट्रपति बनने का गौरव प्रदान किया था। बहरहाल, निराशाओं की लंबी कहानी के बावजूद ओबामा दुनिया और अमेरिका में प्रगतिशील मूल्यों के नजरिए मिट रोमनी से बेहतर विकल्प हैं। इसलिए उनका विकल्प उनसे भी बुरा है।


सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं.  
satyendra.ranjan@gmail.com पर इनसे संपर्क किया जा सकता है.