कोयले की कोठरी में जी-न्यूज पर दाग

निखिल भूषण 

"...जी न्यूज कोलगेट पर कई दिनों से काला पत्थऱ सीरीज का प्रसारण कर रहा है। लेकिन इसी कोयले की आंच उसके संपादकों को जलाने लगेगी, ऐसी कल्पना चैनल ने नहीं की होगी।..." 

 
 
 
जी न्यूज ने सोचा नहीं होगा कि कोयले को दागदार खोजते खोजते उसका दामन भी काला हो जाएगा। जी न्यूज बनाम जिंदल में जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी ने कल अपना पक्ष अपने चैनल में रखा है। सुधीर चौधरी के साथ जी न्यूज के विशेष कार्यक्रम मीडिया का सौदा में उनके सहयोगी जी बिजनेस के संपादक समीर अहलूवालिया ने अपना पक्ष रखा। अहलूवालिया घटना के सबसे अहम कड़ी के रुप में सामने आए है। लेकिन वो अपना पक्ष बेबाक तरीके से नहीं रख पाए। जी न्यूज कोलगेट पर कई दिनों से काला पत्थऱ सीरीज का प्रसारण कर रहा है। लेकिन इसी कोयले की आंच उसके संपादकों को जलाने लगेगी, ऐसी कल्पना चैनल ने नहीं की होगी। चैनल ने अपने कार्यक्रम मीडिया का सौदा करीब 51 मिनट का बनाया था। जिसमें उसमें 20 मिनट के ज्यादा जिंदल के खिलाफ के कानूनी लड़ाई लड़ रहे छ्त्तीसगढ़ के आरटीआई कार्यकर्ता रमेश अग्रवाल की आपबीती का प्रसारण किया।
सुधीर चौधरी ने इस कार्यक्रम में पूरी तरह अपने दामन पर लगे छींटे को छुड़ाने की कोशिश में मीडिया और नवीन जिंदल को कठघरे में खड़े करने की कोशिश की। कमजोर तर्कों का सहारा लेकर खुद को निर्दोष साबित करने की चक्कर में वो पूरे मीडिया को बिका हुआ करार दे रहे थे। उनका साफ कहना था कि यकायक सारे चैनलों से कोलगेट की खबरें क्यों गायब हो गई। और सिर्फ जी न्यूज ही क्यों कोलगेट की खबरें चला रहा है। आगे वो कहते है कि जिंदल से उनका कोई करार करने का इऱादा नहीं था। तो क्या सारे मीडिया ने खबर के प्रसारण को रोकने के लिए जिंदल से करार कर लिया है। सत्ता, मीडिया और कार्पोरेट के खेल कोई नई बात नहीं है। लेकिन नीरा राडिया टेप के बाद दूसरी बार इतने बड़े पैमाने पर यह खेल देखने को मिल रहा है। सुधीर चौधरी अपने ईमानदारी का सबूत देते हुए कह रहे है कि उनका इरादा जिंदल से विज्ञापन अनुबंध के बहाने कैसे कार्पोरेट मीडिया को खऱीदने की कोशिश करते है उसे उजागर करना था। इसके लिए उन्होंने झूठा अनुबंध पत्र तैयार किया, जिसमें जी न्यूज के साथ पांच सालों के लिए 100 करोड़ का विज्ञापन करार होना था। अब बस इसमें नवीन जिंदल का हस्ताक्षर होना बाकी था लेकिन इससे पहले जिंदल को खबर लग गई और जिंदल ने पहले ही दिल्ली पुलिस के पास जी न्यूज से 100 करोड़ के रंगदारी मांगने का केस दर्ज करा दिया। लेकिन सुधीर ये नहीं बता पा रहे है कि जब उनके पास ईमेल के माध्यम से करार करने का संदेश आया तो तब उन्होंने इस बात को क्यों नहीं उजागर किया। जिंदल और जी न्यूज के एक दूसरे के आरोपों में कितना झूठ है ये तो कहा नहीं जा सकता, लेकिन एक बात इस मामले से सच साबित हुई है कि कार्पोरेट, मीडिया पर नियंत्रण करता है और मीडिया भी बिकाऊ है। ये बात खुद सुधीर चौधरी ने अपने कार्यक्रम में दूसरे तरीके से कही भी है। समीर अहलूवालिया जो इस घटना के सूत्रधार रहे उन्हें इस कार्यक्रम में मुश्किल से पांच मिनट ही वक्त मिला होगा लेकिन जिस तरीके से उन्होंने अपना बचाव किया वो खुद ही संदेह के घेरे में आ गए। उन्होंने अपने सफाई में बस इतना कहा कि इस तरह से अनुबंध तैयार नहीं किए जाते और इस तरह का करार मीडिया में आजतक नहीं हुआ है। लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या अब इस तरह के करार नहीं हो सकते, जो पहले नहीं हुआ वो अब तो सकता है ना।
सुधीर चौधरी अपने बचाव में बार बार जिंदल द्वारा 10 सितंबर को जी न्यूज के रिर्पोटर के साथ की गई बदसलूकी और रमेश अग्रवाल पर हुए हमले का जिक्र कर रहे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि रमेश अग्रवाल पर हमले में जिंदल का हाथ है और राष्ट्रीय मीडिया ने इस प्रश्न को नहीं उठाया। अब जरा सुधीर हमें ये भी बता दें कि कार्पोरेट के खिलाफ कौन सी खबर नेशनल मीडिया चलाता है और आपके चैनल ने खुद क्यों नहीं इसको कवर किया। जब अपनी जान पर आई है तो दूसरों के कंधों पर बंदूक चलाना सही नहीं है। सुधीर को भी यह अच्छी तरह पता है कि एक घटना के बाद मीडिया को नया मसाला चाहिए होता है और कोलगेट के बाद एफडीआई, केजरीवाल का पार्टी गठन, वाड्रा का खुलासा,खुर्शीद का घोटाला नये-नये मामले आते गए और कोलगेट दबता गया। लेकिन सुधीर ने मीडिया पर सीधा सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर क्यों कोलगेट की खबरें बंद हो गई। उनका सीधा सीधा मतलब था कि मीडिया को नियंत्रित किया गया।
इस मामले में कौन सच बोल रहा है ये तो आने वाले वक्त में पता चलेगा या राडिया टेप की तरह इसे भी दबा दिया जाएगा। लेकिन इस मामले ने मीडिया की गिरती हुई साख में और ज्यादा बट्टा लगा दिया है।
 निखिल युवा पत्रकार हैं। पत्रकारिता की पढ़ाई आईआईएमसी से। 
अभी ईएमएमसी में काम कर रहे हैं। इनसे संपर्क का पता  nikhilbhusan@gmail.com है।