मधुबनी में प्रशासनिक लापरवाही एक साजिश तो नहीं...

सरोज कुमार

"...तो आखिर क्या कारण है कि एक तरफ मधुबनी का मामला इतना विस्तार पाता गया वहीं बाकी दलित या अतिपिछड़ों से जुड़े मामले दबते गए। इसका एक बड़ा कारण यहीं रहा कि मधुबनी का मामला एक ऐसे सवर्ण जाति से जुड़ा रहा जिसका न केवल सामाजिक प्रभाव है बल्कि सत्ता से लेकर मीडिया में भी प्रभावी भागीदारी है।..."

 
madhubani-riotबीते 13 अक्टूबर को प्रशांत के अपहरण औऱ हत्या की आशंका के मामले में मधुबनी में जो कुछ भी हुआ उसकी आंच दूर तक पहुंची। अभी हाल फिलहाल बिहार में (अगर ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या का मामला छोड़ दिया जाए तो) इस तरह किसी के अपहरण और हत्या की आशंका में ऐसा विस्तृत बवाल नहीं मचा था। मधूबनी की सड़कों पर हजारों लोग उतर कर पूरे शहर में घूम-घूम कर आगजनी करते रहे। इसकी आंच ने न केवल मधुबनी शहर को झुलसाया बल्कि जिले के कई शहर दूसरे दिन भी आगजनी के शिकार होते रहे। यहां तक कि सटे दरभंगा जिले तक लोगों का गुस्सा सड़क पर उतरा। प्रभाव का अंदाजा इसी बात से लगता है कि मधुबनी के जलने वाले दिन ही आनन-फानन डीएम और एसपी जैसे बड़े अधिकारी बदल दिए गए। 15 तारीख को विपक्ष ने बिगड़ती कानून व्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही के विरोध में बंद बुला लिया। वहीं अब प्रशांत की दिल्ली में बरामदी के बाद सरकार ने विपक्ष पर जनता को गुमराह करने का आरोप लगा दिया। इस पूरे प्रकरण को मीडिया ने भी भरपूर जगह दी जो कि अमूमन बिहार में ऐसी घटनाओं को लेकर होता नहीं आजकल। इन सबके बीच प्रशांत बरामद हो गया है और सरकार ने पूरे मामले की जांच टीम बैठा दी है। प्रशांत, सिर कटी लाश जिसे उसके परिजनों ने प्रशांत की बताया था और जनाक्रोश के इतना भड़कने की जांच की जा रही है। लेकिन कुछ ऐसी बातें हैं जिनपर बात की जानी चाहिए।

क्या किसी दलित से जुड़े मामले को ऐसा विस्तार मिलता... 

मधुबनी में हुए उपद्रव ने दो जिलों के साथ ही राजधानी पटना तक को हिला कर रख दिया। यहां तक कि मुख्यमंत्री ने आरा-बक्सर की यात्रा भी इसी बहाने रद्द की कि वे मधुबनी कांड की समीक्षा करने रुक गए हैं (भले ही आरा-बक्सर न जाने का कुछ और मामला है)। अखबारों ने भी इसकी अच्छी कवरेज की। यहां तक कि कुछ अखबारों ने स्पेशल पेज भी दिए। तो आखिर इतना विस्तार क्यों मिल गया जबकि इससे पहले इसी तरह मामले में प्रशासन से लेकर अखबार तक चुप्पी साध लेते हैं।

अभी बीते अगस्त में वैशाली जिले के सराय थाने की घटना की यादें ताजा है। कविता नाम की दलित किशोरी की 7 जुलाई को सवर्ण तबके के दबंगों ने बालात्कार करके कुंए में फेंक दिया। वहीं इस मामले में लाख कोशिशों के बाद भी पुलिस निष्क्रिय बनी रही। आरोपितों की गिरफ्तारी में कोई रुचि नहीं थी पुलिस की। मामला साफ था कि पुलिस अपराधियों से मिली हुई थी।एक महीने बाद भी पुलिस ने कोई कदम नहीं उठाया तो ग्रामीणों ने आक्रोशित हो कर सराय थाने को घेर लिया। और प्रदर्शन करने लगे। वहीं पुलिस और ग्रामोणों में नोंक-झोंक के बाद आगजनी और पुलिस की ओर फायरिंग हुई। जिसमें बाद में एक युवक की गोली लगने से मौत हो गई। वहीं यह मामला धीरे-धीरे से दबता गया। उस इलाके में बाद में पुलिसिया दमन और आतंक बढ़ गया। वहीं मई में मुजफ्फरपुर जिले के कटरा थाने के अंतर्गत मीरा सहनी नाम की शादीशुदा महिला गैंग रेप की शिकार हुई। बाद में उसकी इलाज के दौरान मृत्यु हो गई। वहीं पुलिस इस मामले को दबाते रही। वह रेप से ही इंकार करती रही। ऐसे ही मामले जो दलित या अतिपिछड़े, गरीब तबके से जुड़े हुए थे, उनमें ना तो प्रशासन ने कोई ठास कदम उठाया और ना ही सामाजिक आक्रोश का विस्तार हुआ। सरकार से लेकर अखबारी मीडिया भी इस तरह से प्रभावी रिपोर्टिंग नहीं करती रही।

तो आखिर क्या कारण है कि एक तरफ मधुबनी का मामला इतना विस्तार पाता गया वहीं बाकी दलित या अतिपिछड़ों से जुड़े मामले दबते गए। इसका एक बड़ा कारण यहीं रहा कि मधुबनी का मामला एक ऐसे सवर्ण जाति से जुड़ा रहा जिसका न केवल सामाजिक प्रभाव है बल्कि सत्ता से लेकर मीडिया में भी प्रभावी भागीदारी है। लाख इंकार किया जाए लेकिन जाति इस घटना के विस्तार पाने की एक प्रमुख वजह रही। पूरे मीथिलांचल में जिस तरह से इस तबके का प्रभाव है, इस आंच से मिथिलांचल का झुलसना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। मेरा मकसद ये नहीं है कि इस जन-आक्रोश को प्रभावी सवर्ण तबके से जुड़े होने के कारण कमतर आंकू या आवश्यक न ठहराउं। न ही इसकी तुलना ब्रह्मेश्वर मुखिया के सामंतवादी गुंडों के दंगा-फसाद से की जा सकती है। मैं केवल इस ओर इशारा करना चाहता हूं कि इसके विस्तार में जातिगत प्रभाव एक कारण रहा। जबकि दलितों को साथ इससे भी घृणित घटनाओं में ऐसी कोई पहल तक नहीं होती।

इस घटना के विरोध में दो दिनों बाद ही विपक्ष ने बिहार बंद का आयोजन कर दिया। दरसल सरकार को घेरने का अच्छा मौका था इनके पास। वामपंथी दलों ने सबसे पहले बंद बुलाया। फिर लालू-पासवान कूद पड़े। लालू-पासवान सबने गिरफ्तारियां दी। ये लालू और पासवान इन दलितों के मामले में इतने उतावले क्यों नहीं हुए। ये वहीं लोग थे जिनके लोग ब्रह्मेश्वर मुखिया जैसे दलित विरोधी सामंतवादी ताकतों के आयोजनों में डटे रहे थे। वामपंथी दलों को छोड़ दिया जाए तो बाकी दल दलितों पर हो रहे हमले पर उदासीन ही रहती हैं।

प्रशासनिक लापरवाही या कोई साजिश

अब प्रशांत झा की बरामदी के बाद सरकार ने विपक्ष पर अफवाहें फैला कर आक्रोश भड़काने का आरोप लगाया है। लेकिन सरकार भूल रही है कि इस घटना के बेकाबू होने में प्रशासन की बड़ी भूमिका रही। प्रशासन ने लोगों के आक्रोश को हवा दे दिया। संभालने की बजाय फायरिंग और लाठीचार्ज से पूरी मधुबनी को झुलसा दिया। इसी में निशांत और रवींद्र नामक युवकों की मृत्यु हो गई। हाल ये हुआ कि इनकी लाश अपने घर पहुंचते ही जयनगर, बासोपट्टी और खजौली जैसी जगहों पर थाने का घेराव और आजगनी हो गई।

वहीं अब प्रशांत के मिलने के बाद सरकार प्रशासन की पीठ थपथपा रही है और कहती है कि भ्रम में सब कुछ हुआ। पर यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि जांच अधिकारियों को गायब प्रशांत और प्रीती के दिल्ली होने की जानकारी पहले से ही थी। एक अखबार में इस बात की पुष्टी की गई। कहा तो यह गया है कि पुलिस इस मामले में इत्मिनान थी कि दोनों महरौली में है लेकिन अनुसंधान की वजह से इस बात को सार्वजनिक नहीं किया गया। ये कैसा अनुसंधान था जिसके कारण पूरे बिहार को जलने के लिए छोड़ दिया गया। दो अन्य जिंदगियों को बुझने दिया गया। क्या प्रशांत-प्रीती कोई आतंकवादी थे जो सूचना सार्वजनिक नहीं की गई कि इससे वे भाग निकलते। क्या इस तरह बात छिपा कर प्रशासन ने लापरवाही नहीं बरती?

सुशासन बाबू बेशर्मी से कह गएअंत भला तो सब भला

प्रशांत की बरामदी की खबर के बाद सरकार ने विपक्ष पर भ्रम फैलाने का आरोप लगाया। वहीं सरकार और कुछ सरकारी पत्रकारों ने ये बातें फैलानी शुरु कर दी कि जनाक्रोश के पीछे कोई साजिश थी। साफ है कि इनका इशारा विपक्ष की ओर है। ये इस मौके का फायदा विपक्ष को घेरने के लिए उठा रहे हैं। वैसे प्रशांत की बरामदी के बाद विपक्ष को जरुर चुप कराया लेकिन ध्यान देने वाली बात है कि यह बंद केवल प्रशांत को लेकर नहीं बुलाया गया। यह बंद प्रशासनिक लापरवाही, दो युवकों के पुलिस लापरवाही से मारे जाने के लिए भी बुलाया गया था। इसलिए केवल प्रशांत से मिलने से सारी चीजें सही नहीं हो जाती। आखिर इन मारे गए लोगों का भी तो मसला है यह।

वहीं नीतीश कुमार बड़ी बेशर्मी से यह कहते रहे कि अंत भला तो सब भला, जाइए हर्षोल्लास से बकरीद और दशहरा मनाइए। उनके लिए सब भला होगा पर उनके लिए क्या जो पुलिस की गोलियों के शिकार हुए?

या इससे भी बड़ी साजिश

सत्ता खुद को बनाए रखने के लिए क्या-क्या हथकंडे अपनाती है इसे भली भांति समझा जाता है। इस घटना के कुछ पहलूओं को बिहार की वर्तमान स्थितियों से जोड़ कर देखा जाए तो एक बात और सामने आती है। वर्तमान में नीतीश बाबू को अधिकार यात्राओं के दौरान जो विरोध झेलना पड़ा सरकार पुरी तरह से बैकफुट पर थी। नीतीश कुमार जहां भी जा रहे थे विरोध का सामना करना पड़ गया था।(ध्यान रहे कि मधुबनी में भी नीतीश का विरोध हुआ था)। हाल ये रहा कि आरा-बक्सर में भी विरोध के डर से अधिकार यात्रा उन्होंने रद्द कर दी। मसला ये कि ऐसे माहौल में सरकार को ऐसी घटना की दरकार थी ताकि न केवल वह खुद को संभाल सके बल्कि साथ ही विपक्ष को घेरने की कोशिश कर सके।

अब जबकि प्रशांत के दिल्ली में होने की खबर पुलिस को पहले थी तो फिर ये बात क्यों छिपाई गई। परिजन कई दिनों से धरने पर बैठे रहे। हंगामा होता रहा पुलिस ने ये बात क्यों जाहिर नहीं की। क्यों मधुबनी शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों को जलने दिया गया। क्या सरकार को इस बात का इंतजार था कि कब माहौल और खराब हो, आगजनी हो, विपक्ष के आंदोलन हो और वह आराम से सबका जवाब प्रशांत की बरामदगी के साथ दे। हंगामे के बाद यह मामला बड़ा बन ही गया था और पूरे बिहार की नजरें इस पर थी। पुलिस चुपचाप क्यों रही? क्या वह मिथिलांचल को जलते देखना चाहती थी? भले ही सरकार ने अधिकारियों का तबादला तुरंत कर दिया लेकिन लापरवाही को कुछ आगे लेकर जाएं तो साजिश की बू आती है।

इस मामले में प्रशांत झा की बरामदगी ने सरकार या प्रशासन को बोलने का मौका जरुर दिया है लेकिन ये चीजें हैं जो सरकार और प्रशासन की नीयत पर सवाल खड़ी करती हैं।


सरोज युवा पत्रकार हैं. पत्रकारिता की पढ़ाई आईआईएमसी से. 
अभी पटना में एक दैनिक अखबार में काम . 
इनसे krsaroj989@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.