दमन के दौर में शांति का कैसा सम्मान?


सत्येंद्र रंजन

  "...चूंकि नोबेल पुरस्कारों का इतिहास एक सदी से भी पुराना है और इसमें बहुत बड़ी रकम दी जाती है, इसलिए इस पर दुनिया की नजर रहती है और इसे नजरअंदाज करना संभव नहीं होता। इसीलिए उचित ही है कि नोबेल कमेटी जिसे शांति के लिए योगदान मानती है, उसकी तार्किकता पर विचार किया जाए।..."

‘अल्फ्रेड नोबेल अपने उत्तराधिकारियों से अपना धन वापस मांग लें, क्या इसमें अब बहुत देर हो चुकी है? इस (धन) ने सबसे बड़ी सेवा कूटनीति की नहीं, बल्कि प्रहसन (कॉमेडी) की है’– ये टिप्पणी ब्रिटिश अखबार डेली टेलीग्राफ ने इस घोषणा के बाद की कि इस साल का नोबेल शांति पुरस्कार यूरोपीय संघ को दिया जाएगा। हालांकि प्रगतिशील रुख रखने वाले अखबार द गार्जियन ने यूरोपीय संघ की पुरानी भूमिका का लेखा-जोखा लेते हुए अपने संपादकीय का शीर्षक दिया-एक पुरस्कार जिसका अवश्य समर्थन किया जाना चाहिए, मगर उसने भी यह स्वीकार किया कि यूरोपीय संघ को आज किफायत की नीतियों के जरिए अपने लोगों को दंडित करने वाली संस्था के रूप में अधिक देखा जा रहा है। एथेन्स से मैड्रिड तक लोग संघ के संस्थानों को दमन का ऐसे उपकरण मान रहे हैं, जो नागरिकों को प्रजा बनाने पर आमादा हैं। टेबलॉयड सन ने तो इसे मूर्खता को सम्मानित करना बताया है।

नोबेल शांति पुरस्कार अक्सर विवादों से घिरता है। एक हद तक साहित्य, और काफी हद तक शांति के नोबेल पुरस्कारों के लिए चयन के पीछे नोबेल कमेटी की राजनीति हमेशा ही प्रेरक कारण रही है। यह राजनीति बड़ी या बहुराष्ट्रीय पूंजी और पश्चिमी देशों के हितों से प्रेरित होती है, यह बात वाजिब तर्कों के साथ अनेक बार दुनिया के सामने रखी गई है। इनसे दुनिया के एक हिस्से में इन पुरस्कारों की साख संदिग्ध हुई है। लेकिन इस बार खास बात यह है कि नोबेल कमेटी की बुद्धि और इरादे पर सवाल उस दूसरे हिस्से की तरफ से भी उठे हैं, जो लोकतंत्र, मानवाधिकार एवं शांति की वर्चस्ववादी पश्चिमी धारणाओं से सहमत रहा है। बहरहाल, चूंकि नोबेल पुरस्कारों का इतिहास एक सदी से भी पुराना है और इसमें बहुत बड़ी रकम दी जाती है, इसलिए इस पर दुनिया की नजर रहती है और इसे नजरअंदाज करना संभव नहीं होता। इसीलिए उचित ही है कि नोबेल कमेटी जिसे शांति के लिए योगदान मानती है, उसकी तार्किकता पर विचार किया जाए।

नॉर्वे स्थित नोबेल कमेटी ने कहा कि यूरोपीय संघ ने पिछले छह दशकों में यूरोप में शांति, मेलमिलाप, लोकतंत्र एवं मानवाधिकारों को आगे बढ़ाने में जो योगदान किया है, इस पुरस्कार के जरिए उसको सम्मानित किया जा रहा है। यूरोप के इतिहास- खासकर बीसवीं सदी के आरंभिक पचास वर्षों में वहां युद्ध एवं रक्तपात के इतिहास- से परिचित किसी व्यक्ति के लिए इस वक्तव्य को आंशिक रूप से स्वीकार करने में शायद कोई दिक्कत नहीं हो। मगर इस कथा के कई अन्य अध्याय भी हैं। उनमें यह कहानी छिपी है कि कैसे यूरोपीय संघ धीरे-धीरे पूंजी की अनियंत्रित सत्ता को स्थापित एवं संचालित करने वाले वाली संस्था में बदलता गया, कैसे जहां उस सत्ता के लिए चुनौती पैदा हुई उसे कुचलने के लिए युद्ध या सैनिक अभियानों का हिस्सा बनने में कोई गुरेज नहीं हुआ और इस क्रम में राष्ट्रीय संप्रभुताओं एवं मानवाधिकारों के हनन के प्रति वह पूरी तरह असंवेदनशील बना रहा। इस क्रम में यूरोप ने लोकतंत्र एवं मानवाधिकारों के दोहरे मानदंडों का पालन किया। हथियारों के कारोबार से लेकर, सुरक्षा एवं पर्यावरण के तमाम मुद्दों पर उसने विभिन्न यूरोपीय देशों के शासक वर्गों के हितों के रक्षक की भूमिका अपना ली।

इस क्रम में तीसरी दुनिया के देशों के संसाधनों एवं श्रम के शोषण की विश्व व्यवस्था को टिकाए रखने में उसने विषमता की संरक्षक अन्य वित्तीय एवं मौद्रिक संस्थाओं और सैनिक गठबंधनों के साथ सहभागिता की। इसके बावजूद उपनिवेशवाद के खात्मे और नव-उपनिवेशवाद की जकड़ ढीली होने की परिघटना आगे बढ़ी, तो यूरोप और अमेरिका के वे स्रोत सूखने लगे, जिनसे आने वाले धन का उनको समृद्ध बनाने और वहां अपेक्षाकृत उदार व्यवस्था के स्थापित करने में बड़ी भूमिका थी। आज यूरोप और अमेरिका का आर्थिक संकट गंभीर होते जाने की बड़ी वजह यह है कि वे जबरन एशिया, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका को अपना बाजार बनाने और वहां के संसाधन अपने यहां ले आने में सक्षम नहीं हैं। ऐसे में लोकतंत्र एवं मानवाधिकारों के प्रति निष्ठा की कलई खुलने लगी है। इसी का नजारा ग्रीस से लेकर स्पेन और इटली से पुर्तगाल तक दिखा है, जिनकी संप्रभुता को लगभग निरर्थक बना दिया गया है। इटली में तो वह प्रधानमंत्री सत्ता में है, जिसे जनता के वोट से नहीं चुना गया, बल्कि जिसे ब्रसेल्स (यूरोपीय संघ के मुख्यालय) ने थोप दिया। ऐसा ही ग्रीस में भी हुआ था, जहां अब वैसे तो निर्वाचित सरकार है, मगर जिसकी आर्थिक निर्णय लेने की क्षमता यूरोपीय संघ का सदस्य बने रहने के कारण पंगु बनी हुई है। ब्रसेल्स ने किफायत की जो नीतियां थोपी हैं, उसका असर फ्रांस लेकर तमाम अन्य देशों में भी बेरोजगारी, सामाजिक सुरक्षा में कटौती और लोगों की जिंदगी मुहाल करने के रूप में हुआ है। इसके विपरीत बैंकर, वित्तीय संस्थानों के अधिकारी और कंपनियों के मालिकों पर ना तो टैक्स बढ़ा है, ना उनके वेतन-भत्तों में कटौती हुई है।

इसी कारण यूरोपीय संघ को नोबेल शांति पुरस्कार मिलने पर यूरोप की प्रतिक्रिया बंटी हुई है। दमनकारी नीतियों को थोप रहे नेता और पूंजीपतियों ने इसे अपनी निर्मम नीतियों को ढकने के आवरण के रूप में लिया, तो मेहनतकश लोगों ने इसे मजाक या उनके जख्म पर नमक छिड़कना माना। इस बीच एक राय यह है कि यूरोपीय संघ को उस पूरे इलाके के लिए समान मुद्रा की यूरो परियोजना से अलग करके देखा जाना चाहिए। मगर ऐसा सोचने वालों के दुर्भाग्य से दुनिया के बाकी हिस्से तो दूर, खुद यूरोप में पूंजी की अनियंत्रित सत्ता से पीड़ित लोगों के लिए ऐसा करना आज संभव नहीं है।