शौचालय या मंदिर : राग दरबारी की फिर-फिर आती याद

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सुधीर सुमन

"...हर बार इस प्रसंग से गुजरते हुए उपन्यासकार पर गुस्सा आता है कि क्या वह इन औरतों को बख्स नहीं सकता था, पर अक्सर अचानक पलट के जैसे वह सवाल दागता है कि किस पर नाराज हो रहे हो, मुझ पर या इस व्यवस्था पर जो आजादी के बीस वर्षों बाद तक सबके लिए शौचालय तक की व्यवस्था नहीं कर सकी है?..."

जिस सरकार का एक आदमी लाखों का शौचालय बनाता है. उसका एक मंत्री शौचालय को मंदिर से पवित्र बताता है. अब मंदिर जरूरी है या शौचालय, यह तो हाजत के वक्त ही पता चलता है.  इस पर बीजेपी ने बयानबाजी शुरू कर दी है. बीजेपी मंदिर को पवित्र बताएगी और जयराम रमेश शौचालय बनाने के दावे करके जनता के उद्धारक साबित करेंगे खुद को.  लेकिन सच तो यह है कि शौचालय और मंदिर दोनों की बात करने वालों का असली धंधा कुछ और है. ये दोनों पार्टियां महंगाई बढ़ाने के लिए जिम्मेवार हैं. दोनों को अनाज के उत्पादन करने वाले मजदूर किसानों की कोई चिंता नहीं है. और न ही समाज और अर्थव्यवस्था को बुनियादी तौर पर बदलने में कोई दिलचस्पी है. दोनों ने ग्रामीण समाज की तो उपेक्षा ही की है. जब खेती चौपट हो चुकी है, लोग अपने आजीविका के प्रम्रागत साधनों से वंचित किये जा रहे हैं, भोजन का संकट बढ़ रहा है, तब ये शौचालय और मंदिर के हिमायती बन रहे हैं. 
जयराम रमेश  देश के दो लाख 40 हजार ग्राम पंचायतों को दस साल के भीतर स्वच्छ बनाने के लिए निर्मल भारत अभियान चलवा रहे हैं.  विडम्बना देखिए कि कुपोषण से प्रभावित देश के 200 जिलों में इस अभियान को विशेष रूप से केन्द्रित किया जाएगा। कुपोषण और शौचालय के बीच क्या रिश्ता है, कोई आमिर खान बताएगा क्या?

आज मुझे अचानक राग दरबारी की याद आ गई.  धुंधलके में सड़क के किनारे गठरियों-सी रखी हुई शौच के लिए कतार बांधकर बैठी हुई औरतों, घूरे से उठती बदबू और कुत्तों के भौंकने की आवाज की पृष्ठभूमि में ही तो रंगनाथ शिवपालगंज में दाखिल होता है। शौच के लिए बैठी हुई औरतों पर जो दो पंक्तियां उपन्यास में हैं वे  पाठकों को चुभती भी हैं. हर बार इस प्रसंग से गुजरते हुए उपन्यासकार पर गुस्सा आता है कि क्या वह इन औरतों को बख्स नहीं सकता था, पर अक्सर अचानक पलट के जैसे वह सवाल दागता है कि किस पर नाराज हो रहे हो, मुझ पर या इस व्यवस्था पर जो आजादी के बीस वर्षों बाद तक सबके लिए शौचालय तक की व्यवस्था नहीं कर सकी है?

उपन्यास के आखिरी हिस्से में जहां गंदगी का पर्याय बन चुके बस अड्डों पर टिप्पणी है, वहां फिर से शौचालय प्रसंग आता है। उपन्यासकार व्यंग्य करता है- ‘‘गांव सुधार के धुरंधर विद्वान उधर शहर में बैठकर ‘गांव में शौचालयों की समस्या’ पर गहन विचार कर रहे थे और वास्तव में 1937 से अब तक विचार-ही-विचार कर रहे थे’’। 

आज शौचालयों के धंधे में सरकारी-गैरसरकारी स्तर पर करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, जिनसे कितने नेता, अधिकारी, अभिनेता, बुद्धिजीवी, सरकारी-गैरसरकारी समाजसेवी अपने जीवन की सुविधाएं जुटा रहे हैं, मगर यथार्थ यही है कि इस उपन्यास के प्रकाशित होने के पैंतालीस वर्षों के बाद भी देश के बहुसंख्य गांवों और कस्बों में शाम में गठरियों की तरह औरतों का सड़क के किनारे शौच के लिए बैठने की नियति खत्म नहीं हुई है. जयराम रमेश ने यह भी कहा कि  'इतने समय बीत जाने के बाद भी हमारे समाज पर एक बहुत बड़ा कलंक यह है कि आज भी 60 फीसदी महिलाएं खुले में शौच करती हैं। इस पर हरेक भारत वासी को शरम महसूस होना चाहिए। आज भी हम नहीं कह सकते हैं कि हरेक महिला को देश में शौचालय उपलब्ध है।' जैसे उन्हें अचानक ज्ञान मिला हो, उन्होंने बताया कि  '64 फीसदी भारतीय खुले में शौच करते हैं. अब यह साबित हो चुका है कि खुले में शौच भारत में कुपोषण की बड़ी वजह है.' यानी शौचालय कुपोषण की बड़ी वजह है, भुखमरी के कारण होने वाली मौतें, जिन पर प्रशासन तंत्र लगातार पर्दा डालता है. वे जरूर मंत्री महोदय की नजर में कोई वजह ही नहीं होंगी. आइए उम्मीद जगाइए, 'यूपीए सरकार ने ग्रामीण इलाकों में शौचालय के निर्माण पर 45 हजार करोड़ रुपये खर्च किया है और इस मद में आने वाले पांच सालों में 1.08 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे.'

क्या इसमें रागदरबारी की ऊपर वर्णित पंक्तियों कि अनुगूँज नहीं सुनाई पड़ रही है. काश! जयराम रमेश की बयानबाजी और करोड़ों रुपयों के खर्चे से शौचालय की 'पवित्रता' सबको हासिल हो जाती! और काश शौचालय से कुपोषण दूर हो जाता! काश, औरतों के गठरी की तरह सडक किनारे बैठने की मजबूरी खत्म हो जाती! क्या किसी  नए राग दरबारी से गुजर रहे हैं हम? कहाँ हो रंगनाथ, कहीं तुम दरबार में शामिल तो नहीं हो चुके?

सुधीर सुमन वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं.
इनसे  इंटरनेटीय पते s.suman1971@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.