सुशासन बाबू नाटक देखते नहीं....करते हैं

सरोज कुमार

हिरावल द्वारा महाभोज के मंचन की  रिपोर्ट  




मुख्यमंत्री साहब संपादक महोदय को हड़का रहे थे। मीडिया की स्वतंत्रता को मतलब ये नहीं कि कुछ भी लिखने की छूट मिल जाती है। आपलोग तो पुलिस से पहले ही हत्या की गुत्थी सुलझाने लगे हैं। संपादक जी झुके जा रहे हैं। लगता है अब लोटने लगेंगे। मुख्यमंत्री मुस्कुराने लगते हैं। कहते हैं कि ये देखिए हमलोग दलितों के विकास के लिए नई योजना ला रहे हैं। विकास में सहायक बनिए, ये खबरें छापिए। संपादक जी की जान में जान आती है, जी जी करते नहीं थक रहे। मुख्यमंत्री पासा फेंकते हैं-और कोई समस्या तो नहीं है। संपादक जी इसी की तो राह देख रहे थे, फटाक से फट पड़ते हैं- कागज भी जुटाने में दिक्कत हो रही है। लो मिल गया विज्ञापन और कागज की छूट। संपादक गद्गद्....मुख्यमंत्री की चवन्नियां मुस्कान देखने लायक है।

यह दृश्य भले ही जसम की सांस्कृतिक संस्था हिरावल की ओर से प्रस्तुत नाटक महाभोज का था लेकिन इसे देखते हुए बिहार की वर्तमान स्थिति दिमाग में घूमने लगती है। नाटक के मुख्यमंत्री दा साहब सत्ता के पाखंड, सामंती तत्वों से मिलीभगत, नौकरशाही और मीडिया के स्वार्थपूर्ण इस्तेमाल के कारण बिल्कुल जाना-पहचाना चेहरा लगते हैं। और मेरा ध्यान अचानक सुशासन बाबू की ओर चला जाता है। बिहार में तथाकथित विकास के दावे, दलितों-गरीबों के लिए योजनाएं, लड़कियों के लिए योजनाएं, ब्रह्मेश्वर मुखिया और उसके भक्तों जैसे सामंती तत्वों के सामने घुटने टेकना, सब कुछ ध्यान आने लगता है। दा साहब की मुस्कान मुझे सुसाशन बाबू से ही मिलती नजर आती है। और इधर संपादकों का रेंगना तो पता ही है। अखबारों में खबरें आ रही हैं बिहार को चाहिए विशेष राज्य का दर्जा। नीतीश कर रहे हैं बिहार के अधिकार के लिए अधिकार यात्रा। इस यात्रा के दौरान मधुबनी में सुशासन का आईना दिखाने वालों को सुशासन बाबू मंच से ही धमकिया दे देते हैं। इनको चप्पल दिखाई जाती है पर अगले दिन कहीं किसी अखबार में चप्पल दिखाने की कोई खबर नहीं। जिस मधुबनी जिले में वे अधिकार यात्रा कर रहे थे उसी जिले में केवल पान खाने पर दो लड़कियों को बुरी तरह मारा-पीटा ही नहीं जाता बल्कि बाल भी काट दिए गए। साथ ही 21 हजार जुर्माना देने का फरमान जारी कर दिया गया। इतनी रकम न देने पर एक लड़की के परिवार वालों को गांव छोड़ने का हुक्म मिल गया। नीतीश बाबू किनके अधिकारों के लिए यात्रा कर रहे हैं? स्कूली छात्राओं को साईकिल-पोशाक बांट दिया और उन पोशाकों को नोंच रहे अपराधियों को खुली छूट देते रहे। यों ही नहीं वैशाली के दलित विमल पासवान अपनी बेटियों को आगे पढ़ाना ही नहीं चाहते। उनकी एक बेटी के साथ सामंतवादी तत्वों ने न केवल बालात्कार किया बल्कि मार कर कुएं में फेंक दिया। और सुशासन देखिए कि एक महीना बीत जाने पर भी कोई कार्यवाई नहीं होती है।

बिहार की वर्तमान राजनीति पर बिल्कुल सटीक और मौजूं नाटक रहा।एक तरफ तो सत्ता में बैठे लोग वोट के लिए दलितों-वंचितों के विकास की योजनाओं की घोषणा करते हैं वहीं दूसरी ओर उनका दमन उत्पीड़न करने वाली सामंती शक्तियों को संरक्षण भी देते हैं।विपक्ष भी वैसा ही है। बिसू नामक खेत मजदूर की हत्या के प्रसंग के माध्यम से इन्हीं सारी सच्चाईयों को उभारने की कोशिश है मन्नु भंडारी द्वारा लिखित महाभोज। आगजनी कर जला दिए दलितों-गरीबों के लिए आवाज उठाने वाला बिसू मार दिया जाता है। इस हत्या को वोट के रुप में कैश करने के चक्कर में मुख्यमंत्री(दा साहब) से लेकर विपक्ष (सुकुल बाबू) भी रहता है। वहीं बिसू के दोस्त बिंदा और महेश संघर्ष कर रहे होते हैं। अखबार का संपादक इसे अपने स्वार्थ के लिए उपयोग करता है। अंतत: मुख्यमंत्री मीडिया से लेकर पुलिस का इस्तेमाल करके बेकसूर बिंदा को ही फंसा देता है। बिसू का हत्यारा जोरावर मुख्यमंत्री का विश्वासपात्र बना रहता है। अपने हक के लिए लड़ रहे लोगों को साथ सत्ता और सामंती तत्व कैसे ट्रीट करते हैं, इसका प्रभावशाली चित्रण नाटक में किया गया। एक तरफ सत्ता-मीडिया-नौकरशाही है तो दूसरी ओर संघर्ष करता आखिरी आदमी।

नाटक में जिस तरह मुख्यमंत्री की योजनाओं की असलियत सामने आती है। बिहार की वर्तमान में हालत कोई अलग नहीं। नाटक में दा साहब दलितों के लिए योजनाओं की घोषणआ कर रहे होते हैं तो मेरा ध्यान महादलित योजना पर चला गया। उन के लिए जो योजना बनी और उसका हश्र क्या हो रहा है? महादलित आवास भूमि योजना को देखिए। महादलित परिवारों को चिह्नित कर प्रति परिवार 3 डिसीमल जमीन उपलब्ध कराने का प्रावधान है और इधर अररिया से लेकर गया तक इसमें घोटाले सामने आए हैं। अररिया में जहां किसानों से सस्ती जमीन खरीद कर दलालों ने 4 से 5 गुणा कीमत पर सरकार को चंद दिनों के अंदर ही बेच दी थी। वहीं गया में आवंटित धन को अधकारियों में अपनी जेब में रख लिया। राजधानी से लेकर इसके आसपास में ही महादलितों की हालत बद्तर है। राजधानी के दिनकर गोलंबर के पास स्थित दलित आवास में जहां नारकीय स्थिति है, वहीं राजधानी के कुछ ही किलोमीटर दूर बिहटा के मोहम्मदपुर मुसहरी और बेला गांवों में महादलितों की स्थिति बदतर है। एक ही कमरे में पति-पत्नी, बाल-बच्चे सभी रहने को मजबूर हैं। सारे जगहों की हालत ऐसी ही है।महादलित योजना में ही अनुसूचित जाति आवासीय विद्यालय योजना भी है जिसमें 60% महादलित बच्चों के लिए सीट आरक्षित करने का प्रावधान है। और वहीं राजधानी पटना के स्कूलों को बुनियादी सुविधाएं तक मौजूद नहीं। राजधानी के शिवपुरी क्षेत्र में प्राथमिक विद्यालय जहां टूटी-फूटी झोंपड़ी में चल रहे हैं या फिर खुले आसमान में। वहीं कहीं-कहीं तो खतरनाक जर्जर भवन में बच्चों की पढ़ाई हो रही है। अब जब स्कूलों की हालत ऐसी है तो इस तरह की योजनाओं का क्या मतलब बनता है। महाभोज नाटक ऐसी ही योजनाओं की पोल खोलता नजर आता है।

महाभोज में दलितों के जलाए जाने का प्रसंग अभी हाल ही में ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के बाद जलाए गए दलित छात्रावास पर सटीक बैठता है। नाटक के प्रसंग की तरह ही इसमें भी सरकार सामंतवादी तत्वों के सामने घुटने टेक चुकी थी। उस मामले में जिसतरह सरकार ने निष्क्रियता दिखाई थी यह किसी से छिपा नहीं है। अभी हाल ही में मुख्यमंत्री ने खुल्लमखुला भी स्वीकार किया कि ब्रह्मेश्वर की शवयात्रा के दौरान नरमी बरतने और संयम से काम लेने का आदेश उन्होंने ही दिया था।

इस तरह से नाटक बिहार के लिए कुछ ज्यादा ही प्रासंगिक बन पड़ा। एक तरफ जहां मीडिया से लेकर समाज के तथाकथित बुद्धिजीवियों के बीच भी सरकार के खिलाफ आवाज उठाने का काम नहीं हो रहा है। पुरस्कारों और प्रलोभनों के जरिए संस्कृतिकर्मियों, कलाकारों, साहित्यकारों को खरीद लोने और लूट की सत्ता में उन्हें साझीदार बना देने का सिलसिला जारी है। ऐसे हाल में नाटक को हथियार के रुप में इस्तेमाल करके हिरावल ने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की है। बिना किसी सरकारी या एनजीओ-कॉरपोरेट की मदद लिए जनसहयोग की मदद से नाटक प्रस्तुत किया गया। यहां तक कि कलाकारों ने अपने पैसे से खरीद कर मेकअप वगैरह सामान जुटाए। इससे इसकी प्रतिबद्धता जाहिर होती है। इतने गंभीर और पात्रों की बहुलता के बावजूद केवल 27 दिनों में ही हिरावल ने नाटक तैयार कर लिया, जो पूरी तरह सफल रहा। पटना के कालिदास रंगालय में इसका 24 और 25 सितंबर को दो दिनी मंचन किया गया।

सिर्फ बिहार ही नहीं पूरे देश में जिस तरह से निजीकरण, दमन और भ्रष्टाचार का सिलसिला चल रहा है, वह कचोटने वाला है। शिक्षा-पद्धति भी केवल तटस्थ रहने की बात करता है। नाटक में जाति और वर्ग पर शोध करने गांव आया महेश जब कहता है कि हमें परमीशन नहीं है कि गांव की समस्याओं में शामिल हों। पूरी शिक्षा हमें असलियत से दूर आसपास से अनजान रखना चाहती है। हम सिर्फ देखें, तटस्थ होकर देखें। जो कुछ गलत है, उस पर रिएक्ट न करें। क्या मतलब है ऐसी शिक्षा का? तो वह पूरी शिक्षा-पद्धति की असलियत की ओर संकेत करता है। आखिर में उसी के सवाल से नाटक खत्म होता है कि इन हालत में बिना इन्वाल्व हुए रह सकता है कोई? और यह बिल्कुल मौजूं सवाल है। ऐसे हाल में जब दमन और शोषण का दौर चल रहा है। सत्ता सामंतवादियों के साथ है। गरीब और वंचित मारे जा रहे हैं। बिना इन्वाल्व हुए रह सकता है कोई? विकास का ढिंढ़ोरा पीटते सुसाशन बाबू जैसे लोग कब तक असल जिंदगी में नाटक करते रहेंगे? सुशासन बाबू ने नाटक देखा क्या....नहीं देखा होगा...क्योंकि वे तो अभी अभिनय करने अधिकार यात्रा में निकले पड़े हैं


सरोज युवा पत्रकार हैं. पत्रकारिता की पढ़ाई आईआईएमसी से. 
अभी पटना में एक दैनिक अखबार में काम . 
इनसे krsaroj989@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.