भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ध्रुवीकरण का भ्रम और तीसरे मोर्चे की अफवाहें


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सत्येंद्र रंजन 

"...कथित तीसरे मोर्चे के लिए तो यह बिल्कुल ही नहीं हो सकता। इसलिए कि ऐसी कोई सूरत नहीं हो सकती (यह बात पूरी निश्चितता के साथ कही जा सकती है), जब बिना कांग्रेस या भाजपा के साथ गए बाकी दल मिलकर सरकार बना लें। यानी साथ-साथ भ्रष्टाचार विरोधी और सांप्रदायिकता विरोधी कार्ड खेलना मुमकिन नहीं है। इसलिए मौजूदा संसदीय गतिरोध के बीच किसी नए राजनीतिक समीकरण के सूत्र देखना एक निरर्थक प्रयास है।..."

भारतीय जनता पार्टी ने जब कथित कोयला घोटाले में सीधे प्रधानमंत्री से इस्तीफा मांगने और उनके पद छोड़ने तक संसद न चलने देने का ऊंचा सियासी दांव खेला, तो अतीत के दो उदाहरण अवश्य ही उसके प्रेरक रहे होंगे। अतीत के उन दोनों मौकों पर भ्रष्टाचार का मुद्दा कांग्रेस-विरोधी गोलबंदी का आधार बना था। दोनों ही मौकों पर संयुक्त विपक्ष ने सत्ताधारी कांग्रेस को परास्त किया। पहला मौका 1974-77 का था। तब भले जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया, लेकिन असल में पहले गुजरात और फिर बिहार में हुए छात्र आंदोलन का प्रमुख मुद्दा भ्रष्टाचार था। 1977 में इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार की हार के पीछे इमरजेंसी और उस दौरान हुई ज्यादतियों की सबसे बड़ी भूमिका थी, लेकिन इसका बड़ा कारण विपक्ष का जनता पार्टी के रूप में एकजुट होना भी था। इस एकजुटता की शुरुआत कांग्रेस को भ्रष्टाचार का समानअर्थी बताने के शोर के साथ हुई थी। दूसरा मौका 1987-89 का था, जब विश्वनाथ प्रताप सिंह भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाकर कांग्रेस से बाहर आए और विपक्ष के ध्रुवीकरण का केंद्र बन गए। अंततः 1989 के अंत में उन्होंने सरकार बनाई, जो एक तरफ भाजपा और दूसरी तरफ वाम मोर्चे के समर्थन पर टिकी थी।   

वो दोनों मौके बहुत से कांग्रेस विरोधी लोगों के अतीत-मोह का हिस्सा हैं, जिसे दोहराने की कल्पना उनके मानस में जब-तब उत्साह भरती रहती है। वह कल्पना अगर आज फिर से जिंदा हो गई है, तो इसमें कोई हैरत की बात नहीं है। भाजपा के एक हिस्से में यह आशा बलवती हुई हो सकती है कि अगर भ्रष्टाचार फिर से विपक्ष के ध्रुवीकरण का मुद्दा बन जाए, तो उसके नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में नए सहयोगी दलों के आने का सिलसिला शुरू हो सकता है। अगर राजनीति इस दिशा में बढ़ने लगी तो आज नहीं तो 2014 में देश की सत्ता उसके हाथ में आ सकती है। दूसरी तरफ भावी राजनीतिक सूरत को लेकर बढ़ते अनिश्चय ने बहुत से नेताओं के मन में तीसरे मोर्चे की कल्पना फिर जगा दी है।

तीसरा मोर्चे का वजूद 1990 के दशक में राजनीतिक फलक पर उभरा। तब तक देश मंदिर वहीं बनाएंगे के नारे की तीक्ष्णता और उसके परिणामों को देख चुका था। जाहिर है, सांप्रदायिकता एक ऐसी विभाजन-रेखा बन चुकी थी, जिसे नजरअंदाज कर राजनीतिक समीकरण नहीं बन सकते थे। तो उस दौर में राष्ट्रीय मोर्चा-वाम मोर्चा की एक नई सियासी इकाई संसद और कई मौकों पर संसद के बाहर की गतिविधियों में भी उभरी। यह प्रयोग 1996-98 के दौर में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचा, जब केंद्र में संयुक्त मोर्चा की दो सरकारें बनीं। यहां गौरतलब है कि यह गोलबंदी भाजपा विरोध के आधार पर हुई और उन दोनों सरकारों को कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया। 1998-2004 के बीच अनेक मध्यमार्गी एवं खुद को धर्मनिरपेक्ष मानने वाले दल सत्ता के तात्कालिक लाभ एवं अपने राज्यों में चुनावी मुकाबले की व्यावहारिक स्थिति की मजबूरियों के कारण सांप्रदायिकता की विभाजन-रेखा लांघ कर भाजपा के पाले में चले गए। उनमें कुछ दलों ने बाद में उसका साथ छोड़ा। इसका कारण गुजरात में राज्य सरकार के कथित संरक्षण में हुए दंगों को बताया गया। अनेक जानकार मानते हैं कि 2004 में भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन की हार का एक प्रमुख कारण गुजरात का दाग था।

तब से देश में कांग्रेस और भाजपा की धुरियों पर बने गठबंधनों के बीच देश की राजनीति का विभाजन है। 2008 में कांग्रेस से संबंध टूटने के बाद वाम मोर्चे ने तीसरे मोर्चे का प्रयोग किया, लेकिन 2009 के चुनाव परिणामों इसकी अप्रासंगकिता स्पष्ट कर दी। इसी वर्ष अपनी पार्टी कांग्रेस में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने तीसरे मोर्चे के लिए प्रयास न करने की राजनीतिक लाइन तय की।

सवाल है कि क्या आज राजनीतिक स्थिति में इतना आमूल बदलाव आ गया है कि सांप्रदायिकता की विभाजन रेखा महत्त्वहीन हो गई है? या तीसरे मोर्चे की कोई नई प्रासंगिकता उभर आई है? अगर गंभीरता से गौर करें, तो इनमें से कोई भी स्थिति नहीं है। इस संदर्भ में यह बात याद रखने की है कि 1974 या 1989 तक स्थिति यह थी कि स्वतंत्रता के बाद अधिकांश समय तक लोगों ने कांग्रेस का ही राज देखा था। इसलिए विफलताओं और भ्रष्टाचार के साथ उसका नाम जोड़ देना आसान था। कांग्रेस भ्रष्टाचार की गंगोत्री है, जब ये बात जेपी, वीपी या विपक्ष के अन्य नेताओं ने कही, तो इसे मान लेने में लोगों को कोई दिक्कत नहीं हुई। लेकिन 1990 से 2012 का काल वह दौर है, जब ऐसा कोई दल नहीं बचा, जिसका राज केंद्र या राज्यों में लोगों ने नहीं देखा हो। अगर वाम मोर्चे को छोड़ दें, तो भ्रष्टाचार की कालिख किसी भी अन्य पार्टी पर कांग्रेस की तुलना में कम नहीं है। इस हाल में भ्रष्टाचार का मुद्दा सियासी गोलबंदी का आधार हो सकता है, या वैसा गठबंधन विश्वसनीय हो सकता है- यह मानना कठिन है। दरअसल, धीरे-धीरे आर्थिक नीतियों और राजनीतिक चरित्र के विभिन्न पहलुओं पर भी राजनीतिक दलों के बीच फर्क धुंधला होते-होते मिट-सा गया है। इसलिए भाजपा नेताओं का अतीत-मोह उनके भविष्य का रास्ता नहीं हो सकता।

कथित तीसरे मोर्चे के लिए तो यह बिल्कुल ही नहीं हो सकता। इसलिए कि ऐसी कोई सूरत नहीं हो सकती (यह बात पूरी निश्चितता के साथ कही जा सकती है), जब बिना कांग्रेस या भाजपा के साथ गए बाकी दल मिलकर सरकार बना लें। यानी साथ-साथ भ्रष्टाचार विरोधी और सांप्रदायिकता विरोधी कार्ड खेलना मुमकिन नहीं है। इसलिए मौजूदा संसदीय गतिरोध के बीच किसी नए राजनीतिक समीकरण के सूत्र देखना एक निरर्थक प्रयास है। बहरहाल, यह हकीकत है कि कांग्रेस की जमीन उसके पांव के नीचे से खिसक रही है। टीम अन्ना ने ब्रांड मनमोहन को क्षतिग्रस्त कर दिया। अन्ना के आंदोलन को समर्थन देकर भाजपा एवं संघ परिवार ने यह महत्त्वपूर्ण उद्देश्य हासिल किया। अनेक जानकारों की राय है कि भाजपा ने अब विपक्ष के उस स्थल को फिर से हथियाने की कोशिश में अपने तेवर गरम किए हैं, जिस पर पिछले साल टीम अन्ना काबिज हो गई थी। लेकिन  भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष की जमीन हथियाने की उसकी कोशिश इसलिए कामयाब नहीं होगी, क्योंकि गैर-राजनीतिक एवं स्वच्छ नेतृत्व की जो छवि टीम अन्ना गढ़ने में सफल रही, वह अपने अतीत और वर्तमान दोनों के कारण भाजपा नहीं गढ़ सकती।

इन हालात के बीच 2014 में उभरने वाली राजनीतिक सूरत का अनुमान लगाना अभी कठिन है। कांग्रेस को होने वाले नुकसान का लाभ निश्चय ही भाजपा एवं अन्य विपक्षी दलों को मिलेगा। लेकिन उनके बीच कैसे समीकरण बनेंगे, यह नई संसद सामने आने के बाद ही तय होगा। तब यह मुमकिन है कि भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता दोनों ही गौण मुद्दे हो जाएं और सब कुछ अवसरवाद एवं फौरी सियासी फायदे के गणित से तय हो। राजनीतिक जोड़तोड़ के लंबे अनुभव से गुजरने के बाद यह देश जानता है कि पहले भी जब भ्रष्टाचार या सांप्रदायिकता के मुद्दों पर गोलबंदी हुई, तब भी वो बातें दिखावटी थीं। इस बीच उल्लेखनीय यह है कि कांग्रेस विरोधी ध्रुवीकरण की यह कथा त्रासदी के रूप में पहले दोहराई जा चुकी है। 2014 में इतिहास प्रहसन के रूप में ही इसे दोहरा सकता है।  

सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं.  
satyendra.ranjan@gmail.com पर इनसे संपर्क किया जा सकता है.