मीडिया पर विनियमन का फंदा ?

सत्येन्द्र रंजन

 



"...बहरहाल, यह ध्यान में रखने की बात है कि मीडिया ने खुद ही अपने को मुनाफे के तर्क से चलने वाले उद्योग में तब्दील कर लिया है। अगर ऐसे तमाम उद्यागों के उत्पादों की गुणवत्ता एवं प्रतिमानों की निगरानी जरूरी मानी जाती है, तो आखिर मीडिया इस तर्क से क्यों बचना चाहता है?..."


Media cannot reject regulation

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला अजमल आमिर कसाब बारे में दिया, लेकिन उससे हलचल भारतीय मीडिया जगत में भी मची है। बात आगे बढ़ाने से पहले इस पर गौर कर लें कि आखिर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा क्या है। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई पर आतंकवादी हमले के दौरान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भूमिका पर खास  गौर किया। हमले और उस पर सुरक्षा बलों की कार्रवाई के दौरान टीवी न्यूज चैनलों पर लापरवाह लाइव कवरेज की न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायमूर्ति सीके प्रसाद की बेंच ने कड़ी आलोचना की। फैसले के उस हिस्से के आखिर में उन्होंने यह टिप्पणी की- शॉट्स और विजुअल सभी आतंकवादियों के खात्मे और सुरक्षा कार्रवाई के खत्म होने के बाद भी दिखाए जा सकते थे। लेकिन उस हाल में टीवी कार्यक्रम वैसा चुभाउ, सनसनीखेज और भयावह प्रभाव पैदा नहीं करते और चैनलों की टीआरपी तेजी से ऊपर नहीं चढ़ती। इसलिए यह अवश्य माना जा सकता है कि टीवी चैनलों ने मुंबई पर आतंकवादी हमले का जैसा लाइव प्रसारण किया, वैसा करके उन्होंने किसी राष्ट्रीय हित या सामाजिक उद्देश्य की सेवा नहीं की। इसके विपरीत वे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालकर अपने व्यापारिक हित में काम कर रहे थे। ऐसी ही चरम स्थितियों में किसी संस्था की साख की परीक्षा होती है। मेनस्ट्रीम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जिस रूप में मुंबई पर आतंकवादी हमले का कवरेज किया, उससे उन्होंने इस तर्क को बहुत हानि पहुंचाई कि मीडिया का विनियमन सिर्फ मीडिया के अंदर से ही होना चाहिए।

मीडिया अपना विनियमन खुद करे या इसके लिए कोई बाहरी व्यवस्था हो, यह पिछले अनेक वर्षों से बहस का मुद्दा है। जब से न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष बने हैं, इस बहस में और तेजी आ गई है। जस्टिस काटजू मीडिया के विनियमन के समर्थक हैं। उनके नेतृत्व में प्रेस काउंसिल की ताजा पहल उसका यह प्रस्ताव है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी प्रेस काउंसिल के तहत लाया जाए और इस संस्था का नाम भारतीय मीडिया काउंसिल कर दिया जाए। बहरहाल, जस्टिस काटजू चूंकि खुद कोई कदम उठाने में सक्षम नहीं हैं, इसलिए वे सिर्फ सरकार से मांग कर सकते हैं। अपनी मौजूदा स्थिति में केंद्र सरकार मीडिया से कोई वैर लेने की स्थिति में नहीं है, इसलिए मीडिया के कर्ता-धर्ताओं को उनकी बातों की ज्यादा परवाह नहीं हैं। मगर सुप्रीम कोर्ट की स्थिति अलग है। इसलिए प्रेस काउंसिल के ताजा प्रस्ताव पर टीवी चैनलों के संगठन नेशनल ब्रॉडकास्टिंग एसोसिएशन (एनबीए) के अध्यक्ष की यह टिप्पणी गौरतलब है कि वे उससे अधिक सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से चिंतित हैं।          

यहां यह ध्यान में रखने की बात है कि सुप्रीम कोर्ट कोर्ट कार्यवाहियों की रिपोर्टिंग के मामले को पहले ही गंभीरता से ले चुका है। उस पर लंबी सुनवाई के बाद अदालत अपना फैसला सुरक्षित कर चुकी है। अब ये देखने का इंतजार है कि अदालती कार्यवाही की रिपोर्टिंग के बारे में सुप्रीम कोर्ट दिशा-निर्देश तय करता है या नहीं। अगर करता है, तो उसमें क्या सीमाएं तय की जाती हैं। इस मामले में कोर्ट के निर्णय का असर गहरा एवं दूरगामी होगा। इस संदर्भ में यह याद कर लेना भी उचित होगा कि मीडिया की आजादी की सीमाएं क्या हों, इस पर अनेक मंचों पर चर्चा गर्म है। कुछ महीने पहले लोकसभा में कांग्रेस सांसद मीनाक्षी नटराजन ने मीडिया के विनियमन के लिए निजी बिल पेश किया था। उस पर भले संसद में चर्चा नहीं हुई, लेकिन सार्वजनिक मंचों पर उस पर खूब बहस हुई। अतः अगर सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक कार्यवाही की रिपोर्टिंग के लिए ठोस दिशा-निर्देश निर्धारित किए, तो उससे उन तमाम लोगों को तर्क मिलेगा, जो मीडिया की ‘लक्ष्मण रेखाएं’ तय करने के पक्षधर हैं।

अदालती कार्यवाही की रिपोर्टिंग के दिशा-निर्देश तय करने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने सत्रह दिनों तक सुनवाई की। उस दौरान विभिन्न पक्षों की दलील सुनी गई। मुद्दा अंततः संविधान के अनुच्छेदों 19 और 21 की व्याख्या पर आकर टिक गया। सुनवाई के दौरान परस्पर विरोधी तर्क सामने आए। एक पक्ष की तरफ से कहा गया कि यह परिभाषित करना कोर्ट का अधिकार है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किस सीमा पर जाकर जीवन के अधिकार में दखल देने लगती है। तर्क दिए गए कि रिपोर्टिंग की आजादी से अगर किसी की प्रतिष्ठा पर आंच आती है या निष्पक्ष सुनवाई के उसके अधिकार में दखल पड़ता है, अथवा मीडिया मुकदमा पूरा हुए बिना ही किसी दोषी ठहरा देता है, तो इसकी इजाजत नहीं होनी चाहिए। कोर्ट उन मामलों में सुनवाई की रिपोर्टिंग को नियंत्रित कर सकता है। इसके जवाब में यह दलील रखी गई कि प्रेस की आजादी को संविधान में निहित किसी अन्य अधिकार से सीमित नहीं किया जा सकता। इस पक्ष से सवाल उठाया गया कि कोर्ट को रिपोर्टिंग संबंधी आदेश किसी खास मामले में गुण-दोष के आधार पर देना चाहिए या फिर एक सामान्य दिशा-दिशानिर्देश बना दिया जाना चाहिए, जिसकी भविष्य में किसी दायरे तक जाकर व्याख्या की गुंजाइश बनी रह सकती है? 

मुंबई पर आतंकवादी हमले के मामले सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणियों ने इस बहस में नया पहलू जोड़ा है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट प्रेस काउंसिल की तरह दंतहीन नहीं है। ना ही उसके सामने सरकार की तरह की राजनीतिक मजबूरियां हैं। वह संवैधानिक एवं कानूनी पहलुओं की व्याख्या करते हुए अपनी तरफ से मीडिया के लिए दिशा-निर्देश जारी करने या विनियमन की व्यवस्था करने में सक्षम है। अगर उसने अदालती कार्यवाही की रिपोर्टिंग के बारे में कायदे तय किए, तो उसका तार्किक परिणाम मीडिया के व्यापक विनियमन का रास्ता खोलना होगा। लेकिन प्रश्न यह है कि मीडिया आखिर अपने विनियमन से डरता क्यों है? जस्टिस काटजू ने यह अंतर स्पष्ट करने की कोशिश की है कि विनियमन का मतलब नियंत्रण नहीं होता है। इसका मतलब सिर्फ यह है कि मीडिया के दायरे, सीमाओं तथा नैतिकता को परिभाषित किया जाए और उसकी निगरानी के लिए एक ऐसी स्वायत्त संस्था बने, जिसमें मीडिया उद्योग के प्रतिनिधियों समेत विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रतिष्ठित लोग शामिल रहें। इस संदर्भ में ये सुझाव भी दिए गए हैं कि उस संस्था को चुनाव आयोग या नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की तरह संवैधानिक दर्जा दिया जा सकता है। यह स्पष्ट है कि मीडिया के कर्ता-धर्ताओं को ऐसी कोई व्यवस्था भी मंजूर नहीं है।

बहरहाल, यह ध्यान में रखने की बात है कि मीडिया ने खुद ही अपने को मुनाफे के तर्क से चलने वाले उद्योग में तब्दील कर लिया है। अगर ऐसे तमाम उद्यागों के उत्पादों की गुणवत्ता एवं प्रतिमानों की निगरानी जरूरी मानी जाती है, तो आखिर मीडिया इस तर्क से क्यों बचना चाहता है? खैर, विनियमन से बचे रहने की किसी व्यक्ति, संस्था या क्षेत्र की इच्छा समझी जा सकती है। लेकिन चीजें सिर्फ अपनी हसरत से नहीं चलतीं। न्यायपालिका से लेकर संसद और सिविल सोसायटी तक में जारी चर्चाएं यही जाहिर करती हैं कि विनियमन के मुद्दे पर अब समय मीडिया के साथ नहीं है। लोग तेजी से वही महसूस करने लगे हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के माननीय जजों की टिप्पणियों में व्यक्त हुआ है।


सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं.  
satyendra.ranjan@gmail.com पर इनसे संपर्क किया जा सकता है.