उत्तराखंड में वाम पार्टियां अब एक साथ

इन्द्रेश मैखुरी 

"...अब तक कांग्रेस-भाजपा के विरुद्ध मोर्चा बनाने की सारी कोशिशें सिर्फ विधानसभा के चुनावों के वक्त होती रही हैं.चुनाव की घोषणा से कुछ समय पहले शुरू होने वाली ऐसी कोशिशों का शीराजा चुनाव आते-आते बिखर जाता रहा है.पहली बार वाम पार्टियों ने चुनाव लड़ने के लिए नहीं बल्कि एक आंदोलनात्मक कार्यवाही से जनांदोलनो का मोर्चा बनाने की पहल की है...."

त्तराखंड राज्य की मांग सबसे पहले उठाने का श्रेय भले ही अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव कामरेड पी.सी.जोशी के नाम हो पर राज्य बनने के बाद से उत्तराखंड की राजनीति कांग्रेस और भाजपा के इर्दगिर्द ही चलती रही है. पावर पॉलिटिक्स को नियंत्रित करने वाले खिलाडी भी यही चाहते हैं कि राजनीति इन्ही के आसपास सिमट कर रहे ताकि सत्ता में कोई भी बैठा रहे, नीतियां कॉर्पोरेटपरस्त-ठेकेदारपरस्त ही चलें. उत्तराखंड बनने के बारह सालों में बारी-बारी से आने वाले कांग्रेस-भाजपा के शासन में यहाँ की आम जनता ने भ्रष्टाचार को संस्थाबद्ध होते देखा, संसाधनों की लूट देखी, सत्ता की मलाई में हिस्सेदार बनने के लिए कांग्रेस-भाजपा के नेताओं को आपस में जूतमपैजार करने का नजारा भी हर पांच साल में देखा. उत्तराखंड राज्य को लेकर देखे गए तमाम सपने इन बारह सालों में मटियामेट होते चले गए. जनता का कांग्रेस-भाजपा की राजनीति के प्रति मोहभंग हुआ और वैकल्पिक राजनीतिक ताकतों का उभार की आकांक्षा भी जनता की रही. परन्तु किसी ऐसे मोर्चे के न बनने से, जो कांग्रेस-भाजपा का राजनैतिक और विचारधारात्मक विकल्प दे सके, जनता के बीच भी एक निराशा-हताशा का ही प्रसार हुआ. कोई ठोस विकल्प ना उभरने के कारण जनता भाजपा से नाराज होती तो कांग्रेस जीत जाती और कांग्रेस से नाराज तो भाजपा सत्ता तक पहुँच जाती. हर बार ऐन चुनावों के वक्त होने वाली मोर्चा बनाने की कवायद भी असफल ही सिद्ध हुई.

उत्तराखंड के राजनीतिक हालत की गंभीरता को महसूस करते हुए तीन वाम पार्टियों-भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारत के कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी) और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी-लेनिनवादी) की राज्य कमेटियों ने वाम को केंद्र में रख कर वैकल्पिक राजनैतिक मोर्चे की कोशिश चलायी. तीनों वाम पार्टियां लंबे अरसे से आपस में बातचीत करते हुए ये प्रयास करते रहीं कि वाम-जनवादी ताकतों के बीच कुछ मुद्दा आधारित एकता कायम की जा सके. लंबे दौर की वार्ताओं के बाद संयुक्त कार्यक्रमों की शुरुआत करते हुए तीनों वाम पार्टियों-भाकपा,माकपा,भाकपा(माले) ने दस सितम्बर को देहरादून में राज्य की विजय बहुगुणा सरकार की जनविरोधी नीतियों के विरुद्ध महाधरना आयोजित किया. धरने की शुरुआत जनसंस्कृति मंच के राष्ट्रीय पार्षद का.मदन मोहन चमोली ने उत्तराखंड के बारह सालों के शासकवर्गीय छल-छद्मों का बयान करते और इस लंबी लड़ाई को लड़ने के लिए तैयार होने का आह्वान करते का.धन सिंह राणा लिखित गढ़वाली जनगीत को गा कर की. का० पंकज इंकलाबी द्वारा गोरख पाण्डेय की लिखी हुई गजल,रफ्ता-रफ्ता नजरबंदी का जादू बढ़ता जाए है,रुख से उनके रफ्ता-रफ्ता पर्दा हटता जाए है को भी महाधरने की शुरुआत में गाया गया.

ये धरना ऐसे समय में आयोजित किया गया जबकि बहुगुणा सरकार अपने कार्यकाल के 6 महीने की अवधि पूरी कर रही थी.इन 6 महीनो में विजय बहुगुणा सरकार का जनविरोधी चेहरा नजर आना शुरू हो गया है.जो विजय बहुगुणा आये दिन दिल्ली में सोनिया दरबार में दंडवत नजर आते हैं वही बहुगुणा जब आपदा के मारे उत्तरकाशी के लोगों के बीच पहुंचते हैं तो लोगों के सवाल पूछने मात्र से नाराज हो कर लोगों को भजन करने को कह कर लौट पड़ते हैं. वाम पार्टियों ने आपदा पीड़ितों के प्रति सरकार के रवैये की आलोचना करते हुए आपदा पीड़ितों को तत्काल राहत पहुँचाने की मांग की.वाम पार्टियों का तो ये भी कहना था कि चूँकि असिगंगा पर बनने वाली तीन परियोजनाओं के निर्माण में हुए भारी विस्फोटों और मलबा व पेड़ काटे जाने ने आपदा की विभीषिका को बढाने में योग दिया,इसलिए इन परियोजनाओं के निर्माताओं के विरुद्ध लोगों की हत्या का मुकदमा दर्ज होना चाहिए.एक बार फिर सिद्ध हुआ कि बाहर से आने वाले मजदूरों की सुरक्षा के प्रति बेहद उदासीन रवैया अपनाया जाता है,इसलिए वाम पार्टियों ने मांग की कि बाहरी  मजदूरों की पहचान सुनिश्चित करने और उनकी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किये जाने चाहिए.वाम नेताओं ने तो उत्तरकाशी और टिहरी जिलों के आपदा के चपेट में होने के बावजूद विजय बहुगुणा के इस्तीफ़ा देने से खाली हुई टिहरी लोकसभा सीट पर दस अक्टूबर को उपचुनाव की घोषणा को आपदा पीड़ितों के साथ क्रूर मजाक करार दिया.जो लोग आपदा में अपना सब कुछ गंवा चुके हैं,उनके समुचित राहत और पुनर्वास का इंतजाम किये बगैर इस उपचुनाव का औचित्य क्या है?चूँकि विजय बहुगुणा ने जुलाई 2012 में इस लोकसभा सीट से इस्तीफ़ा दिया तो चुनाव करवाने के लिए बाध्यकारी 6 महीने की अवधि जनवरी 2013 में पूरी हो रही है. उपचुनाव की घोषणा होते ही सारा प्रशासनिक अमला आपदा पीड़ितों को उनके हाल पर छोड़ कर उपचुनाव की तैयारियों में जुट गया है.आपदा पीड़ित लोगों के लिए सब कुछ तबाह हो जाना और सड़क व संचार सुविधा विहीन होना,सांसद विहीन होने से ज्यादा बड़ा और गंभीर संकट है.

राज्य बनने के बाद जल,जंगल,जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों की लूट बढ़ने का आरोप वाम नेताओं ने लगाया. कांग्रेस-भाजपा की सरकारें प्राकृतिक संसाधनों को कारपोरेट घरानों के हवाले कर इस प्रदेश को विस्थापितों का प्रदेश बनाने पर तुली हैं.संसाधनों की इस लूट को रोकने के लिए जुझारू जनांदोलन ही रास्ता हैं.वाम नेताओं ने पंचेश्वर जैसे टिहरी से कई गुना बड़े बाँध बनाये जाने का विरोध करते हुए टिहरी बाँध के हानि-लाभ का आकलन करते हुए श्वेत-पत्र जारी करने की मांग की. वाम नेताओं ने कहा कि विजय बहुगुणा के जलविद्युत परियोजना समर्थन के पीछे इंडिया बुल्स कंपनी द्वारा मुख्यमंत्री पद के लिए  वित्तपोषण किया जाना है.विजय बहुगुणा को इंडिया बुल्स के साथ संबंधों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने की मांग भी वाम पार्टियों ने की.

उत्तराखंड की स्थायी राजधानी गैरसैण बनाये जाने की मांग उत्तराखंड की जनता की लोकप्रिय मांग है.तीनों वाम पार्टियों ने भी गैरसैण को राजधानी बनाये जाने का पुरजोर समर्थन किया और कहा कि गैरसैण में मंत्रीमंडल की बैठक की घोषणा जैसी बातों को राजनीतिक स्टंट करार दिया.

पिछले बारह सालों में कांग्रेस-भाजपा ने राज्य में भ्रष्टाचार को खूब पाला-पोसा है.भाजपा ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि 2002 से 2007 के शासनकाल में कांग्रेस ने 56 घोटाले किये.वहीँ कांग्रेस ने  भाजपा पर 65 घोटालों का आरोप लगाया. वाम पार्टियों ने कांग्रेस और भाजपा शासनकाल के सभी घोटालों की सी.बी.आई.जांच की मांग की है.

उत्तराखंड राज्य आंदोलन में पलायन से निजात पाना एक बड़ा सवाल था.लेकिन राज्य बनने के बारह सालों में पहाड़ से पलायन की गति और बढ़ गयी है.जनगणना के हालिया आंकड़े बताते हैं कि पौड़ी और अल्मोड़ा जिलों में सर्वाधिक पलायन हुआ है.वाम नेताओं ने आरोप लगाया कि बड़े पैमाने पर हो रहे इस पलायन के लिए राज्य में एक के बाद एक आने वाली कांग्रेस-भाजपा की सरकारों का उपेक्षापूर्ण रवैया जिम्मेदार है.वाम नेताओं का कहना था कि पलायन को रोकने के लिए जरुरी है कि पर्वतीय कृषि को आर्थिकी का आधार बनाया जाए.इसके लिए भूमि सुधार और अनिवार्य चकबंदी जैसे उपाय करने होंगे.साथ ही यहाँ के उत्पादों के खरीद की गारंटी,न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी सुविधाएँ भी सरकार को उपलब्ध करवानी होंगी.लेकिन सरकारों की अदला-बदली करने वाली कांग्रेस-भाजपा के लिए ना तो पलायन कोई सवाल है,ना पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि उसके एजेंडे में है.

उत्तराखंड में खत्तावासी-वनवासी-वनगुजरों की लाखों की आबादी गुलामों जैसा जीवन गुजार रही है,सामान्य नागरिक सुविधाएँ तक इन्हें हासिल नहीं हैं.खत्तावासियों-वनवासियों-वनगुजरों को भूमि का मालिकाना अधिकार दिये जाने था खत्तों और वनगाँवों में पंचायतों का गठन करने की मांग वाम पार्टियों के इस महाधरने में उठायी गयी.

आजकल राज्य में प्रोमोशन पर आरक्षण के मामले में चल रही बहस पर टिपण्णी करते हुए वाम नेताओं ने कहा कि वे समाज के निचले पायदान पर खड़े दलित-वंचित हिस्सों के साथ अपने को एकताबद्ध करते हैं और आरक्षण को वर्तमान सामाजिक स्थितियों की जरुरत मानते हैं.शासक पार्टियां पर आरक्षण के नाम पर कर्मचारियों को आपस में लड़वाने और उनकी एकता तोड़ने का आरोप भी वाम नेताओं ने लगाया.

राज्य में ट्रेड यूनियन अधिकारों पर हो रहे हमले पर वाम नेताओं ने आक्रोश प्रकट किया.उनका आरोप था कि सरकार पूंजीपतियों को  मुनाफा दिलवाने में मजदूरों के अधिकारों को पूरी तरह रौंद डालना चाहती है.राज्य के औद्योगिक आस्थानो में मजदूर मामूली मजदूरी पर  लगभग नारकीय स्थितियों में काम करने को मजबूर किये जा रहे हैं.किसी तरह की सुविधा या अधिकारों की मांग करना नौकरी से बेदखली को निमंत्रण देना है.यूनियनों के पंजीकरण को हर संभव मुश्किल बनाने में श्रम विभाग फैक्ट्री मालिकों के साथ खडा दिखता है.इन औद्योगिक आस्थानो में पुलिस और प्रशासन की भूमिका फैक्ट्री मालिकों के लठैतों जैसी है.वाम पार्टियां ने मांग की कि  राज्य में श्रम क़ानूनों का पालन हर हाल में सुनिश्चित किया जाए तथा यूनियनों का पंजीकरण समयबद्ध और बिना भेदभाव के किया जाए.

राज्य में क़ानून व्यवस्था की हालत बेहद खराब है.राजधानी देहरादून में ही लगातार,लूट,चैन स्नैचिंग आदि की वारदातें आम होती जा रही है.राज्य बनने के बाद महिलाओं पर  हमले की घटनाएँ भी बढ़ी है.बीती दस जुलाई को लालकुंआ में आठ साल की बच्ची संजना की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गयी.श्रम मंत्री के क्षेत्र में घटी इस जघन्य घटना में मंत्री के आश्वासन के बावजूद एक भी अपराधी नहीं पकड़ा जा सका. राज्य में क़ानून व्यवस्था की बिगड़ती हालत पर वाम पार्टियों के महाधरने में गंभीर चिंता प्रकट की गयी. है.

पी.पी.पी.मोड के नाम पर सार्वजानिक संपत्ति को पूंजीपतियों के हाथ सौंपने की राज्य सरकार की मंशा है.दरअसल पी.पी.पी.मोड की पूरी अवधारणा ही सार्वजानिक धन से खड़े ढांचे से पूंजीपतियों को मुनाफा देने की है.पिछले दिनों चीनी मीलों को पी.पी.पी.मोड पर देने की राज्य सरकार की मंशा जनदबाव के चलते पूरी नहीं हो सकी.परन्तु ये फैसला भी स्थगित किया गया है रद्द नहीं किया गया है.वाम पार्टियों ने  पी.पी.पी. के नाम पर राज्य की परिसंपत्तियों को पूंजीपतियों के हवाले करने का पुरजोर विरोध किया.

राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की बदतर स्थिति पर वाम पार्टियों के महाधरने में रोष प्रकट किया गया.वाम नेताओं का कहना था कि अधिकाँश सरकारी अस्पतालों में ना डाक्टर है,ना दवाइयां,यहाँ तक कि हल्द्वानी और श्रीनगर के मेडिकल कॉलेज भी मरीजों को निजी अस्पतालों को रेफर करने के केंद्र ही बने हुए हैं.5-6 सितम्बर को हल्द्वानी के सुशीला तिवारी मेडिकल अस्पताल में जिस तरह डाक्टरों,तीमारदारों और छात्रों के बीच मारपीट की घटना हुई तथा बाद में पुलिस द्वारा भी जो मारपीट की गयी,वो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है.इस घटना की उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा जांच की मांग वाम पार्टियों ने उठाई.साथ ही स्वास्थ्य सुविधाओं को चुस्त-दुरुस्त करने के लिए सभी सरकारी अस्पतालों में  डाक्टरों तथा अन्य मेडिकल स्टाफ की तैनाती और दवाओं के इंतजाम की मांग भी की गयी. सबको खाद्य सुरक्षा और सार्वजानिक वितरण प्रणाली को मजबूत करने,खराब सड़कों को दुरुस्त करने जैसे कई मांगें वाम पार्टियों के महाधरने में उठाई गयी.

इस महाधरने की अध्यक्षता माकपा के राज्य सचिव का.विजय रावत,भाकपा की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य का.समर भंडारी और भाकपा(माले) के स्थायी समिति सदस्य का.राजा बहुगुणा की तीन सदस्यीय अध्यक्षमंडल ने की.माकपा की ओर से का.बच्चीराम कौंसवाल,का.गंगाधर नौटियाल,का.वीरेंद्र भंडारी,का.सुरेन्द्र सिंह सजवाण,का.इंदु नौडियाल और का.शिव प्रसाद देवली,भाकपा की ओर से राज्य सचिव का.आनंद सिंह राणा,अशोक कंडवाल,का.महिपाल बिष्ट,का जीत सिंह व का.अशोक शर्मा तथा भाकपा(माले) की ओर से का.पुरुषोत्तम शर्मा,का.के.के.बोरा,का.मान सिंह पाल,का.अतुल सती और का.मालती हालदार ने धरने को संबोधित किया.उत्तराखंड महिला मंच की केंद्रीय संयोजक कमला पन्त ने भी धरने को संबोधित किया और उत्तराखंड लोकवाहिनी के बसंत खनी,चेतना आंदोलन के त्रेपन चौहान,हिमालय बचाओ आंदोलन के समीर रतूडी ने धरने को समर्थन दिया.

भाकपा(माले) के राज्य स्थायी समिति सदस्य कामरेड राजा बहुगुणा ने कहा कि उत्तराखंड को कांग्रेस-भाजपा की राजनीती और उनकी लम्पट दलाल संस्कृति को तभी शिकस्त दी जा सकती है जब कि जनसंघर्षों की राजनीती को मजबूत किया जाए.उन्होंने कहा कि जनसंघर्षों की मजबूती से ही उत्तराखंड में विकल्प का निर्माण होगा.

माकपा के राज्य सचिव कामरेड विजय रावत ने कहा कि राज्य में वैकल्पिक राजनीतिक ताकत खडी करने के अनिवार्य शर्त है कि वामपंथ उसके केंद्र में हो.

भाकपा के राष्ट्रीय परिषद के सदस्य कामरेड समर भंडारी ने कहा कि वाम पार्टियां कामरेड चंद्र सिंह गढ़वाली और कामरेड नागेन्द्र सकलानी की परम्परा की वारिस हैं और समझौताविहीन संघर्षों की परम्परा को वाम पार्टियां आगे बढ़ाएंगी.

तीनों वाम पार्टियों का देहरादून में आयोजित यह महाधरना एक महत्त्वपूर्ण घटना है.वाम पार्टियों की निचली कतारों ने भी इस महाधरने का उत्साहजनक स्वागत किया. सी.पी.आई.के एक स्थानीय नेता ने महाधरने पर टिपण्णी करते हुए कहा-देर आयद,दुरुस्त आयद.उत्तराखंड महिला मंच की केंद्रीय संयोजक कमला पन्त ने कहा कि वाम पार्टियों का ये संयुक्त धरना ,उनके जैसे निरंतर संघर्ष में रहने वाले संगठनो के लिए भी उम्मीद जगाने वाला है कि साझा संघर्षों के जरिये राज्य के हालात को बदला जा सकता है.

अब तक कांग्रेस-भाजपा के विरुद्ध मोर्चा बनाने की सारी कोशिशें सिर्फ विधानसभा के चुनावों के वक्त होती रही हैं.चुनाव की घोषणा से कुछ समय पहले शुरू होने वाली ऐसी कोशिशों का शीराजा चुनाव आते-आते बिखर जाता रहा है.पहली बार वाम पार्टियों ने चुनाव लड़ने के लिए नहीं बल्कि एक आंदोलनात्मक कार्यवाही से जनांदोलनो का मोर्चा बनाने की पहल की है.वाम पार्टियां अगर इस अभियान को आगे बढ़ा पायें तो विधानसभा के भीतर भले सत्ताधारी कांग्रेस और विपक्षी भाजपा की नूराकुश्ती चले पर सड़कों पर तो वाम की अगुवाई में तमाम जनवादपसंद ताकतें विपक्ष बन कर कारपोरेटपरस्त-ठेकेदारपरस्त सरकारों को चुनौती दे ही सकती है.

इन्द्रेश भाकपा (माले) के सक्रिय कार्यकर्ता हैं. 
इनसे इंटरनेट पर indresh.aisa@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.