भारत-पाक के बीच बनते रिश्तों के पुल

सत्येंद्र रंजन
...इस सवाल को हमेशा के लिए निपटा लिए जाने की जरूरत है। आज इसके लिए उपयुक्त स्थितियां हैं। ये स्थितियां दीर्घ, मध्य एवं अल्पकालिक अनुभवों से पैदा हुई हैँ। इनके आधार पर हम पाकिस्तान और उससे भारत के रिश्तों प्रति एक यथार्थपरक समझ बनाने में सफल हो सकते हैं। इस सच्चाई को स्वीकार करने की आवश्यकता है कि दोनों देशों में ऐसी ताकतें हैं, जो मानती हैं कि भारत और पाकिस्तान के संबध सामान्य नहीं हो सकते....


पिछले हफ्ते विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने इस्लामाबाद में भारत और पाकिस्तान के संबंधों में बदले माहौल का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दो साल पहले भारत-पाक वार्ता के क्रम में जब वे इस्लामाबाद आए थे, तो उस समय पाकिस्तान संबंधों में कदम-दर-कदम सुधार का नजरिया अपनाने को तैयार नहीं था। लेकिन अब उसने यह राह अपना ली है। साझा प्रेस कांफ्रेंस में उनके साथ खड़ीं पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार ने कहा कि आपसी संबंधों के मामले में हमें इतिहास का बिना बंधक बने उससे सीखने की जरूरत है। उन्होंने कहा- हम मतभेदों पर सिमटे नहीं रहेंगे, बल्कि हम बातचीत से सहमति बनाने की कोशिशों में जुटे हैं। इस नजरिए का सबसे ठोस नतीजा दोनों देशों के बीच वीजा की शर्तों को आसान बनाने के समझौते के रूप में सामने आया।

इसका अगला ठोस परिणाम इस साल अंत में पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के भारत दौर के रूप में देखने को मिल सकता है। उम्मीद है कि पाक टीम अगले क्रिसमस के समय भारत में होगी। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने कुछ समय पहले उसे तीन वन डे और दो टी-20 मैचों की श्रृंखला खेलने के लिए आमंत्रण देने का एलान किया था। संकेत हैं कि भारत सरकार इस दौरे को जल्द ही हरी झंडी दे देगी। दरअसल पिछले वर्ष पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी जब विश्व कप का सेमीफाइनल देखने मोहाली आए थे, तभी ऐसी खबरें थीं कि दोनों देशों के बीच दोतरफा क्रिकेट संबंध फिर शुरू करने पर सहमति बन गई है। सेमीफाइनल में भारत और पाकिस्तान की टीमें आमने-सामने थीं। यह संयोग बनने पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने गिलानी को मैच देखने आने का न्योता दिया था। उस मुलाकात ने नवंबर 2008 में मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद दोनों देशों में बातचीत के टूटे तार को फिर से जोड़ने में एक अहम भूमिका निभाई। अब दोनों देशों की वार्ता प्रक्रिया ठोस स्वरूप ले चुकी है। विभिन्न मंत्रालयों के सचिवों के साथ-साथ विदेश मंत्री स्तर की वार्ता का भी सिलसिला बन गया है। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी अनौपचारिक यात्रा पर दिल्ली आकर मनमोहन सिंह के साथ लंच कर चुके हैं। पाकिस्तान की इच्छा है कि मनमोहन सिंह इस्लामाबाद की यात्रा करें। एसएम कृष्णा के हाल के इस्लामाबाद दौरे के समय भारत ने इस बारे में कोई वादा नहीं किया। यही बात दोहराई गई कि डॉ. सिंह तब इस्लामाबाद जाएंगे, जब विवादित मुद्दों पर किसी ठोस सफलता की संभावना होगी। अभी हकीकत यही है कि कई स्तरों पर कई दौर वार्ताओं के बावजद कुछ ठोस हासिल नहीं हुआ है। कश्मीर मसला तो दूर की बात है, सियाचिन की समस्या भी जस की तस है, सर क्रीक पर बात आगे नहीं बढ़ी है। जल विवाद अंतरराष्ट्रीय पंचाट तक गए हैं और इस पर पाकिस्तान में भावनाएं उग्र रही हैं। उधर भारत की मुख्य चिंता- सीमापार से संचालित आतंकवाद- पर पाकिस्तान ने कोई ठोस और विश्वसनीय कदम नहीं उठाया है। कृष्णा के दौरे के समय भी 26/11 के दोषियों को सजा दिलवाने में सहयोग का उसने सिर्फ वादा ही किया।

ऐसे में भारत में कुछ हलकों से ये सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर रिश्तों में इतनी पेचीदगियों के बावजूद क्रिकेट खेलने की जल्दबाजी क्या है? दरअसल, मुंबई में मराठी मानुस के हितों के स्वघोषित ठेकेदारों ने एक टीवी शो में पाकिस्तानी गायकों को बुलाने को बड़ा मुद्दा बनाने के बाद यह धमकी जारी कर रही दी है कि वे पाकिस्तानी क्रिकेटरों को भारत की जमीन पर नहीं खेलने देंगे। ये ऐसी पृष्ठभूमि है, जिस कारण जब कभी भारत-पाकिस्तान के क्रिकेट की बात होती है, तो चर्चा दोनों टीमों की ताकत या खिलाड़ियों के हुनर की नहीं होती। बात दुश्मनी के इतिहास और इस पर टिक जाती है कि जब सचमुच का दोस्ताना नहीं है तो क्रिकेट खेलने की रस्म-अदायगी क्यों?   

इस सवाल को हमेशा के लिए निपटा लिए जाने की जरूरत है। आज इसके लिए उपयुक्त स्थितियां हैं। ये स्थितियां दीर्घ, मध्य एवं अल्पकालिक अनुभवों से पैदा हुई हैँ। इनके आधार पर हम पाकिस्तान और उससे भारत के रिश्तों प्रति एक यथार्थपरक समझ बनाने में सफल हो सकते हैं। इस सच्चाई को स्वीकार करने की आवश्यकता है कि दोनों देशों में ऐसी ताकतें हैं, जो मानती हैं कि भारत और पाकिस्तान के संबध सामान्य नहीं हो सकते। मसलन, पाकिस्तान की धार्मिक कट्टरपंथी ताकतें आज भी विभाजन के अपूर्ण एजेंडे को पूरा करने की कसम खाते सुनी जाती हैं। इसका मतलब भारत को धार्मिक आधार पर खंड-खंड कर देने तक चैन नहीं लेना होता है, ताकि यह सिद्ध हो सके कि भारत की धर्मनिरपेक्षता फर्जी और दो-राष्ट्रों का वह सिद्धांत सही था, जिसके आधार पर भारत का बंटवारा हुआ था। पाकिस्तानी फौज का बड़ा हिस्सा आज भी भारत को दुश्मन मानने और उससे अनवरत युद्ध के सिद्धांत से प्रेरित और संचालित होता है। उसके नजरिए में स्वाभाविक रूप से संबंधों में सुधार की बातें सिर्फ फ़ौरी हैं, जिनका कोई टिकाऊ नतीजा नहीं निकलना है।

भारत में संघ परिवार और उसके समर्थक तबके अब अखंड भारत (यानी पाकिस्तानी इलाके को फिर से भारत में लाने) की बात पहले जैसे उत्साह नहीं करते। लेकिन उन्होंने पाकिस्तान के साथ सह-अस्तित्व की सोच अपना ली है, उनके विमर्श से यह कतई जाहिर नहीं होता। सोच की यह धारा पाकिस्तान को शत्रु के रूप में चित्रित कर उसे राजनीतिक गोलबंदी का मुद्दा बनाए रखती है। ऐसे में पाकिस्तान से कदम-दर-कदम संबंधों में सुधार या सामान्य ढंग से उसके साथ क्रिकेट खेलने की बातों पर उनकी प्रतिक्रिया उग्र हो जाती है। यह स्थिति इसके बावजूद है कि संघ परिवार से ही आए अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री बने, तो बस से लाहौर जाकर मीनार-ए-पाकिस्तान की यात्रा की और छह साल के उनके शासन काल का अंत पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने के साथ हुआ था। दरअसल वाजपेयी का शासनकाल पाकिस्तान के संदर्भ में उथल-पुथल भर रहा। उल्लेखनीय यह है कि कारगिल, कंधार अपहरण कांड और संसद पर हमले जैसी बड़ी घटनाओं के बावजूद बतौर प्रधानमंत्री वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है।

इसी लाइन को मनमोहन सिंह ने आगे बढ़ाया है। उन्होंने इसे इस रूप में व्यक्त किया है कि हम दोस्त चुन सकते हैं, लेकिन पड़ोसी नहीं। यह महत्त्वपूर्ण घटना-विकास है कि अब पाकिस्तान में न सिर्फ वहां की सिविल सोसायटी, बल्कि वहां की सत्ताधारी पार्टी के नेता भी अपने बयानों में इस समझ को व्यक्त करने लगे हैं। यानी दोनों देशों के राजनीतिक एवं सिविल सोसायटी के दायरे में एक बड़ा तबका यह मानने लगा है कि दोनों देशों को अपने रिश्ते सुधारने होंगे। इसका रास्ता यही है कि मतभेदों को मंजूर करते हुए पहले सहमति के क्षेत्रों की तलाश की जाए और उसमें आगे बढ़ा जाए। यह मॉडल भारत और चीन के संबंधों में कारगर एवं कामयाब रहा है। भारत एवं पाकिस्तान के लिए भी इससे बेहतर कोई रास्ता नजर नहीं आता। इस नजरिए का व्यावहारिक रूप व्यापार, कला और संस्कृति के क्षेत्रों में दिखने लगा है। मगर दोनों देशों में क्रिकेट का जैसा जुनून है, वैसा शायद ही जीवन के किसी और पक्ष का हो। ऐसे में उनके बीच क्रिकेट से बेहतर पुल और क्या हो सकता है? यही प्रश्न इस सवाल का जवाब है कि इतनी समस्याओं के रहते दोनों देश आखिर क्रिकेट क्यों खेलें?


सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं.  
satyendra.ranjan@gmail.com पर इनसे संपर्क किया जा सकता है.