नागौर के कीसान छोड़ देंगे किसानी?


विनय सुल्तान

हालांकी जिस क्षेत्र में मैं पहुँच पाया वहां उत्पादन का औसत 8 से 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. बाज़ार में बाजरे की वर्तमान कीमत 1450 से 1500 रुपये है. ऐसी स्थिति में यदि हम अत्यधिक सकारात्मक हो कर भी सोचें तो प्रति हेक्टेयर एक किसान को 1800 से 2000 रुपये की बचत होती है. उसमे भी अगर बारिस समय पर हो और खाद बीज समय पर उपलब्ध हो जाये. हमारे अन्नदाता के साथ हमारी व्यवस्था कितना न्याय कर रही है?

बात शुरू करते हैं आनंद पटवर्धन की प्रसिद्द डॉक्युमेंट्री “राम के नाम" से. इस डॉक्युमेंट्री में एक दृश्य में सड़क किनारे खड़े तीन किसान बतिया रहे है. उनमे से एक किसान बड़ी वेदना से कहता है “बस का है कि हम लोगों का गल्ला भर सस्ता है, बाकि सब महंगाई है.” हम सब बचपन से पढ़ते आये हैं की भारत एक कृषि प्रधान देश है. भारत की 70 फीसदी आबादी गाँव में जीती है. इस सन्दर्भ में मुझे अरुंधती रॉय ज्यादा प्रासंगिक लगाती हैं. वो कहती है “भारत गावों में जीता नहीं है, भारत गावों में मर रहा है”

इन दिनों मैं राजस्थान में थार के किनारे बसे जिले नागौर के गांवों में घूम रहा हूँ. जहाँ मरुस्थलीय और अर्ध मरुस्थलीय भौगोलिकताओं का मिश्रण. सूखा, फ्लोराइड, निम्न भूजल स्तर, और मरुस्थल में जिंदगी के लिए लगातार चलने वाला संघर्ष जारी है. चलिए जानने की कोशिश करते हैं इसी संघर्ष की कहानी.

खेत से गोदाम तक ...

मरुस्थलीय भाग होने के कारण यहाँ की पूरी कृषि मानसून पर टिकी हुई है. बाजरा यहाँ प्रमुखता से खाया और उगाया जाता है. मुख्य खरीफ फसल के रूप में बाजरा लगभग 5 लाख हेक्टेयर में बोया जाता है. बाजरे की बुवाई प्रति हेक्टेयर लागत और उत्पादन का हिसाब-किताब कुछ इस तरीके से है.

खेती की शुरुवात होती है जुताई और बुवाई से. ट्रेक्टर से जुताई करवाने की चालू दर है 450 रु.प्रति घंटा. एक हेक्टर जुताई में लगभग चार घंटे का समय लगता है. इसके अतिरिक्त 300 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बीज का भी जोड़ लीजिए. पूरी फसल मानसून पर आधारित है. अगर समय पर बारिस नहीं हुई तो यह प्रक्रिया दोहरानी भी पड़ सकती है.

           मद
         खर्च
बुवाई और जुताई
1800
बीज
1500
खाद {डी.ए.पी. और यूरिया }
1860
मजदूरी
6000
ढुलाई और अन्य

1500
योग
12660

इसके बाद खेत में खाद डाली जाती है. कृषि विभाग की माने तो प्रति हेक्टेयर लगभग 50 किलो डी.ए.पी. और 100 किलो यूरिया डाली जानी चाहिए. खाद को अब मुक्त बाज़ार के हवाले कर दिया गया है. डी.ए.पी. की कीमते इसी साल 30 फीसदी बढ़ कर 1260 रुपये प्रति 50 किलो हो गई हैं. इसके अलावा यूरिया का समय से उपलब्ध नहीं होना भी बड़ी समस्या है. यूरिया की वर्तमान कीमत है 300 रु.प्रति 50 किलो.इस हिसाब से खाद का कुल खर्च हुआ 1860 रुपये.

निराई–गुड़ाई में प्रति हेक्टेयर 15 मजदूरों की जरुरत होती है और इतने ही मजदूरे की जरुरत कटाई के समय होती है. मनरेगा के बाद से मजदूरी दरो में सीधा उछाल देखा गया है. जहाँ मजदूरी की दर 80 से 100 रुपये हुआ कराती थी वो अब 200 रुपये है. यानि की कुल मजदूरी का खर्च हुआ 6000 रुपये. यानि एक हेक्टेयर का कुल जमा खर्च हुआ 12660 रुपये...

खेत से बनिए के गोदाम तक का ये सफ़र पांच महीने का है. पांच महीने की हाडतोड़ मेहनत का जो प्रतिफल किसान को मिलता है वो रोंगटे खड़े कर देने वाला है. सांख्यकी विभाग के उपलब्ध आंकड़ों के हिसाब से जिले में प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन 636 किलोग्राम है.

       वर्ष 
उत्पादन प्रति हेक्टेयर {किलोग्राम में}
20003-04
996
2004-05
447
2005-06
530
2006-07
469
2007-08
737
औसत
636

हालांकी जिस क्षेत्र में मैं पहुँच पाया वहां उत्पादन का औसत 8 से 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. बाज़ार में बाजरे की वर्तमान कीमत 1450 से 1500 रुपये है. ऐसी स्थिति में यदि हम अत्यधिक सकारात्मक हो कर भी सोचें तो प्रति हेक्टेयर एक किसान को 1800 से 2000 रुपये की बचत होती है. उसमे भी अगर बारिस समय पर हो और खाद बीज समय पर उपलब्ध हो जाये. हमारे अन्नदाता के साथ हमारी व्यवस्था कितना न्याय कर रही है?

महात्मा गाँधी रोजगार गारंटी योजना माने - हे राम! ....

2006-07 में जब राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम लागु हुआ तब वाम समर्थित यु.पी.ए. ने अपनी पीठ ठोकने में कोई कमी नहीं छोड़ी. देश भर के प्रगतिशील जनवादी तबके में इसका स्वागत किया गया. सालों से आर्थिक शोषण और अंधी बेरोजगारी से ग्रसित हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए इसे वरदान साबित होना चाहिए था पर ऐसा हुआ नहीं. दरअसल पूरी मनरेगा परियोजना का सबसे बड़ा पेंच यह है की इसमे भुगतान काम के घंटों की बजाए काम के परिमाण पर होता है. मसलन यदि आप 1 फीट गहराई , 10 फीट लम्बाई  और 5 फीट चौड़ाई का एक गढ्ढा खोदते हैं तो आपको पूरा भुगतान किया जायेगा अन्यथा काम के अनुपात में आप को पैसा दिया जायेगा. इस व्यवस्था के चलते अक्सर पूरा भुगतान नहीं मिलता. कई गावों में श्रमिकों की नामावली देखने पर पता चलता है की औसतन भुगतान 80 से 90 रु. के बीच हुआ है. साथ ही भ्रष्टाचार की शुरुवात ग्रामसेवक और पटवारी के स्तर से हो जाती है.

यहां सरकारी आंकडे कुछ और ही कह रहे हैं. राज्य सरकार के अनुसार दिसम्बर 2011 तक 15.72 करोड़ रोजगार दिवस सृजित कर  2,293.74  करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका है. इसके हिसाब से प्रति रोजगार दिवस का भुगतान 146 रु. बैठता है. यह तय 133 रुपये से भी 13 रुपये अधिक है. अब महात्मा गाँधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को देख कर मुहं से “हे राम” ही तो निकलेगा....

ऐसे ही चलता रहा तो छोड़ देंगे किसानी ......

गाँव में अगर आप किसी से पूछ लें कि “खेती में कितनी बचत है ?“ तो अचानक उसके चहरे पर गुस्से और बेबसी के भाव एक साथ बिखर जाते हैं. यही हमारी व्यवस्था का सबसे सटीक मूल्यांकन है. इस सवाल के जवाब में रायधनु के मांगना राम कहते हैं “पिछले चार साल से एक भी पैसा बचत नहीं कर पाया हूँ. मेरा घर कैसे चल रहा है ये मेरा दिल जनता है या फिर..” मांगना राम का हाथ आकाश की तरफ उठ जाता है. चुंटीसरा गाँव के जयराम मेहरा गुस्से से भर कर कहते है “ये तो ठीक है जुताई और मजदूरी हम फसल कटने के बाद देते हैं नहीं तो कोई भी खेती नहीं कर सकता. अगर ऐसा ही चलता रहा तो किसान किसानी छोड़ देगा.”

गौरतलब है की 2006 में बनी स्वामीनाथन कमिटी के अपनी सिफ़ारिशो के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य बाज़ार मूल्य से  50 फीसदी अधिक होना चाहिए. इस 50 फीसदी वृद्धि को किसान के मेहताने के रूप में न्यायोचित ठहराया गया था. हर साल सरकार एक समर्थन मूल्य जारी करती है. पर सरकारी पैमाने इतने कठोर हैं की इन पर ज्यादातर किसानो की फसल खरी नहीं उतरती है. किसान उपज को सहकारी गोदाम में भी नहीं रख सकता है क्योंकि, अव्वल तो वहाँ जगह नहीं है और दूसरा वहां की छत भी जगह-जगह से टपक रही है. वो मंडी में नोचे जाने को मजबूर है. हाथ में चंद कागज के टुकडे लिए वो ठगा सा घर चला जाता है. उधर केंद्र में बैठी सरकार योजना पर योजना ठोंक रही है. इस्तेहारों में किसान का मुहं अब भी चमक रहा है. बच्चे अब भी स्कूलों में पढ़ते हैं “भारत एक कृषि प्रधान देश है.”

विनय युवा पत्रकार हैं. पत्रकारिता की पढ़ाई आईआईएमसी से. 
vnyiover4u@gmail.com पर इनसे संपर्क कर सकते हैं.