उत्तरकाशी की इस तबाही का जिम्मा किसका है?


(इन्द्रेश मैखुरी पिछले दिनों , प्राकृतिक आपदा के बाद राहत की आपदा झेल रहे उत्तरकाशी के हालात देख आये हैं. वहीँ से लौटकर उन्होंने प्रैक्सिस को ये रिपोर्ट भेजी है.पढ़ें.. -मॉडरेटर)

इन्द्रेश मैखुरी 

"...जब-जब प्राकृतिक आपदाएं आती हैं, तब-तब पूरा सरकारी अमला भी असहाय दिखाई देता है. जिस आपदा प्रबंधन के नाम की वर्ष भर माला जपी जाती है, वो आपदा के समय कहाँ लापता हो जाता है, ये कोई नहीं जानता..."

दी का अत्याधिक चौड़ा पाट और उसमें सैकड़ों की तादाद में पेड़ और बड़े-बड़े बोल्डर,खंडहर में तब्दील नदी किनारे बसे घर और होटल,उन में ऐसी रेत और सनाट्टा पसरा हुआ है कि लगता ही नहीं कि कभी इनमें कोई चहल-पहल भी रही होगी.भारी-भरकम पुल नदी के बहाव में सूखे तिनके की तरह धराशायी हो गए.आग समेत तमाम आपदाओं के समय राहत कार्यों के लिए जिम्मेदार फायर स्टेशन स्वयं ही आपदा का शिकार हो कर मटियामेट हो चुका है. बस यही नजारा है उत्तरकाशी में हुई भीषण तबाही के बाद का. मनुष्यों की प्यास बुझाने वाला शीतल-निर्मल पानी जैसे इस इलाके में अपनी मारक क्षमता का प्रदर्शन करने पर उतारू हो गया था.

तीन अगस्त की रात को उत्तरकाशी के दयारा बकरिया टाप पर बदल फटने की घटना हुई जिसके बाद आई भीषण बाढ़ में सबकुछ जलमग्न हो गया. 250 से ज्यादा घर,होटल और सरकारी भवन बाढ़ की भेंट चढ गए.उत्तरकाशी के पचास किलोमीटर के दायरे में असी गंगा और भागीरथी जहाँ-जहाँ से होकर गुजरती है,वहाँ विनाश के चिन्ह सर्वत्र नजर आते हैं. भटवाडी तहसील के नौगांव,भंकोली,गजौली,चींवां,गंगोरी,पिलंग,सेकु आदि ग्यारह गाँव इस तबाही की चपेट में आ गए.इन सभी गांव के संपर्क मार्ग,सड़कें और पुल पूरी तरह ध्वस्त हो गये.असी गंगा और वरुणा गाड के संगम पर बसा और सात गांव का केंद्र संगमचट्टी का पूरा बाजार ही जमींदोज हो गया.यहाँ चालीस दुकाने नदी के मलबे में दफ़न हो गयी.छोटे-बड़े करीब सोलह पुल बह गए.उत्तरकाशी शहर को जोशियाड़ा से जोड़ने वाला झूलापुल बाढ़ की भेंट चढ गया और उत्तरकाशी को तिलोथ से जोड़ने वाला भी ध्वस्त हो गया.सरकारी आंकड़ों के अनुसार 7285 लोग इस आपदा से प्रभावित हैं,125 पालतू पशुओं मारे गए, 102 घर पूरी तरह ध्वस्त हो गए, 57 मकान तीक्ष्ण रूप से प्रभावित हो गए,जिनमें रहना खतरनाक है तथा 63 मकान आंशिक रूप से प्रभावित बताये गए हैं. 150 परिवारों के 697 लोगों को विभिन्न राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी.सरकारी आंकड़ों के अनुसार ही 600 करोड की सरकारी संपत्ति और सौ करोड की निजी संपत्ति बाढ़ की भेंट चढ गयी. सरकारी आंकड़ों में मरने वालों की संख्या उनतीस बताई गयी.

ये भी तथ्य है कि सरकारी आंकड़ों में सरकारी नुकसान हमेशा बढ़ा-चढ़ा कर दिखाई जाती है और मरने वालों का आंकडा बेहद घटाकर बताया जाता है. उत्तरकाशी में आई प्राकृतिक आपदा के सन्दर्भ में भी ऐसा ही अंदेशा प्रकट किया जा रहा है. खास तौर पर असिगंगा पर बन रही बिजली परियोजनाओं में काम कर रहे नेपाली मजदूरों के बारे में कोई विश्वसनीय जानकारी अभी तक नहीं मिल पा रही है. बाहरी और गरीब होने के कारण भी इनकी पैरवी करने वाला कोई नहीं है.अभी तक की सूचनाओं के अनुसार इन परियोजनाओं में काम करने वाले 19 मजदूर बाढ़ में बह गए और  23 मजदूरों के सुरक्षित होने की बात कही जा रही है. पर तीन परियोजनाओं में केवल 42 मजदूर ही काम कर रहे थे,इस बात पर सहज ही भरोसा तो नहीं होता है.

जब-जब प्राकृतिक आपदाएं आती हैं, तब-तब पूरा सरकारी अमला भी असहाय दिखाई देता है. जिस आपदा प्रबंधन के नाम की वर्ष भर माला जपी जाती है, वो आपदा के समय कहाँ लापता हो जाता है, ये कोई नहीं जानता. जो करोड़ों रुपये का बजट इस आपदा प्रबंधन नामक कभी नहीं दिखाई देने वाले कारनामे पर खर्च किया जाता है, आपदाओं के समय तो यह गधे की सींग वाली अवस्था में ही रहता है.उत्तरकाशी में भी हालात ये हैं कि असिगंगा घाटी के सारे संपर्क मार्ग, पुल और सड़कें बाढ़ में बह गयी, इसलिए इन गावों का संपर्क, संचार और बिजली सब ठप्प है.नेता-अफसर हवाई दौरा कर आये हैं. राहत कार्यों का आलम ये है कि गंगोरी में सरकारी राहत के वितरण का केंद्र है और यहीं पर एक बड़े से होटल-नीलकंठ पैलेस में स्वास्थ्य विभाग ने अपना आपदा चिकित्सा शिविर लगाया हुआ. जिनके लिए पहुँच मार्ग उपलब्ध हैं वो आपदा राहत की राशन लेने गंगोरी पहुँच रहे हैं. गंगोरी से पीठ पर आपदा राहत लाद कर टूटे-फूटे पहाड़ी रास्तों पर लौटते स्त्री-पुरुष आजकल इस इलाके में आम तौर पर देखे जा सकते हैं. लेकिन जिन दूरस्थ गावों तक पहुँचने के सारे रास्ते टूट चुके हैं,इनकी फ़िक्र करने की फुर्सत किसे है?दूरस्थ गावों को एक-आध बार हैलीकाप्टर से राहत पहुंचाई भी गयी पर वो राहत से ज्यादा इन आपदा के मारे गाँव वालों के साथ एक क्रूर सरकारी मजाक था.एक पूरे गाँव के लिए एक डबल रोटी का पैकेट आसमान से उछाल कर सरकार बहादुर का उड़नखटोला फुर्र हो गया.कुछ गावों में हेलीकाप्टर से गिराए गए खाद्य सामग्री के पैकेट जमीन पर गिरकर फट गए. कोढ़ में खाज ये कि कुछ इलाकों में राहत के नाम पर फफूंद लगे हुए बन और बिस्कुट बांटे गए. कुछ गाँव में लोगों ने आपदा राहत की चीनी में खाद की मिलावट की शिकायत भी की. 2010 में भारी बारिश में देवप्रयाग में फंसे तीर्थ यात्रियों को भी प्रशासन की तरफ से एक्सपायरी डेट के बिस्कुट बांटे गए थे. ये बड़ा आश्चर्य का विषय है कि ऐसा कौन व्यापारी है जो ये सड़े-गले बन-बिस्कुट का स्टॉक रखता है और प्रशासन का भी उससे आपदाओं के समय इस सड़े-गले माल की सप्लाई का कांट्रेक्ट है!वैसे आपदा पीड़ित अधिकाँश गांववासियों का कहना है कि उन्हें सरकारी राहत के बजाय संपर्क मार्गों,संचार सुविधा और बिजली बहाली की दरकार है.

उत्तराखंड सरकार इस आपदा के प्रति कितनी संवेदनशील है,इस बात का अंदाजा मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के उत्तरकाशी दौरे से लगता है. वे नौ अगस्त को उत्तरकाशी पहुंचे तो कार से उत्तरकाशी से कुछ किलोमीटर दूर तेखला तक गए क्यूंकि वहाँ से आगे पैदल रास्ता ही था और मुख्यमंत्री पैदल क्यूँकर चलने लगे भला. आपदा प्रभावितों के कहने पर वे कुछ कदम गंगोरी की ओर पैदल चले भी,पर आपदा पीड़ितों द्वारा सवाल-जवाब किये जाने से नाराज होकर तत्काल वापस लौट पड़े. इसी दौर में उन्होंने प्रभावितों को भजन करने की सलाह भी दे डाली. शासन-प्रशासन कब तक सामान्य स्थिति बहाल कर देगी,इस प्रश्न के जवाब में मुख्यमंत्री ने प्रभावितों से कहा कि भजन कीर्तन करिये ताकि फिर ऐसी आपदा ना आये. मतलब साफ़ है अगर भगवान तुम्हें नहीं बचायेगा तो सरकार तो बचाने से रही. जिस सरकार के मंत्री-विधायक आपदा के बीच में लन्दन घूमने चले जाते हों(लन्दन घूमने वालों में कांग्रेस के अलावा विपक्षी भाजपा के विधायक मदन कौशिक भी शामिल थे) ,जिस सरकार के मंत्रियों के लिए प्राकृतिक आपदा के पीड़ितों से दमयंती रावत की रस्साकस्सी ज्यादा जरुरी हो,उस सरकार के मुखिया का आपदा पीड़ितों को भगवान की शरण में जाने को कहना कोई अजूबी बात नहीं है क्यूंकि सरकार,उसके मंत्रियों,विधायकों और कांग्रेस के बड़े क्षत्रपों को आपसी टांग खिंचाई और सत्ता की मलाई उड़ाने से फुर्सत मिले,तब तो वो जनता की सोचें. ऐसे में भगवान ही ऐसी शै है,जिसके बार में ये सोचकर सरकार बहादुर भी निश्चिंत है कि हम जनता के बारे में नहीं सोच रहे तो वो तो सोच ही रहा होगा क्यूंकि इतने सरकारी निकम्मेपन के बावजूद जनता का ज़िंदा रहना किसी चमत्कार से कम है भला !

अतीत की तरह ही इस बार की उत्तरकाशी की आपदा में भी धन की बन्दर बाँट के चर्चे शुरू हो गए हैं. इस बन्दर बाँट का नूमना है बडकोट तहसील का खरादी कस्बा. खरादी में 37 लोगों को व्यावसायिक भवनों के लिए गृह अनुदान के एक-एक लाख रुपये बाँट दिए गए यानि दुकान के लिए मकान की राहत बाँट दी गयी है. जबकि गंगोरी तथा अन्य आपदा प्रभावित क्षेत्रों में आपदा से क्षतिग्रस्त जिन घरों को प्रशासन ने खाली करा दिया है,उन घरों को भी आंशिक क्षतिग्रस्त की श्रेणी में रख कर,इनके मालिकों को हजार-दो हजार रूपया पकड़ा कर प्रशासन अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ले रहा है. हजार-दो हजार रुपये में,अपना सुब कुछ गंवा चुके लोग क्षतिग्रस्त मकानों की मरम्मत कैसे करवाएंगे,ये यक्ष प्रश्न है. आपदा के पैसे की बंदरबांट के क्रम में आपदा से क्षतिग्रस्त भवनों,पुलों,सड़कों आदि के ठेकों में होने वाली लूट कुछ समय बाद दिखेगी. 2003 के वरुणावत ट्रीटमेंट के समय किस तरह कई सौ करोड का वारा-न्यारा तत्कालीन विधायक समेत सत्ताधारी पार्टी के लोगों ने किया,इसके चर्चे उत्तरकाशी में आज भी सुने जा सकते हैं. तब भी राज्य में कांग्रेस की सरकार थी.   

उत्तरकाशी में तबाही मचाने वाली इस आपदा का कारण, बादल फटना  और फिर असी गंगा में बाढ़ आना बताया जा रहा है.पर क्या सिर्फ इसे प्राकृतिक आपदा कह कर और सारा दोष प्रकृति के मत्थे मढ कर क्या बहुत सारे मुश्किल सवालों से बचने का प्रयास नहीं हो रहा है?मकान,होटल,दूकान और सरकारी भवन जो बिलकुल नदी के मुहाने पर और कहीं-कहीं नदी तटों का अतिक्रमण कर बने होते हैं,वो हमेशा ही आपदा की तीव्रता को बढाने में महत्वपूर्ण कारक बनते हैं. उत्तरकाशी शहर से लेकर गंगोरी तक ऐसे मकान,होटल और सरकारी भवन काफी संख्या में देखे जा सकते हैं. भवन बनाने के तमाम कायदे-क़ानून हैं,अनापत्ति प्रमाणपत्र लाना होता है,नक्शा पास करवाना होता है. इतने सब कानूनी दाँव-पेंचों के बावजूद ये कैसे होता है कि लोग नदियों के तटों पर अतिक्रमण कर आलीशान  भवन और होटल बनाने में कामयाब हो जाते हैं? उत्तरकाशी में तो आपदा की तीव्रता बढाने के पीछे कालिंदी गाड और असी गंगा पर बन रही तीन जलविद्युत परियोजनाओं ने भी आपराधिक भूमिका अदा की. असिगंगा घाटी में तीन जलविद्युत परियोजनाएं बन रही हैं-नौ मेगावाट की कालिंदीगाड परियोजना,साढे चार मेगावाट की असिगंगा फर्स्ट तथा साढे चार मेगावाट की ही असिगंगा सेकेण्ड.जहाँ भी जलविद्युत परियोजनाएं बन रही हैं,वहाँ परियोजना बनाने वाली कंपनियों का विस्फोट करना,मलबा नदी में डालना और पर्यावरण को भारी नुकसान पहुँचाना अघोषित कायदा है. इन तीनो परियोजनाओं में  ग्रामीणों की आपत्ति के बावजूद इस क्षेत्र में जम कर डायनामाईट के विस्फोट किये गए. साथ ही परियोजना बनाने वाली कंपनियों ने मलबा नदी में डाला. भारी मात्र में मिटटी नदी में डालने से नदी का तल ऊँचा उठ गया,जिसने बादल फटने के बाद नदी में पहले झील बनायीं और जब ये झील टूटी तो पानी के बहने का वेग विनाशकारी हो गया. इतना ही नहीं इन परियोजनाओं के निर्माण के लिए भारी मात्रा में पेड़ काटे भी काटे गए. वन विकास निगम ने परियोजना के लिए पैंसठ पेड काटने की अनुमति दी थी. परन्तु ग्रामीणों के अनुसार 250 से अधिक पेड काटे गए,जो नदी किनारे डाले गए,मलबे में ही दबा दिए गए. मलबे में दबाए पेड़ों ने नदी में झील बनाने में योग दिया और फिर झील टूटने पर नदी में सैकड़ों की तादाद में तीव्र गति से बहते पेड़ जहां भी टकराए,वहाँ उन्होंने मारक प्रभाव छोड़ा. जे.सी.बी. और अन्य परियोजना में काम आने वाली मशीनों के टुकड़े पूरी असिगंगा में बिखरे हुए हैं. केन्द्रीय पर्यावरण राज्य मंत्री जयंती नटराजन ने भी अपने बयान में असिगंगा पर बन रही परियोजनाओं द्वारा मलबा नदी में डाले जाने को उत्तरकाशी की आपदा के लिए जिम्मेदार ठहराया है.

उत्तरकाशी समेत पूरा उत्तराखंड प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से अत्याधिक संवेदनशील है. उत्तरकाशी की ही बात करें तो ये जिला लगातार आपदाओं की चपेट में आता रहा है. 1970 में रतूडीसेरा के ऊपर बादल फटने से रानो की गाड जिसे रेणुका नदी भी कहते हैं, उसमें आई बाढ़ से कई मकान और गौशालाएं बह गयी, दर्जनों पालतू पशु भी बहे और कुछ लोग भी मारे गए. 1978 में डबरानी में झील बनने और फिर उसके टूटने से उत्तरकाशी की गंगा घाटी में भारी तबाही हुई थी. 1980 में ज्ञानसू में बादल फटने से हुई तबाही में 28 लोग मलबे में दब गए थे. 1991 के भूकंप ने भी उत्तरकाशी में सैकड़ों लोगों को लील लिया था. 2003 में वरुणावत पर्वत के भूस्खलन ने तो उत्तरकाशी शहर के अस्तित्व को ही संकट में डाल दिया था. कुछ साल पहले भटवाडी में भी भारी भूस्खलन हुआ,जिसने इस कसबे के जनजीवन को पूरी तरह अस्तव्यस्त कर दिया. 

हम ना तो भूकंप को रोक सकते हैं, ना अतिवृष्टि को. परन्तु इनसे होने वाले विनाश को जरुर कम किया जा सकता है. विकास का जो पूंजीपरस्त-मुनाफपरस्त मॉडल अभी पूरे देश की तरह ही उत्तराखंड में भी लागू है वो प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करके नहीं बल्कि आक्रांता की तरह अपने लिए सुख सुविधाओं का निर्माण करता है. इसके लिए वो समाज के निचले पायदान पर खड़े लोगों और प्रकृति,दोनों को ही तहस-नहस करता है. प्रकृति के साथ की गयी भयानक छेड़छाड़,प्राकृतिक आपदाओं की विभीषिका को भयंकर रूप से बढ़ा देती है. भारी निर्माण कार्य,बड़े पैमाने पर डायनामाईट जैसे विस्फोटकों का प्रयोग,प्राकृतिक ड्रेनेज को अवरुद्ध करने जैसी मानवीय कार्यवाहियां ही भीषण तबाही का कारण बनती हैं. पर पूँजी के आगे नतमस्तक सत्ता को ये सब सोचने की फुरसत कहाँ! वो तो जैसे सोने का अंडा देने वाली मुर्गी का पेट चीर कर सोने का अंडा निकालने की तर्ज पर ही पूरी प्रकृति को चीर कर भी अपने लिए अधिक से अधिक मुनाफ़ा बटोर लेना चाहती है. फिर वो सोचे भी क्यूँ,प्रकृति का कहर जब टूटता भी है तो लुटेरी पूँजी और उसकी बांदी सत्ता पर तो टूटता नहीं है. वो कहर भी उन्हीं पर बरपता है जो पहले ही पूँजी की लूट और सत्ता के दमन दोने के मारे होते हैं. पूँजी और सत्ता के लिए तो आपदा भी ठेकों,लूट और मुनाफे का अवसर बनकर आती है.

इन्द्रेश भाकपा (माले) के सक्रिय कार्यकर्ता हैं. 
इनसे इंटरनेट पर indresh.aisa@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.