बाज़ारवाद और पुरुषवादी सोच का काकटेल बिहार का मीडिया

पटना बलात्कार कांड
-सरोज कुमार 

पिछले दिनों पटना में एक छात्रा के साथ हुए गैंग रेप और उसकी सीडी प्रसारित करने के मामले में बात करते हुए मेरे एक दोस्त ने मुझसे कहा “पता है कि नहीं, लड़की खुले हाथ वाली थी”. मैंने पूछा “मतलब”. वह कहता है “मुहल्लेवाले बताते हैं कि जब भी वह दुकान जाती है तो 500 या 1000 के नोट ही रहते और हमेशा चॉकलेट के बड़े डब्बे या महंगे सामान ही खरीदती थी”.मैं और मेरा दोस्त उसी मोहल्ले में अस्थायी रुप से रहते हैं जहां लड़की का घर है.मैंने उससे पूछा “तुम्हें किसने बताया”.मैंने सोचा कि उसे मोहल्ले के किसी ने बताया होगा.लेकिन नहीं उसे बताया था एक अखबार ने.बिहार ही नहीं देश के एक प्रमुख अखबार में उसने ये बातें पढ़ी थी.
rape-victimअखबार ये जताने की फिराक में है कि आखिर लड़की के पास 500 या 1000 को नोट आ कहां से सकते हैं? साफ है कि मीडिया पीड़ित छात्रा को ही जिस बेहूदगी से कटघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहा है और लोगों के बीच बातें फैला रहा है वह ने केवल स्त्री-वरोधी बल्कि घटिया मानसिकता को प्रदर्शित करता है.

इस पूरे मामले में मीडिया ने जिस तरह की भूमिका निभाई वह बेहद घटिया और गैर-जिम्मेदाराना है.मीडिया ने न केवल लड़की के चरित्र को बेबुनियादी बातों के आधार पर धूमिल करने का प्रयास किया बल्कि हद तो ये हो गई कि मौर्या नाम के एक निजी चैनल ने एक आरोपी को अपने यहां सफाई देते हुए लाइव प्रस्तुत कर दिया.

इस पूरे इंटरव्यू में आरोपी खुद को निर्दोष बताता रहा और बेशर्मी से कहा कि उसने तो लड़की को छुआ तक नहीं.जबकि जिस फ्लैट में रेप हुआ वह इसी का है और यह आरोपी वीडियो क्लिप में भी दिखाई पड़ता है.ध्यान रहे इस आरोपी का पिता रसूख वाला सरकारी अफसर है.और तो और उसकी गिरफ्तारी के बाद उसी चैनल का पत्रकार पुलिस से पूछता है कि चूंकि आरोपी ने चैनल में आ कर आत्मसमर्पण किया है तो पुलिस नरमी बरतेगी ना? अब इससे साफ पता चलता है कि इस चैनल का क्या रुख था.

ये बात जरुर रही कि छात्रा के साथ हुए रेप की सीडी मीडिया(सबसे पहले आर्यन निजी चैनल) में आने के बाद पुलिस सक्रिय हुई और लोगों के बीच से तीखी प्रतिक्रिया आनी शुरु हुई.पर क्या मीडिया ने इस मुद्दे को पीड़िता को इंसाफ देने के मकसद से उठाया? क्या मीडिया अच्छी पत्रकारिता कर रहा था? इस दरम्यान की गई रिपोर्टिंग पर हम नजर डालें तो साफ नजर आएगा कि मीडिया हमेशा की तरह क्या कर रहा है.

समाचारपत्रों के शीर्षक और कंटेंट पीड़िता को बेबुनियादी तरीके से कटघरे में खड़ा करने वाले ही नहीं बल्कि घोर सामंतवादी और स्त्री-विरोधी रहे.28 जुलाई को पेज-6 पर “किसने बनाई और कैसे सामने आई सीडी” शीर्षक की खबर में दैनिक जागरण लिखता है ‘एक माह तक चुप्पी और मीडिया में सीडी आने के बाद भी चुप्पी.प्रेमी संग काठमांडू की सैर करने वाली लड़की पांच लोगों के साथ अकेले फ्लैट में किस विश्वास से जाती है.कथित रुप से पांचों उसकी अस्मत से खेलते हैं और पड़ोसी फ्लैट वालों को खबर भी नहीं होती...’.

जबकि पीड़िता का साफ कहना था उसे बहाने से फ्लैट पर उसका प्रेमी ले गया था और उसे ये भी नहीं मालूम था कि फ्लैट में और लोग भी हैं.वीडियो क्लिप में भी पीड़िता रोती-चिल्लाती नजर आती है फिर अखबार ये कैसे लिख रहा है कि पड़ोसियों को पता नहीं चला क्योंकि वह चुपचाप रही यानि उसकी सहमति से हो रहा था सबकुछ.

ये तो कुछ नहीं, अगले दिन 29 जुलाई को ‘सिर झुका कर मोहल्ले से गुजरती थी रेखा’ शीर्षक से अखबार लिखता है- ‘मोहल्ले के लोग इसे पाश्चात्य संस्कृति की देन बता रहे हैं.मोहल्ले के लोगों का कहना है कि वह सिर झुका कर निकलती थी’.अखबार आगे लिखता हैकि एक दुकानदार के अनुसार वह हमेशा 500-1000 के नोट देती और महंगे सामान खरीदती थी.अखबार यह भी लिखता है कि एक बुजुर्ग कहते हैं कि पिता के सीधेपन का नाजायज फायदा उठा रहे हैं ऐसे बच्चे.30 जुलाई को भी यह अखबार लिखता है कि लड़की यह भी कहती है कि हनुमान मंदिर(जहां से उसके प्रेमी ने उसे रिसिव किया और वह मना कर रही थी कि वहां उसे बहुत लोग पहचानते हैं) के पास उसे बहुत लोग पहचानते हैं, किस कारण से.मकसद साफ है कि अखबार लड़की को बेशर्मी से कटघरे में खड़ा कर रहा है.

इसी का आई-नेक्स्ट अखबार 28 जुलाई को भद्दे तरीके से शीर्षक देता है- ‘स्कूल टाइम से ही शुरु हो गई थी’.जबकि खबर ये थी कि लड़की और बाकी लड़कों की दोस्ती स्कूल से ही रही थी. यह सिर्फ पीड़ित का मामला भर नहीं है .यह पूरी रिपोर्टिंग उस सामंतवादी सोच को पुष्ट करता है जो घोर स्त्री-विरोधी और नैतिकता के नाम पर स्त्रियों का शोषण करता है.

सारे प्रमुख अखबार भी इसी दौरान कैंपेन चलाने लगते हैं कि लड़कियों को कैसे रहना चाहिए और कैसे कपड़े पहनने चाहिए.हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, प्रभात खबर, आई नेक्स्ट जैसे अखबार युवाओं और तथाकथित बुद्धिजीवियों की राय लड़कियों को लेकर प्रकाशित करते रहे.

हिन्दुस्तान दो दिनों तक प्रमुखता से कैंपेन चलाता है कि लड़कियां कैसे रहें, क्या करें? 28 जुलाई को अखबार इंट्रों में लिखता है कि छात्राओं का मानना है कि इंसान को सीमाओं में बांध कर रखा जाना ठीक नहीं है लेकिन आजादी के नाम पर सीमाओं का उल्लंघन भी सही नहीं ठहराया जा सकता है.28 और 29 जुलाई की कवरेज में ऐसी ही बातें लड़कियों से कहलवाई जाती हैं. एक कहती है- “लड़कियों को अपने पहनावे पर ध्यान देना चाहिए”.एक और का कहना है, “यहां तक कि लड़कियों को अपने मंगेतर से भी दूरी बना कर रखनी चाहिए”.एक अन्य लड़की ने कहा कि “अपनी पहचान लड़कियां खुद बनाती और खुद खराब करती हैं.मोरल वैल्यू भी एक चीज होती है, लड़कियों में ये वैल्यू जरुर होना चाहिए”.

इसी तरह की रिपोर्टिंग प्रभात खबर, दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट भी करते रहे.4 अगस्त को आई-नेक्स्ट लिखता है ‘फ्रेंड्स व फ्रेंडशिप की लिमिट का रखें ख्याल’, ‘प्यार में उसके कदम ऐसे बहके कि प्रेमी ने ही उसकी अस्मत लूट ली’.ये नैतिकता और मोरल वैल्यू जैसी चीजें सिर्फ स्त्रियों के लिए क्यों? कोई ये कैंपेन क्यों नहीं चला रहा था कि लड़के कैसे रहें और अपना पौरुष कैसे संभाल के रखें?

इस पूरे मामले में देखें तो मीडिया ने इसे सनसनीखेज बनाने के लिए न केवल सनसनीखेज शीर्षक देता रहा और खबरें गढ़ता रहा बल्कि लड़की को लेकर गैर-जिम्मेदाराना रहा.सामंतवादी और पुरुषवादी सोच के साथ खबरें गढ़ता रहा और प्रसारित करता रहा.एक तरफ यहीं मीडिया मेट्रो शहरों में स्त्रियों से जुड़ी आधुनिक दीखने वाली चीजों (पहनावा या आइडिया) को प्रमुखता से छापता है.सेक्स और सनसनी का तड़का लगाता है.आधुनिक होने का दिखावा करता है वहीं छोटे शहरों में दिखावा भी नहीं करता.हद दर्जे का संकुचित हो जाता है.

दरअसल मीडिया हर चीज जो बिकाऊ हो उसे चलाता है.यह वह बिकने के स्थान और सोच के आधार पर तय करता है.स्त्रियों से जुड़ी चीजों को मसालेदार तरीके से पेश कर बेचने तक ही नहीं बल्कि वह सामंतवादी और स्त्री-विरोधी सोच से लैस होकर काम करता है.

अभी कुछ दिन पहले ही गुवाहाटी की घटना ही देखें तो मीडियाकर्मी पर युवकों को उकसाने का आरोप भी लगा.ये सारे मामले वहीं जुड़ते हैं कि सनसनीखेज खबरें बनाने के चक्कर में चैनलें क्या-क्या करवा रही हैं.चैनलों का खेल वहीं पूंजीवादी ढांचे का है जो स्त्रियों को बिकाऊ वस्तु के रुप में ट्रीट करता है.वह क्या बेच रहा है और क्यों बेच रहा है इसे समझना जरुरी है.लेकिन साथ ही सिर्फ यह पूंजी का सवाल नहीं बल्कि सामंतवादी सोच का नतीजा है जो मीडिया में मौजूद है.पटना जैसे छोटे शहरों में पत्रकार किस सोच के साथ पत्रकारिता कर रहे हैं और अखबार कैसी रिपोर्टिंग करवा रहे हैं यह गैंग-रेप प्रकरण में साफ दिखलाई पड़ रहा है.यहां के क्राइम रिपोर्टर न सिर्फ अपने चैंबर में बैठकर पुलिस के बताए अनुसार रिपोर्ट लिख रहे हैं बल्कि दो कदम आगे जा कर अभियुक्तों की बजाय पीड़ित को ही कटघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं.

जनज्वार से साभार



सरोज युवा पत्रकार हैं. पत्रकारिता की आईआईएमसी से. अभी पटना में एक दैनिक अखबार में काम . इनसे krsaroj989@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.