सुयोग्यजनों की राह में क्या आरक्षण ही बाधा है?

-इन्द्रेश मैखुरी

त्तराखंड में शिक्षक-कर्मचारी राजनीती आजकल काफी गरमाई हुई है.आम शिक्षक-कर्मचारी भी मोर्चा बाँध कर लड़ने को तैयार दिखाई दे रहा है. लड़ाई के मोर्चे पर खड़े ये शिक्षक-कर्मचारी पिछले दिनों उच्च न्यायलय नैनीताल द्वारा दिए गए फैसले के बाद से काफी उत्साह में हैं.एक याचिका पर फैसला देते हुए उच्च न्यायलय नैनीताल ने कहा कि सरकारी महकमों में प्रमोशन में आरक्षण की व्यवस्था समाप्त कर दी जानी चाहिए. लगभग सारे शिक्षक-कर्मचारी और उनके संगठन ख़म ठोक कर उतर पड़े हैं राज्य सरकार से मांग करने कि इस फैसले को तत्काल लागू किया जाए. हर जगह शिक्षक-कर्मचारी ये चर्चा करते दिख रहे हैं कि आरक्षण की व्यवस्था से अब तक उनके साथ बड़ी नाइंसाफी हो रही थी और जब इस नाइंसाफी से मुक्तिदाई फैसला भी आ गया है,तब राज्य सरकार इसे लागू क्यूँ नहीं कर रही है.आरक्षण के खिलाफ जो आक्रामकता दिखाई दे रही है,ऐसी तो तब भी नहीं दिखाई दी जबकि छठे वेतन आयोग ने संस्तुति कर दी कि सभी सरकारी विभागों में जो चतुर्थ श्रेणी के पद हैं,उनको समाप्त कर दिया जाए. नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद सरकारी नौकरियों से सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली पेंशन की व्यवस्था को सरकार ने समेट दिया है.विधायक-सांसदों की पेंशन में लगातार बढोतरी हो रही है और शिक्षक-कर्मचारियों को पेंशन न देने के लिए सरकार खजाने पर बोझ पड़ने के चिरस्थायी अचूक तर्क के साथ सरकार हाज़िर है.इतनी बड़ी और महत्वपूर्ण सुविधा से सरकारी कार्मिक वंचित कर दिए गए पर जितनी आक्रामकता आरक्षण के खिलाफ दिख रही है,वैसी तो पेंशन खात्मे पर नहीं दिखाई दी. सरकारी सेवा में मृतक आश्रितों को नियुक्ति देने की व्यवस्था भी धीरे-धीरे खत्म की जा रही है पर ये भी शिक्षक-कर्मचारी आंदोलन के लिए आरक्षण विरोध जैसा प्रमुख एजेंडा नहीं बन सका. सरकारी विभागों में ये व्यवस्था लागु हो चुकी है कि जिस पद पर से व्यक्ति सेवानिवृत्त हो जाये, वो पद समाप्त कर दिया जाए.पूरे देश में लाखों पद इस व्यवस्था के तहत समाप्त किये जा चुके हैं, लेकिन ये बात भी मुद्दे के रूप में आरक्षण विरोध जैसी गंभीर हैसियत नहीं पा सकी. प्रदेश में लगभग अस्सी हज़ार सरकारी पद हैं, लेकिन इन पदों पर नियुक्तियां की जाए, इसके लिए तो कोई मजबूत आवाज शिक्षक-कर्मचारी संगठनो की ओर से नहीं सुनी गयी.

तो क्या वास्तव में आरक्षण ही सब सुयोग्य जनो की राह में सबसे बड़ी बाधा है? शिक्षक-कर्मचारियों के आक्रामक तेवर देख कर तो ऐसा ही लगता है.पर ये प्रश्न तो उठना लाजमी है कि जब सरकारी नौकरियां ही नहीं रहेंगी तो काहे का आरक्षण और कहाँ की सामान्य श्रेणी? उत्तराखंड में ही देखें तो सरकारी पदों को उपनल जैसे बाहरी संस्थानों के जरिये ठेके पर दिए जा रहा है.तमाम भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद उपनल की नियुक्तियों में सब सामान्य है.

उत्तराखंड में शिक्षक-कर्मचारी संगठनो की आरक्षण विरोधी मुहिम को देख कर सहज ही दिमाग में ये प्रश्न भी पैदा होता है कि क्या इन संगठनो में आरक्षित वर्ग के लोग नेतृत्व में होंगे?यदि आरक्षित वर्ग के कार्मिक इनके नेतृत्व में होते,तो इन संगठनो के भीतर इस मुद्दे पर कोई स्टैंड लेने से पहले इस विषय पर उनके तर्क भी सुने जाते.लेकिन जिस तरह उच्च न्यायालय का निर्णय आते ही शिक्षक-कर्मचारी संगठनो ने पदोन्नति में आरक्षण समाप्ति का अभियान छेड़ दिया,उससे साफ़ है कि इन संगठनो के नेतृत्व में आरक्षित श्रेणी के कार्मिकों नहीं हैं.आरक्षण विरोधी इस आक्रामकता से तो ऐसा लगता है कि आरक्षित श्रेणी के शिक्षक-कर्मचारियों को शिक्षक-कर्मचारी संगठन अपना हिस्सा मानने के बजाय विरोधी और अपने सब दुखों का कारण ही समझते हैं.सवाल तो ये भी है कि जिस आरक्षण को सब नौकरियां हड़प करने वाला करार दिया जा रहा है,अगर वास्तव में अधिकाँश नौकरियों पर आरक्षित श्रेणी के लोगों का कब्जा होता तो क्या शिक्षक-कर्मचारी संगठन बहुमत की उपेक्षा करके,उनके विरूद्ध इतनी सरलता से ऐसा आक्रामक अभियान चलाने की स्थिति में होते?हालत ये है कि अनुसूचित जाति के शिक्षक-कर्मचारियों को इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखने के लिए इन संगठनों से इतर मंच तलाशने पड़ रहे हैं.शिक्षक-कर्मचारी संगठनो की आरक्षण विरोधी आक्रामकता देख कर तो आरक्षण का महत्व अधिक समझ में आता है.ये इस बात को दर्शाता है कि जहां भी आरक्षित श्रेणी के लोगों को रखे जाने की अनिवार्य व्यवस्था नहीं होगी,वहाँ उनका होना लगभग नामुमकिन होगा.जैसे शिक्षक-कर्मचारी संगठनो के नेतृत्व में आरक्षित श्रेणी के कार्मिक नहीं हैं तो उनका पक्ष भी इन संगठनो से गायब है.हालांकि ऐसा भी नहीं है कि आरक्षण होने भर से इस श्रेणी के लोगों के लिए सरकारी नौकरी की राह एकदम आसान हो जाए.देश भर में हज़ारों की तादाद में बैकलॉग के रिक्त पद ये कहानी खुद ही बयां करते हैं कि सरकारी नौकरियों के लिए मारामार के समय में ये पद सिर्फ आरक्षित श्रेणी के होने के चलते ही बरसों-बरस से खाली हैं.इन खाली पदों को भी आरक्षित वर्गों की अयोग्यता के उदाहरण के रूप में पेश किया जाता है.जबकि बहुत सारी जगहों का अनुभव ये बताता है कि इन पदों को रिक्त रखने के पीछे भी सवर्ण मानसिकता ही काम कर रही होती है.बहुतेरी जगहों पर इन पदों के लिए विज्ञापन जारी करने के बाद कार्यवाही आगे नहीं बढाई जाती और इस तरह सालों-साल ये पद खाली रहते हैं.

प्रदेश में शिक्षक-कर्मचारियों की इस आरक्षण विरोधी मुहिम को लेकर राजनीतिक पार्टियों का रवैया भी सवालों के घेरे में है.हर छोटे-बड़े मुद्दे पर अपनी पीठ खुद थपथपाने वाली सत्ताधारी कांग्रेस और हर मौके पर सरकार को घेरने को आतुर विपक्षी भाजपा के बयानबहादुर नेता, उच्च न्यायलय का फैसला आने के बाद इस मसले पर अपने मुंह सीए हुए हैं. उत्तराखंड सरकार में शामिल,दलितों की हितैषी होने का दंभ भरने वाली बसपा भी इस मामले में-तेल देखो,तेल की धार देखो-वाली मुद्रा में हैं.अजब मंजर है कि कांग्रेस-भाजपा के अनुसूचित जाति के विधायक तो मिलकर इस फैसले के खिलाफ मुख्यमंत्री से मिलते हैं पर उनकी पार्टियां इस मुद्दे पर चुप्पी ओढ़े रहती हैं.दोनों के बीच एक अलिखित समझौता हुआ मालूम पड़ता है.ऐसा लगता है कि पार्टियों ने अनुसूचित जाति के विधायकों को छूट दी हुई है कि तुम चाहो तो इस फैसले का विरोध करो पर हमें चुप ही रहने दो.अनुसूचित जाति के विधायकों का भी पार्टियों को ये संकेत है कि हम तो जबानी जमा-खर्च करेंगे ही,राजनितिक मजबूरी है,आपको जो करना हो,करो-हम आपसे बाहर थोड़े ही हैं.

उत्तराखंड के बारे में लोग कहते हैं कि यहाँ जातिवाद यू.पी.,बिहार जैसे तीखे रूप में नहीं है.सवर्णवादी वर्चस्व का चेहरा जितना ही कोमल हो,आम समयों में दलितों के साथ सवर्णों के कितनी ही सामंजस्य से रहने की बातें क्यूँ न की जाएँ पर जब भी आरक्षण या ऐसे ही किसी सवाल पर बहस खड़ी होती है तो सवर्ण गोलबंदी बेहद आक्रामक रूप ले लेती है.1994 के उत्तराखंड आंदोलन में भी दलित अलग-थलग ही रहे क्यूंकि इसकी शुरुआत आरक्षण विरोध से हुई थी.अब एक बार फिर प्रमोशन में आरक्षण के मामले में शिक्षक-कर्मचारी उच्च वर्णीय मानसिकता के साथ गोलबंद हो रहे हैं,उसमें जातीय श्रेष्ठता का ये दंभ साफ़-साफ़ देखा जा सकता है.

आरक्षण विरोध की ये आक्रामकता दरअसल हमारे समाज में जाति और जातीय वर्चस्व की हकीकत की पुष्टि करती है. सवर्णवादी मानसिकता इस कदर हावी है कि वो आरक्षण और अयोग्यता को पर्यायवाची बना कर पेश कर देती है.आरक्षण तो सरकारी पदों में अयोग्य लोगों को भरने किये लिए बनाया गया है.इस तरह से प्रकारांतर से यह स्थापित करने की कोशिश रहती है कि जिसने भी आरक्षित श्रेणी में जन्म लिया वो तो धरती पर आया ही अयोग्यता का चोला पहन कर और सवर्ण परिवारों में पैदा होने वाले तो पैदाइशी प्रतिभासंपन्न होते हैं,जिनकी प्रतिभा को आरक्षण ने कुंद कर दिया है.आरक्षण बनाम योग्यता की मुहीम आपसी बातचीत से लेकर एस.एम.एस. और फेसबुक की दुनिया तक छाई हुई है.सिर्फ आरक्षण को ही सब समस्याओं की जड़ बताने वालों के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि देश को चलाने वाले तो सब पैदायशी सुयोग्य माने जाने वाले परिवारों में जन्मे लोग ही हैं,तब ये देश गरीबी,भुखमरी,बेरोजगारी,लूट और भ्रष्टाचार की भीषण चपेट में क्यूँ है?

दलित चिंतकों के एक हिस्से ने उदारीकरण की लुटेरी नीतियों का ये कहते हुए स्वागत किया था कि इन नीतियों का तूफ़ान,मनुष्य को जन्म के आधार पर श्रेष्ठ-निकृष्ट घोषित करने वाली जाति व्यवस्था को तहस-नहस कर देगा.लेकिन सूचना क्रान्ति के इन्टरनेट जैसे आधुनिकतम माध्यम से आरक्षण बनाम योग्यता जैसी प्रतिगामी बहस चलायी जा रही है,उससे साफ़ है कि लूट और पूँजी के वर्चस्व को स्थापित करने वाली नीतियां दलितों की मुक्तिदाता तो होने से रही. हमारे समाज में जिस तरह सवर्ण सामंती वर्चस्व कायम है,उससे ये तो स्पष्ट है कि आरक्षण समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ी जातियों के सामजिक स्तर के उन्नयन में नाकाम ही रहा है.दलितों के एक हिस्से के धन संपन्न हो जाने और जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी योग्यता सिद्ध करने के बाद भी,उनके प्रति उच्च वर्णीय हिकारत रह-रह कर फूटती रहती है.पदोन्नति में आरक्षण समाप्ति का पैरोकार एक कर्मचारी कहता है-हमारे पचपन विधायक हैं और उनके पन्द्रह,तब भी उन्ही की चलेगी क्या. तो साफ़ है कि तमाम आधुनिकता की चकाचौंध के बावजूद समाज में अब भी हम और वो दो श्रेणियाँ कायम हैं. हम श्रेणी को अपनी श्रेष्ठता का भरपूर दंभ है और ये भी विशवास कि वो को उनसे नीचे ही रहना चाहिए. इसलिए इस सवर्णवादी मानसिकता का खात्मा करने के लिए तो आरक्षण से आगे बढ़ा हुआ कोई उपाय करना होगा. वैचारिक और राजनैतिक संघर्ष के बिना आदमी-आदमी में भेद करने वाली वर्णव्यवस्था का खात्मा असम्भव है.



इन्द्रेश मैखुरी, भाकपा (माले) के सक्रिय कार्यकर्ता हैं. इनसे इंटरनेट पर indresh.aisa@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.