मानेसर से शुरू हो नये इतिहास का निर्माण

-कुमुदिनी पति

मानेसर की मारुति सुज़ुकी कम्पनी 21 अगस्त को खुलने वाली है (खुल चुकी है) पर दुर्भाग्यवश, 500 स्थायी कर्मचारियों के बिना, क्योंकि प्रबंधन ने मान लिया है कि उनकी वजह से हिंसा भड़की और मानव संसाधन प्रबंधक मारे गए। ये वे समस्त कर्मचारी हैं जो घटना के दिन 9-3 बजे वाले प्रातःकालीन शिफ्ट में थे। कम्पनी संदेश देना चाहती है कि वर्करों के प्रतिरोध को किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मानेसर और मारुति उद्योग कॉर्पोरट मीडिया और बुर्जुआ मध्य वर्ग के माध्यम से लगातार नकारात्मक चर्चा के केंद्र में रहा। औद्योगिक जगत में  भारी खलबली मची हुई है कि भारत के इन्वेस्टमेंट कलाइमेट पर असर पड़ रहा है। कारण है कि चुपचाप शोषण सहते हुए, बैल की भांति काम में जुते रहने वाले श्रमिकों ने 18 जुलाई को कैसे, बिना स्थानीय खूफिया एजेंसी को भनक लगे, बगावत कर दी, और ऐसे, कि इण्डिया इनकार्पोरेटेड की रूह कांप गई।

कहा जा रहा है कि श्रमिकों ने उद्योग की सम्पत्ति को क्षति पहुंचाई-उस सम्पत्ति को, जिसकी वे जान से ज्यादा कीमत रखते थे और खुद निर्मित करते थे; आगजनी की, मानव संसाधन प्रबंधक की हत्या की और, यह सब हुआ बिना किसी कारण ! जबकि वार्ताएं जारी थीं और श्रमिकों ने मांगपत्र भी दिया था ?

श्रमिकों के अनुसार शॉप फ्लोर सूपरवाइज़र ने श्रमिक जियालाल को जाति-सूचक गाली दी और वर्कर के प्रतिरोध करने पर उसे प्रबंधन की ओर से सजा दी गई-वह निलंबित कर दिया गया। मजदूर बताते हैं कि कम्पनी के अफसर हमेशा उनके साथ जानवर जैसा बर्ताव करते हैं। गाली देकर बात करना और बात-बात पर दंडित करना तो कम्पनी की संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। श्रमिक हर बार चुप रह जाते, पर कभी-न-कभी धैर्य की सीमा को टूटनी थी। मानव संसाधन प्रबंधक से जब वर्कर को वापस लेने और सूपरवाइज़र के विरुद्ध कार्यवाही करने से इंकार किया तो वर्कर भड़क उठे, क्योंकि पहले भी नेताओं को सस्पेंड किया गया था । प्रबंधन ने 100 बाउंसरों को बुला लिया, जो धारदार व आधुनिक हथियारों से लैस थे। वर्करों और पुलिस का कहना है कि संघर्ष तो सस्पेंशन वापस लेने के लिये शुरू हुआ और किसी की हत्या करने के इरादे से कतई नहीं। पर प्रबंधन के गुंडों ने फैक्टरी के एक हिस्से में आग लगा दी ताकि वर्करों पर इल्जाम लगे।

यदि कोई श्रमिकों की बात को पूरी तरह गलत मान भी ले, तो सवाल उठता है कि श्रमिक आखिर केवल एक जाति-सूचक गाली देने के मामले से प्रबंधक की हत्या तक कैसे पहुंच गए- वे श्रमिक जो सालों से कम वेतन और अमानवीय कार्यस्थितियों के बावजूद हाड़तोड़ मेहनत कर रहे थे; लम्बे संघर्ष के बाद अपनी यूनियन बनाकर लोकतांत्रिक तरीके से एक डिमांड चार्टर पर वार्ता चला रहे थे और दिन भर में केवल 15 मिनट ब्रेक से काम चलाकर कम्पनी को ‘92-2000 के बीच उत्पादन में 400 प्रतिशत् वृद्धि और 2001-2011 के बीच 2,200 प्रतिशत् मुनाफा दिला रहे थे। आखिर 4 वर्षों के अन्दर सी ई ओ के वेतन में 419 प्रतिशत् की वृद्धि कैसे हुई थी; वर्तमान समय में 2.45 करोड़ रु तक वार्षिक वेतन कमा लेते हैं।

वर्करों से पता चला कि 21 वीं सदी की आधुनिक जापानी सुजुकी कम्पनी में प्रबंधन व काम-काज 17वीं सदी के सामंती तरीके से ही चलता  है। कन्ज्यूमर प्राइस इंडेक्स में 50 प्रतिशत् की वृद्धि होने के बावजूद वर्करों के वेतन में मात्र 5.5 प्रतिशत् की वृद्धि होती है। एक दिन के अतिरिक्त लीव पर 1750 रु कट जाते हैं और किसी माह के 29 ता. से अगले माह के 2 तक की छुट्टी लेने पर 16000 रु, यानि अस्थायी श्रमिक के 2 माह की तनख्वाह कट जाती है। चाय-पेशाब के लिये दी गई 7-1/2.....7-1/2 मिनट के दो ब्रक में 1 मिनट भी देर हुई तो आधे दिन की पगार कट जाती थी जबकि चाय लेने 150 मीटर की दूरी और बाथरूम के लिये 400 मीटर की दूरी दौड़कर तय करनी पड़ती है। कार्य के दौरान चोट लग जाए तो केवल प्राथमिक चिकित्सा करा दी जाती है और बाकी इलाज करवाना वर्कर के जिम्मे आ जाता है।  अधिकतम वर्करों को अस्थायी बनाए रखकर उनको ट्रेड यूनियन अधिकारों, वाजिब वेतन और सुविधाओं से वंचित रखा जाता, जो कांन्ट्रैक्ट लेबर ऐक्ट 1970 व कांट्रैक्ट लेबर सेंट्रल रूल्स 1971 का घोर उलंघन है।

18 जुलाई की घटना के बाद वर्करों की धर-पकड़ शुरू हुई और 10 नेताओं सहित 100 से अधिक वर्करों को हिरासत में ले लिया गया। अब कहा जा रहा है कि यह एक वर्गीय हमला है, जो चरमपंथी वाम द्वारा करवाया गया होगा। हरियाणा सरकार कड़ा रुख अपनाए हुए है क्योंकि उसे मारुति सुज़ुकी के संघर्ष को मिसाल नहीं बनने देना है। यह हरियाणा के उद्योग के लिये काफी महंगा पड़ेगा। एक तरफ इंडिया इंकार्पोरेटेड को लग रहा है कि सभी प्रबंधक, सुपरवाईज़र और कुछ अच्छेकर्मचारियों की सुरक्षा खतरे में है। दूसरी ओर कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने तो यहां तक कह दिया कि कम्पनी ने बिना वर्करों की पृष्ठभूमि की जांच किये उन्हें कैसे रखा गया, मानो ये कुशल श्रमिक हत्यारे और हिस्ट्रीशीटर हों ! मानेसर की कम्पनियों का इतिहास शोषण का रहा है और पूरे हरियाणा औद्योगिक पट्टी में 10,000 छोटे-बड़े उद्योगों में से 100 में ही श्रमिकों के अपने यूनियन हैं। 85 प्रतिशत् अस्थाई कर्मचारियों या एप्रेंटिसों के कंधों पर इन उद्योगों का कुशल काम टिका हुआ है।

मारुति कम्पनी के बाहर अब 500 पुलिसकर्मी और 100 कम्पनी-गार्ड तैनात रहेंगे। यदि कार्पोरेट जगत को लगता है कि औद्योगिक नगर मानेसर को पुलिस छावनी बनाकर, नए कठोर औद्योगिक कानून की पेशकश करके और प्रबंधकों की व्यक्तिगत सुरक्षा को बढ़ाकर व श्रमिकों की पृष्ठभूमि की जांच कर वे मजदूरों पर काबू पा लेंगे और शान्ति स्थापित कर लेंगे तो यह बहुत बड़ी गलतफहमी है। उन्हें समझना होगा कि यह पहली ऐसी घटना नहीं है न ही आखिरी हो सकती है, यदि श्रम कानूनों को धता बताकर कारखानों को तानाशाह प्रबंधन, मालिकों के गुलाम जिला प्रशासन और मध्ययुगीन संस्कृति के आधार पर चलाया जाएगा। यदि हम याद करें तो कोइम्बटूर के प्रीकॉल कम्पनी के उपाघ्यक्ष की हत्या, पुडुचेरी के रीजेन्सी सेरैमिक्स कम्पनी के अध्यक्ष की हत्या, नोएडा के गा्रजि़इानो ट्रान्समिशन इंडिया के सी ई ओ की हत्या, ओडिशा के पामेक्स स्टील के महाप्रबंधक का जिन्दा जलाया जाना, गाजि़याबाद के एलाइड निप्पॉन के महाप्रबंधक की हत्या और प्रबंधकों पर न जाने कितने और गम्भीर हमले व होंडा मोटरसाईकिल व ह्युडाई मोटर्स या रिको ऑटो कम्पनी की हिंसक लड़ाइयां यही शिक्षा दे रही हैं। क्या इतना कह देना काफी है कि इन सभी कम्पनियों के कर्मचारी हत्यारे या माओवादियों से मिले हैं ? सुरक्षा के मायने क्या सिर्फ प्रबंधकों की सुरक्षा है ? क्या श्रमिकों की जायज मांगों का जवाब है लेबर यूनियनों को बनने न देना और समझौता वार्ताओं की जगह बाउन्सरों का इस्तेमाल करना ?

भारत में इण्डस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट सन् 1947 में निर्मित हुआ। इसके तहत वर्करों को जो अधिकार मुहय्या होने चाहिये उन्हें भी प्रबंधक छीनते रहे हैं, पर आज दलील दी जा रही है कि ये आउटडेटेडहैं और औद्योगिक विकास में बाधक; तो अब नए कानून बनने चाहिये वे आतंक-राज चलाने के लिये करोड़ों का नुक्सान झेल लेंगे, जैसे मारुति उद्योग में प्रतिदिन 2700 करोड़ रु की हानि हो रही थी और आगे भी कम्पनी सहित ऐंसिलियरी इकाइयों को हानि होगी। फिर भी वे धड़ल्ले से, बिना नोटिस, तालाबंदी घोषित करते हैं। कई उद्योगपति अधिक घाटा होने पर दूसरी लाभकारी बिज़नेस या दूसरे राज्य में चले जाते हैं और तब दसियों वर्ष एक किस्म के काम में कुशलता-हासिल मज़दूरों को नए काम की तलाश में दर-ब-दर भटकना पड़ता है। उन्हें अपने ऊपर थोपे केस भी लड़ने पड़ते हैं। एक कम्पनी का स्थायी कर्मचारी दूसरे उद्योग में अस्थायी बन जाने के लिये मजबूर हो जाता है। वैश्वीकरण के मायने है कि कम्पनी सुपरप्रोफिट्स के पीछे भागे इसलिये वह मोह-माया से मुक्त, सस्ती से सस्ती जमीन, बिज़नेस, श्रम व संसाधनों की तलाश में रहे। पर श्रमिक के लिये हर कम्पनी एक-सी है; वह मानवता और इज्जत की तलाश में भागता फिरे पर अन्त में मुकद्मों व तारीखों के पीछे अदालतों के चक्कर लगाता रह जाए। फिर, सरकार व उसका प्रशासन भला श्रमिक-हित का रखवाला क्यों बने ?

पर अब वैश्वीकरण का दूसरा पहलू भी दिखाई पड़ रहा है। मारुति कम्पनी के श्रमिकों के पक्ष में मानेसर और आस-पास के कई इकाइयों ने आवाज़ बुलंद की। ट्रेड यूनियन में स्थायी-अस्थायी का भेद और अलग-अलग पाली में काम करने वाले वर्करों का विभाजन खत्म हो गया। सभी यूनियनों ने 9 अगस्त के प्रदर्शन में हिस्सा लेकर गिरफ्तारी दी। प्रिकॉल वर्कर्स यूनियन ने तमिलनाडु से समर्थन दिया। देश-विदेश के पत्र-पत्रिकाओं ने श्रमिकों के साक्षात्कार छापे, वकीलों के संगठनों और मानव अधिकार संगठनों ने संघर्ष का समर्थन किया। समाज में एक बहस भी छिड़ी है, जो हरियाणा के पुलिस से लेकर ग्राम पंचायतों तक को प्रभावित कर रही हैं-आज यह बात भी चल रही है कि स्थानीय युवकों को कम्पनी में काम क्यों नहीं मिलता ? कम्पनी को अब कहना पड़ रहा है कि उत्पादन के क्षेत्र में अस्थायी मजदूरों को नहीं रखा जाएगा और वर्करों को आवास मुहय्या कराए जाएंगे। यदि आज के माहौल का इस्तेमाल कर तमाम बड़े उद्योगों के श्रमिक अपने हक में बेहतर श्रम सुधारों को अंजाम दिला सकें और भूमि अधिग्रहण व भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ रहे लोगों के साथ एका कायम कर संघर्ष को नया आयाम प्रदान कर सकें तो इतिहास जरूर बदलेगा।  

-कुमुदिनी पति एपवा की पूर्व महासचिव हैं.