हंगल के जाने से उपजा सन्नाटा

उमाशंकर सिंह 

"...सिनेमा में जब वे आए तब तक वे लगभग गर्मी के पचास मौसमों के लू के थपेड़े खा चुके थे। उन्होंने दर्जीगिरी की थी, आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया था करीब तीन साल जेल की कालकोठरी में सूरज से महरूम रहे। भूख-प्यास सहा और अपने और अपने जमाने के उदास मौसम के लिए लड़ते रहे।..."

शोले फिल्म के दृष्टिहीन इमाम साहब के बेटे को डाकू गब्बर सिंह के गिरोह ने मार कर गांव भेज दिया है। वहां चारों तरफ एक भयावह, डरावनी और मार्मिक चुप्पी पसरी हुई है। उस चुप्पी को तोड़ते हुए अपने बेटे की मौत से बेखबर इमाम साहब की भूमिका जी रहे एके हंगल साहब पूछते हैं- ‘इतना सन्नाटा क्यूं है भाई?’ वैसे तो शोले फिल्म का हर डायलॉग मशहूर हुआ, पर इमाम साहब का यह  डायलॉग जितने सामाजिक-राजनीतिक अर्थ-प्रसंगों में प्रयुक्त हुआ, उतना और कोई  डायलॉग नहीं हुआ। आपातकाल के दौर में जब सरकारी दमन ने लोगों के मुंह सिल दिए थे तब आपातकाल के खिलाफ संघर्ष कर रहे नेता लोगों को ललकारते हुए कहते थे- ‘इतना सन्नाटा क्यूं है भाई। कुछ तो बोलो, कोई तो बोलो।’

सिने जगत इतना हलचल भरा स्फेयर है कि यहां मौंतें भी सन्नाटा नहीं पैदा कर पाती। अलबत्ता उपेक्षित जेन्युन कलाकारों की सन्नाटे में मौतें जरूर होती हैं। फिल्मों के सौ-दो सौ करोड़ कमाने और नायकों के करोड़ों के मेहनताने(?) के इस सुनहरे दौर में गाहे-बेगाहे कभी एके हंगल और मुबारक बेगम जैसे कई कलाकार अपने इलाज तक के लिए औरों के मोहताज हो जाते हैं।
     
1966 में बासु भट्टाचार्या की ‘तीसरी कसम’ से अपनी सिने यात्रा शुरू करने वाले अवतार कृष्ण हंगल जल्द ही हिंदी सिनेमा के उन चेहरों में शुमार हो गए थे जिन्हें शामिल किए बिना उस वक्त के हिंदी सिनेमा की तस्वीर मुकम्मल नहीं होती थी। थियेटर उनका पहला प्यार था। लोगों को मानना था कि फिल्म में अभिनय वे महज जीवन चलाने के लिए करते थे। लेकिन जितनी संजीदगी उन्होंने अपनी छोटी-छोटी भूमिकाओं में जीने में दिखाई, उससे कहीं नहीं लगा कि वे सिनेमा उनका दूसरा प्यार है या वे सिनेमा को दोयम दर्जे का माध्यम मानते हैं। सिनेमा में जब वे आए तब तक वे लगभग गर्मी के पचास मौसमों के लू के थपेड़े खा चुके थे। उन्होंने दर्जीगिरी की थी, आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया था करीब तीन साल जेल की कालकोठरी में सूरज से महरूम रहे। भूख-प्यास सहा और अपने और अपने जमाने के उदास मौसम के लिए लड़ते रहे। उन्होंने कभी इस सबके लिए सहानुभूति नहीं बटोरी। कभी किसी रावण के घर पानी नहीं भरा। किसी पुरस्कार-इमदाद की न तो कभी आरजू की और न कोशिश। 

सिनेमा में जब वे आए तो अपने बीहड़ जीवन के अनुभवों से लैस होकर आए। तभी वे उन भूमिकाओं में अपने प्राण फूंक पाए। गरीब, लाचार और निरीह लोगों के किरदार में वे भारत की 70 फीसदी वंचित जनता का दर्द और अभाव बयां कर देते थे। संभवतः यह प्रकाश मेहरा की ‘खून-पसीना’ फिल्म का दृश्य है- गांव में पंगत में भोज खाया जा रहा है। अचानक किसी की घड़ी गायब हो जाती है। तय होता है कि उस पांत में बैठे सभी लोग तलाशी देंगे। सभी सहर्ष तैयार भी हो जाते हैं पर हंगल साहब साफ मना कर देते हैं। सब लोग उन्हें घड़ी का चोर मान रहे होते हैं। चारों तरफ से व्यंग्य बाण चल रहे होते हैं। इस जलालत के बीच वे अपने जेब से उन पूडि़यों को निकालकर रख देते हैं जो उन्होंने अपने घर वालों की भूख मिटाने को चोरी की थी। जिस दौर में हंगल साहब फिल्मों में नुमायां हुए वह प्राण, महमूद, उत्पल दत्त, ओमप्रकाश और इफ्तेखार खान जैसे मंझे हुए चरित्र अभिनेताओं का दौर था। अपने सहज अभिनय के दम पर उन्होंने जल्द ही इस सूचि में अपना नाम भी शामिल कर लिया। उस वक्त के अन्य चरित्र अभिनेताओं के अभिनय में सहजता के साथ नाटकीयता का पुट भी था और हल्का लाउडनेस भी। लेकिन हंगल साहब के साथ ऐसा नहीं था सहजता और सादगी उनके अभिनय के दो बुनियादी गुण थे। अभिनय की कशिश उनमें दिखती थी, कोशिश नहीं।  वे पृथ्वीराज कपूर, बलराज साहनी, ऋत्विक घटक, सलिल चैधरी, अली सरदार जाफरी, कैफी आजमी, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी और हेमंत कुमार आदि की उस परंपरा में थे जिन्होंनें इप्टा से आकर भारतीय सिनेमा को समृद्ध किया था।

हिंदी सिनेमा के पितृ पुरुष पृथ्वीराज कपूर की तरह वे भी संपत्ति संचय में यकीन नहीं करते थे। दोनों ताउम्र किराए के मकान में रहे। जीवन भर काम करते रहने और उससे मिले धन में जीवन चलाने को दोनों ने एक मूल्य की तरह सहेजा और अंत तक इस पर कायम रहे। हंगल साहब ने अपनी मौत से कुछ दिन पहले तक शूटिंग की। उनकी प्रतिबद्धता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ‘लगान’ में वे सेट पर स्ट्रेचर पर बैठकर एक सीन की सूटिंग के लिए आए थे। हालांकि लंबी फिल्म को छोटे करने के कारण बाद में उस सीन को फिल्म से हटाना पड़ा। बाद के वर्षों में अपनी विचारधाराओं से डिगकर प्रसाद पाने वालों की लंबी फेहरिस्त रही है हमारे यहां, पर हंगल साहब यहां भी अपवाद नजर आते हैं अपनी मृत्यु से तीनेक महीने पहले जब वे हॉस्पिटल से रिलीज हुए तो उन्होंने जो दो-चार अपने शुरूआती काम किए उसमें कम्युनिस्ट पार्टी की अपनी सदस्यता को रिन्यू कराना भी शामिल था। 

वे फिल्मों के फिलर नहीं थे, बल्कि एक ऐसे सहायक अभिनेता थे जिनके बिना ना हीरो की कहानी पूरी होती थी ना फिल्म की। आज फिल्मकार बाघ बचाने जैसे फैशनेबुल समस्याओं का ब्रांड एंबेस्डर बनकर अपने को समाज सुधारक मान लेते हैं और उसकी डुगडुगी बजवाते हैं। एके हंगल प्रचार से दूर रह कर चुपचाप समाज के लिए काम किया करते थे। सांप्रदायिकता के खिलाफ उनका संघर्ष एक मिसाल है। चार्ली चैपलिन के हल्के से समाजवाद की तरफ रुझान मात्र हो जाने पर उनकी आफत कर दी गई थी, फिर हंगल साहब तो भारत में थे और घोषित कम्युनिस्ट थे। एक ऐसा भी दौर आया जब शिवसेना की गुंडागर्दी के कारण उन्हें फिल्मों में काम देना बंद कर दिया गया। क्या यह विडंबना नहीं है कि जीवन के अंत काल में इलाज के लिए शिवसेना के समगोत्री राज ठाकरे से मिली मदद स्वीकार करनी पड़ी। बहरहाल इतना तो मानना पड़ेगा कि हंगल साहब के जाने से जो खालीपन का सन्नाटा पैदा हुआ है वह आसानी से नहीं टूटेगा। 

'उमाशंकर' पत्रकार भी हैं और कहानीकार भी. 
 आज-कल फिल्मों के लिए स्क्रिप्ट लिख रहे हैं.
 इनसे uma.change@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.