ओलिंपिक पदकों की अंतर्कथा


सत्येंद्र रंजन 

"...भारत के सामने ये दोनों उदाहरण हैं। खेल मंत्री की प्राथमिकताओं से साफ है कि उन्होंने पश्चिमी पूंजीवादी देशों का रास्ता चुना है, जो सरकार की नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों के अनुरूप ही है। लेकिन यह मॉडल दूरदराज के गांव-मोहल्लों तक पनपने वाली खेल प्रतिभाओं को पहचानने और उन्हें आगे आने का मौका देने में नाकाम रहेगा।..."


सोना वहां जाता है जहां (आर्थिक) संवृद्धि (ग्रोथ) एवं संवृद्धि का वातावरण सर्वोत्तम होता है- यह बात लंदन ओलिंपिक्स शुरू होने से ठीक पहले गोल्डमैन सैक्श के अर्थशास्त्रियों ने कही। इन अर्थशास्त्रियों ने तब तक के सभी ओलिंपिक खेलों में विभिन्न देशों के प्रदर्शन को अलग-अलग कोणों से परखा। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ओलिंपिक में देशों के प्रदर्शन का वहां की प्रति व्यक्ति आय से गहरा रिश्ता है, हालांकि इसका नाता संबंधित देश में खेल संस्थानों की स्थिति एवं बुनियादी ढांचे से जुड़े पहलुओं से भी है। लेकिन ब्रिटेन के सैलफोर्ड बिजनेस स्कूल के एक अनुसंधान दल के प्रमुख प्रोफेसर डेविड फॉरेस्ट अपने अध्ययन से इस निष्कर्ष पर हैं कि किसी देश की ओलिंपिक में सफलता उसके सकल घरेलू उत्पाद  या आबादी से ज्यादा वहां की राजनीतिक व्यवस्था से तय होती है। उनके मुताबिक, ‘कम्युनिस्ट देशों ने व्यवस्थित रूप से उससे बेहतर प्रदर्शन किया है, जितना सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में उन्हें करना चाहिए था।’  दरअसल, लंदन ओलिंपिक के दौरान ब्रिटिश पत्रिका द इकॉनोमिस्ट ने एक आंकड़ा प्रकाशित किया, जिससे प्रो. फॉरेस्ट के निष्कर्ष की पुष्टि होती है। इसके मुताबिक 1996 से 2008 तक जिन देशों ने ओलिंपिक खेलों में हिस्सा लिया, उनके बीच प्रति एथलीट सबसे ज्यादा पदक कम्युनिस्ट देशों ने ही जीते। सोवियत खेमे का हिस्सा रहे पूर्वी जर्मनी ने पांच ओलिंपिक्स में भाग लिया। उसने कुल 409 पदक जीते। औसतन उसके हर 3.3एथलीट ने एक पदक जीता। दूसरे नंबर पर सोवियत संघ है, जिसका यह औसत 3.4 है। तीसरे स्थान पर मौजूद अमेरिका का यह औसत 4.1 है। चीन 6.2 औसत के साथ छठे नंबर पर है, लेकिन वह  तेजी से इस सूची में ऊपर चढ़ रहा है।

अध्ययनों से यह भी साफ हुआ है कि कम्युनिस्ट देशों ने अधिक स्पर्धाओं से अपने पदक जुटाए हैं। यानी उन्होंने अधिक से अधिक खेलों में भागीदारी की योजनाबद्ध तैयारी की, जिसका परिणाम उन्हें मिला। लंदन में अमेरिका पदक तालिका में चीन को फिर से पछाड़ कर पहले नंबर पर पहुंच गया। उसे 104 पदक मिले। इनमें 63.46 पदक सिर्फ तीन स्पर्धाओं- एथलेटिक्स, तैराकी और जिमनास्टिक- से आए। इसके विपरीत चीन को जिन स्पर्धाओं से पदक प्राप्त हुए, अगर उनमें ऊपर के तीन खेलों- गोताखोरी, तैराकी और जिमास्टिक- को देखें, तो उसे मिले कुल पदकों में इन खेलों का हिस्सा सिर्फ 32.18 प्रतिशत है। आंकड़ों से साफ है कि हाल में खत्म हुए ओलिंपिक खेलों में चीन के पदकों में सबसे अधिक स्पर्धाओं की हिस्सेदारी रही।

अब अगर सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में पदकों को परखने की कोशिश की जाए, तो यहां चीन अमेरिका से आगे नजर आता है। मेडल्सपरकैपिटा.कॉम ने इस संबंध में जो सूची बनाई है, उसमें चीन 54वें और अमेरिका 66वें नंबर पर है। चीन का जीडीपी 7298.10 अरब डॉलर है। उसने 88 पदक जीते। इस तरह हर 82.93 अरब डॉलर पर उसे एक पदक मिला। अमेरिका का वर्तमान जीडीपी 15094.00 अरब डॉलर है। उसे 104 पदक मिले। इस तरह उसने अपने हर 145.13 अरब डॉलर पर एक पदक जीता। चर्चा में आगे बढ़ने के पहले अगर भारत की स्थिति पर भी गौरें, तो अपना देश इस सूची में 78वें नंबर पर है। भारत का वर्तमान जीडीपी 1847.98 अरब डॉलर है। उसे छह पदक मिले। यानी 308.00 अरब डॉलर पर एक पदक। अपनी इस चर्चा में हम अन्य देशों को भी शामिल कर सकते हैं। लेकिन उदाहरण के तौर पर पदक तालिका में सबसे ऊपर रहे दो देशों को हमने लिया है। संयोग यह है कि उनमें एक देश पूंजीवादी है। चीन आज कितना समाजवादी है, यह अलग बहस का विषय है। मगर आज भी वहां की अर्थव्यवस्था सरकार से नियोजित है। अतीत में कम्यून से लेकर सार्वजनिक क्षेत्र के संपूर्ण नियंत्रण जैसे प्रयोग वहां किए गए हैं। ऐसे में उसकी खेल में सफलता को कम्युनिस्ट देशों की श्रेणी में रखना उचित एवं तार्किक है।

प्रश्न यह है कि क्या राजनीतिक व्यवस्था का खेल की दुनिया में सफलता से संबंध है, जैसाकि प्रोफेसर फॉरेस्ट ने कहा है? और क्या सफलता के स्वरूप को भी तय करने में राजनीतिक व्यवस्था की भूमिका होती है? इन सवालों का भारत की भावी ओलिपंक तैयारियों से गहरा रिश्ता है। लंदन ओलिंपिक में छह पदक जीतने के बाद भारत में आम तौर पर संतोष का भाव है। हमने चार साल में अपने पदकों की संख्या को दोगुना कर लिया, हालांकि बीजिंग में एक स्वर्ण पदक भी हाथ लगा था। इस बार दो रजत और चार कांस्य पदकों से हम आगे नहीं बढ़े। तब भारत पदक तालिका में 50वें नंबर पर था, इस बार 55वें स्थान पर रहा। लेकिन भारत अगर जीते छह में से एक भी पदक को स्वर्ण में बदल लेता, तो वह 31वें नंबर पर रहता। खेल मंत्री अजय माकन का मानना है कि पदकों में बढ़ोतरी ऑपेक्स लंदन का परिणाम है। खेल मंत्रालय ने ओलिंपिक के लिए तैयारी की यह विशेष परियोजना अप्रैल 2011 से अगस्त 2012 तक चलाई। अब माकन ने ऑपेक्स 2020 का एलान किया है। 2020 के ओलिंपिक में 25 पदक जीतने का लक्ष्य लेकर भारत अभी से तैयारी शुरू करेगा। फर्क यह होगा कि 2012 में खेल मंत्रालय 16 खेलों के लिए तैयारी की योजना पर चला। 2020 के लिए इस सूची में उससे कम खेल रखे जाएंगे। चूंकि भारत को पदक मिलने की सबसे अधिक संभावना मुक्केबाजी, कुश्ती, निशानेबाजी और तीरंदाजी में है, इसलिए इन खेलों पर विशेष जोर दिया जाएगा। इनके साथ बैडमिंटन को भी रखा जाएगा। स्पष्टतः यह सोच ब्रिटेन की सफलता से प्रेरित है। ब्रिटेन 1996 के अटलांटा ओलिंपिक में सिर्फ एक स्वर्ण पदक (कुल 14 पदक) जीत पाया। उसके बाद कुछ साइकिंग, नौका दौड़, घुड़सवारी और एथलेटिक्स पर ध्यान केंद्रित करते हुए वहां बड़े पैमाने पर आगे की तैयारियों में धन झोंका गया। परिणाम2000 से सिडनी ओलिंपिक से ही मिलने शुरू हो गए, जहां ब्रिटेन ने 11 स्वर्ण पदकों समेत 28 पदक जीते। बीजिंग में उसने 19 स्वर्ण पदकों समेत कुल 47 पदक हासिल किए। इस बार अपने घरेलू माहौल में वह 29 स्वर्ण समेत कुल 65 पदक जीत कर पदक तालिका में तीसरे नंबर पर काबिज हो गया। यहां ये गौरतलब है कि इस बार की तैयारियों पर ब्रिटेन ने 2,300 करोड़ रुपए खर्च किए। यानी उसका हर पदक 37 करोड़ रुपए का बैठता है।

अजय माकन मानते हैं कि भारत में खिलाड़ियों की मदद के लिए विेज्ञान एवं प्रशिक्षण की विश्वस्तरीय सुविधाएं नहीं हैं। भारतीय कोचों का स्तर कमजोर है। खेल मनोवैज्ञानिकों और हर खेल की जरूरत के मुताबिक पोषण विशेषज्ञों का अभाव है। ये सारे काम आज विशिष्ट हो गए हैं, लेकिन अपने देश में इनके शिक्षण और प्रशिक्षण की अभी शुरुआत तक नहीं हुई है। माकन का इरादा इन सभी दिशाओं में कदम उठाने का है। इसलिए उन्होंने लक्ष्य 2016 के ओलिंपिक के लिए नहीं, बल्कि आठ साल बाद के लिए तय किया है। यह मानने का आधार है कि अगर माकन की योजनाएं ठीक से आगे बढ़ीं, तो भारत के पदकों की संख्या में भी अगर अपेक्षित नहीं, तो या कम से कम संख्या के लिहाज से बढ़ोतरी हो सकती है। देश के जीडीपी में निरंतर वृद्धि हो रही है। अगर जीडीपी का संबंध ओलिंपिक के पदकों से है, तो इसका लाभ देश को जरूर मिलेगा। फिर संस्थागत एवं बुनियादी ढांचे में अगर सरकार या आगे चल कर कॉरपोरेट जगत की सहायता से सुधार होता है, तो उससे भी पदकों की वो प्यास एक हद तक बुझ सकती है, जिससे आज किसी बड़े खेल आयोजन के वक्त देश तड़पता नजर आता है। इसके बावजूद यह सवाल अपनी जगह कायम रहेगा कि क्या भारत वास्तव में खेल की दुनिया एक बड़ी ताकत बन सकता है?

यह सवाल पेचीदा है। उसका जवाब उससे भी ज्यादा जटिल है। इसलिए कि अनेक अध्ययनों से यह सामने आया है कि किसी देश के खेलों में लगातार सफल होने के लिए सिर्फ बड़ी आबादी और उपलब्ध संसाधन पर्याप्त नहीं हैं। बल्कि यहां सबसे महत्त्वपूर्ण यह बात है कि कितनी बड़ी संख्या में लोग असल में खेलकूद में हिस्सा लेते हैं। इस हिस्सेदारी का संबंध सिर्फ इच्छा या खेलों की उपलब्ध सुविधाओं से नहीं है। बल्कि इसका कहीं बड़ा नाता किसी देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल की सुविधाओं सहित वहां मौजूद सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था एवं रोजगार की सुनिश्चितता से है। अगर यह भरोसा होता है कि खेल में समय लगाने से करियर चौपट नहीं होगा और अगर जोखिम लेने के दौरान हादसा होने पर इलाज एवं पुनर्वास की व्यवस्था समाज करेगा, तो लोग स्वाभाविक रूप से खेलों के प्रति उत्साह दिखाते हैं। एक कुपोषणग्रस्त समाज में अधिक से अधिक लोगों में वह स्टैमिना एवं मानसिक दृढ़ता नहीं आ सकती, जिसकी प्रतिभा के साथ-साथ खेल में सफलता को तय करने में महत्तपूर्ण भूमिका होती है। यहां यह गौरतलब है कि हर सफल और मशहूर खिलाड़ी के पीछे उससे कई गुना ज्यादा असफल और अनजाने रह गए खिलाड़ी होते हैं। चुनौती उन खिलाड़ियों की सामाजिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने की होती है। अगर खेल में विफलता के बावजूद खिलाड़ी सुविधापूर्ण जिंदगी प्राप्त कर सकता है, तो वह बहुत से नौजवानों एवं उनके अभिभावकों को उत्साहित करता है। अगर ऐसा नहीं होता, तो विफलता एवं गुमनामी का भय लोगों को खेलों में भागीदारी से हतोत्साहित करता रहता है।

आंकड़ों में अगर कम्युनिस्ट देश ओलिंपिक में अधिक सफल दिखते हैं, तो उसका कारण यही है कि उन्होंने सिर्फ खेल का ढांचा ही नहीं तैयार किया, बल्कि सामाजिक सुरक्षा का आश्वस्त करने वाला ढांचा बनाया। कम्युनिस्ट व्यवस्थाओं में क्या खामियां रही हैं- उनमें लोकतंत्र का अभाव या मानवाधिकारों का हनन ऐसे मुद्दे हैं- जिन पर दुनिया में खूब बहस हुई है। अपनी अपनी विचारधारा और व्यवस्था का लोकतांत्रिक आधार तैयार ना कर पाने के कारण सोवियत खेमा ढह गया। हम सभी जानते हैं कि ऐसे ही कारणों से चीन की व्यवस्था भारी दबाव में है। इसके बावजूद यह तथ्य अकाट्य है कि उन व्यवस्थाओं ने मानव विकास में अभूतपूर्व निवेश किया। उन्होंने अपने यहां अवसर (राजनीतिक छोड़कर) की समानता स्थापित की। सामाजिक एवं रोजगार की सुरक्षा दी। नतीजा, खेलों की दुनिया में उनका चमकता रिकॉर्ड है। समृद्धि के साथ पूंजीवादी देशों का भी खेल जगत में उत्थान हुआ। लेकिन अनेक विश्लेषणों से यह स्पष्ट है कि वह व्यक्तिगत पृष्ठभूमि, कॉरपोरेट स्पॉन्सरशिप और कल्याणकारी राज्य के दौर में मिली सामाजिक सुरक्षाओं का परिणाम था।

भारत के सामने ये दोनों उदाहरण हैं। खेल मंत्री की प्राथमिकताओं से साफ है कि उन्होंने पश्चिमी पूंजीवादी देशों का रास्ता चुना है, जो सरकार की नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों के अनुरूप ही है। लेकिन यह मॉडल दूरदराज के गांव-मोहल्लों तक पनपने वाली खेल प्रतिभाओं को पहचानने और उन्हें आगे आने का मौका देने में नाकाम रहेगा। जो प्रतिभाएं लंबे संघर्ष और खुद की कोशिश से उभर आएंगी, उन्हें ही इसमें तराशा जाएगा। मगर इस क्रम में वह आत्म-विश्वास और कुछ कर गुजरने का जतन नहीं आ सकता, जो बचपन में ही और अपने माहौल में पैदा होता है। इस आत्म-विश्वास का अभाव प्रतिस्पर्धा के क्षणों में कितना अहम होता है, इसकी मिसाल दीपिका कुमारी और हमारे अन्य अनेक एथलीट हैं। जाहिर है, बिना सामाजिक निवेश की प्राथमिकताएं बदले यह तस्वीर नहीं बदल सकती। इसीलिए अजय माकन का इरादा भले अच्छा हो, लेकिन उससे भारत खेल की महाशक्ति नहीं बन सकता। लेकिन इसके लिए पहल माकन के दायरे से बाहर है और उससे जुड़े पहलू अभी इस बहस में कहीं शामिल नहीं हैं।
सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं.  

satyendra.ranjan@gmail.com पर इनसे संपर्क किया जा सकता है.
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