पुरुष कुंठाओं की शिकार होती स्त्रियां


सरोज, 'पटना बलात्कार कांड' पर अपने  पिछले आलेख  बाजारवाद और पुरुषवादी सोच का कॉकटेल बिहार का मीडिया को आगे बढ़ा रहे हैं. पढ़ें...      -मॉडरेटर

 

सरोज कुमार 

"...मैं बस यहीं कहना चाहता हूं कि ये पुरुष जो स्त्रियों के लिए सारी नैतिकताएं निर्धारित करते हैं खुद कितने गिरे होते हैं कल्पना नहीं की जा सकती। अपने मोहल्लों-घरों-शहरों की लड़कियां क्या पहने ना पहने, कैसे रहें ये तय करते फिरते हैं।..."


हाल फिलहाल महिलाओं ने अपने आपको जिस तरह सशक्त बनाने और सामंतवादी ढ़ांचों से बाहर निकलनेकी कोशिश की है उसी रफ्तार से उनके खिलाफ हिंसा और शोषण की खबरें भी आ रही हैं। ये घटनाएं पुरुष कुंठाओं और मर्दवादी सोच की परिचायक हैं। महिलाएं पुरुष सत्ता को चुनौती दे रही हैं। उनको सशक्त और अपने चंगुल से आजाद होता देख कुंठित पुरुष बिलबिला उठा है। परिणाम स्वरुप वह महिलाओं पर आक्रामक रुख अपना रहा है। महिलाओं के खिलाफ ऐसी सोच कोई नई नहीं है लेकिन हाल फिलहाल ये कम होने की बजाय बढ़ती चली जा रही है।

कुछ दिनों पहले जहां गुवाहाटी में एक युवती के साथ खुलेआम अश्लील हरकत की गई। वहीं बिहार में लगातार लड़कियों के साथ गैंग रेप की खबरें आ रही हैं। पटना में एक स्कूली छात्रा के साथ सिर्फ गैंग रेप ही नहीं होता बल्कि वीडियो क्लिप बना कर प्रसारित कर दिया जाता है और मीडिया उल्टे छात्रा के चरित्र को ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश में जुट जाती है। वहीं नालंदा में दो लड़कियों के साथ हुए गैंग रेप के मामले में लड़कियों को ही प्रशासन सेक्सुअली हैबीच्यूल बता कर ऐसा जताती है मानो उनके साथ ये जायज था। झारखंड की राजधानी रांची में पोस्टर चिपकाए जाते हैं कि जींस पहनने वाली लड़कियों पर तेजाब फेंका जाएगा। मानो जींस पहनना सिर्फ पुरुषों की बपौती है? वहीं बिहार के गोपालगंज में भी इसी तरह के पोस्टर चिपका दिए गए। ये सारी चीजें पुरुष कुंठाएं नहीं तो और क्या हैं? सामंतवाद अपनी जड़ें इन्हीं चीजों से दिखाता है। चंद्रमोहन जैसा नेता अनुराधा बाली को इन्हीं कुंठाओं का तो शिकार बनाता है। गीतिका मामला भी तो इन्हीं पुरुषों का खेल है। पुरुष जब चाहे स्त्री को वस्तु बना दे और स्त्री अपनी जिंदगी जीना चाहे तो अपनी कुंठाएं स्त्रियों पर प्रदर्शित करे?

पूरा समाज इन्हीं कुंठाग्रस्त पुरुषों से बजबजा रहा है। अभी हाल ही में पटना में केनरा बैंक की महिला अधिकारी ने वरीय अधिकारियों पर यौन-उत्पीड़न का आरोप लगाया है। घर हो या ऑफिस ये पुरुष पंजे फैलाए मौजूद रहते हैं। सत्ता-प्रशासन से लेकर मीडिया तक ये पुरुष कब्जा जमाए बैठे हैं तभी तो इन जगहों में सामंतवादी सोच की अभिव्यक्ति हो रही है। पुरुषों के आधिपत्य के कारण समाज की हर संस्था,सत्ता से लेकर मीडिया तक अपनी ऐसे मर्दवादी-सामंतवादी सोच का पनाहगाह बना हुआ है।

पुरुष कुंठाओं का उदाहरण है पटना गैंगरेप मामला

पटना में स्कूली छात्रा के साथ न केवल उसका तथाकथित प्रेमी प्रशांत बालात्कार करता है बल्कि इसमें अपने दोस्तों को भी शामिल करता है। और तो और इसकी सीडी बना कर प्रसारित भी कर दी जाती है। ये पुरुष ऐसा क्यों कर रहे हैं। इनकी कुंठाएं हैं जो इस रुप में बाहर आ रही हैं। इस स्कूली छात्रा का प्रेमी ये कहता है कि उसे लगा कि वह बेवफाई कर रही है। इस कुंठा को उसने अपने कुंठाग्रस्त दोस्तों के साथ निकाला। सबके साथ मिलकर वहशियाना तरीके से बालात्कार करता है। करीब 5 घंटे तक बंधक बनाकर मारते-पीटते हैं। ये मर्द इतने में ही संतुष्ट नहीं होते बल्कि पूरे 5घंटे की सीडी बना लेते हैं। बाद में ये लोग उस सीडी को एक साइबर कैफे में उसे दिखाते भी हैं। वहीं उनमें से एक अरमान इसी सीडी के बहाने बार-बार छात्रा को ब्लैकमेल करने की कोशिश करता है। जिस्मानी संबंध बनाने के लिए बुलाता है और इंकार करने पर सीडी प्रसारित करने की धमकी देता है। साइबर कैफे का संचालक भी कोई कम गया गुजरा पुरुष नहीं था। वह भी इसी बहाने अपनी रोटी सेंकने की फिराक में रहा। उस मोहल्ले का एक युवक बताता है कि कैफे संचालक भी ब्लैकमेल करने की फिराक में था। आखिरकार ये पुरुष घिनौनी विडियो क्लिप इंटरनेट पर भी डाल देते हैं, जिसमें उनकी शैतानी अट्टाहास गूंज रही होती हैं और प्रदर्शित कुंठाएं किसी भी समझदार व्यक्ति को झकझोर देने वाली हैं। लेकिन पुरुष समझे तब ना।

वहीं बाद में कानूनी शिकंजे में फंसता देख ये सारे युवक अदालत में कहते हैं कि वे छात्रा से शादी करने को तैयार हैं। यह हास्यास्पद नहीं तो और क्या है? पहले बालात्कार करो और फिर उपकार की तरह शादी करने को तैयार हो जाओ। ये पुरुषों का कितना धूर्त खेल है, समझा जा सकता है।

ये मीडिया में कौन लोग बैठे हुए हैं

मीडिया में यह प्रकरण कई दिनों तक चलता रहा। लेकिन मीडिया की रिपोर्टिंग से हम समझ सकते हैं कि कौन लोग मीडिया में बैठे हुए हैं और क्या प्रसारित कर रहे हैं। मीडिया हमेशा स्त्री को बिकाउ वस्तु की तरह ट्रीट करता है। यहां भी मीडिया इससे हटकर नहीं रहा। एक निजी चैनल गैंगरेप की सीडी हासिल कर के चला देता है। इससे एक चीज तो होती है कि प्रशासन हरकत में आती है और जनाक्रोश बढ़ने लगता है। लेकिन वहीं दूसरी ओर सारे मीडिया वाले इस घटना को किसी भी तरह कैश करने की जुगत में भीड़ जाते हैं। लड़की के घर-मुहल्ले से लेकर अभियुक्तों की जानकारियां खोदी जाने लगती हैं। हद तो तब हो जाती है जब अखबार वाले लड़की को ही बेबुनियादी तर्कों( जो सामंतवादी सोच पैदा करती है) के आधार पर कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करते हैं। यह कितना हास्यास्पद तर्क है कि लड़की के पास 500-1000 के नोट भला कहां से आ सकते हैं? वह दुकान में जाती तो 500-1000 के नोट ही ले जाती थी और महंगे गिफ्ट खरीदा करती थी, तो जरुर वह गलत रही होगी। वहीं एक निजी चैनल एक अभियुक्त को ही अपने यहां इंटरव्यू के लिए आमंत्रित कर लेता है। और पुलिस के गिरफ्तारी के समय उसका पत्रकार बेहयाई से ये कहता है कि चूंकि अभियुक्त ने चैनल में आत्मसमर्पण किया है तो रियादत दी जाएगी नावहीं सारे अखबार ये कैंपेन चलाने लगते हैं कि लड़कियों को कैसे रहना चाहिए और क्या पहनना चाहिए। ये सब कुंठित पुरुषों की अभिव्यक्ति नहीं तो और क्या है? ये महज पूंजी का खेल नहीं बल्कि ये दर्शाता है कि समाज के महत्वपूर्ण संस्थाओं पर पुरुषों ने किस तरह कब्जा जमा रखा है और अपनी कुंठाएं उगल रहे हैं।

ये सौरभ कौन है?

इस मामले में पुलिस कई दिनों तक निष्क्रिय बनी रही और इसके लिए तर्क दिया गया कि सिटी एसपी किम का तबादला। किसी का तबादला होने से काम रुक जाने चाहिए क्या। वहीं मीडिया में बात उछलने और महिला आयोग के संज्ञान में लेने के बाद पुलिस हरकत में आती है। वह लगातर सक्रिय दिखाई पड़ी। लेकिन पेंच आ कर सौरभ पर फंसता है। पीड़िता बयान में सौरभ नाम के शख्स का भी नाम लेती है। लेकिन बाद में पुलिस एक आरोपी सुशांत के नौकर दिनेश को ही सौरभ बताने लगती है। जबकि दिनेश अदालत में साफ इंकार करते हुए कहता है कि वह सौरभ नहीं।

वहीं दूसरी ओर एक बेवसाईट अपना बिहार में जदयू विधायक ज्ञानेंद्र सिंह ज्ञानू के बेटे को ही आरोपी सौरभ बता दिया जाता है। विधायक महोदय इस बेवसाईट के खिलाफ इमेज खराब करने का एफआईआर भी ठोंक देते हैं। वहीं सोशल साईटों पर इस मामले में तल्ख टिप्पण्णियां भी छाई रहती हैं। कुछ लोग ये कहते नजर आते हैं कि अगर उक्त सांसद का बेटा वो सौरभ नहीं है तो वे मीडिया में अपने बेटे को प्रस्तुत क्यों नहीं कर रहे हैं? इस मामले में विधानसभा में भी हंगामा हो चुका है किपुलिस इस मामले में एक सरकारी अफसर और एमएलए का बेटा भी है जिन्हें बचाया जा रहा है।बहरहाल अभी तक सौरभ की गुत्थी सुलझती नजर नहीं आई जबकि पुलिस दिनेश को ही सौरभ बताने पर तुली हुई है।

मुद्दा ये है कि सत्ता और प्रशासन में भी वहीं कुंठित पुरुष कुंडली मारे बैठा हुए हैं जो सिर्फ अभियुक्तों को बचाने की कोशिश ही नहीं करते बल्कि खुद भी स्त्रियों को शिकार बनाते हैं। झारखंड के पूर्व आईजी नटराजन जैसे प्रशासनिक अधिकारी इसके उदाहरम हैं। वहीं गोपाल कांडा, चंद्रमोहन, से लेकर यूपी के अमरमणि त्रिपाठी, आनंद सेन, मेराजुद्दीन, पुरुषोत्तम नरेश  द्विवेदी जैसे राजनेताओं के उदाहरण भरे पड़े हैं।

मोहल्ले-मोहल्ले, घर-घर की कहानी है यह...

पटना गैंग रेप के मामले में जिस तरह से मीडिया ने चीजें प्रसारित की और समाज के कुंठित पुरुषों ने लड़की को ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की वह किसी एक घर या मोहल्ले की कहानी नहीं है। कुंठित पुरुष घर-परिवार-मोहल्ले की स्त्रियों को किस तरह कब्जे में करने की कोशिश करता है।

कुछ सालों पहले मेरी एक दोस्त ने जो आपबीती सुनाई थी, वह आज भी मुझे झकझोर देता है। जब वह 12-13 साल की थी तो उसके सगे पिता ने उसका शोषण करने की कोशिश की थी। और ये वो पिता है जो बेटियों को इंजीनीयर और डॉक्टर बना रहा है। पहली बार जब इस तरह की बात मैं सुन रहा था तो हिल उठा था। लेकिन इन जैसी चीजों के जिक्र के दौरान जिस तरह कुछ दोस्तों ने घर-परिवार में रिश्तेदारों के द्वारा ही यौन-शोषण की कोशिश किए जाने का बात कही, वे उसी पुरुष कुंठाओं की गहराई को बयान करते हैं। मैं बस यहीं कहना चाहता हूं कि ये पुरुष जो स्त्रियों के लिए सारी नैतिकताएं निर्धारित करते हैं खुद कितने गिरे होते हैं कल्पना नहीं की जा सकती। अपने मोहल्लों-घरों-शहरों की लड़कियां क्या पहने ना पहने, कैसे रहें ये तय करते फिरते हैं। लड़कियां बाहर निकलें तो पूरी ढ़क कर भले की ये कुंठित पुरुष उनको नोंचने की कोशिश बाहर ही नहीं घर के भीतर भी करते रहते हैं। और लड़कियां उनके अनुसार न चलें तो बेहया और बदचलन घोषित कर दी जाती हैं। ये सारी चीजें बताती हैं कि सामंतवादी और मर्दवादी सोच की जड़ें समाज में कितनी गहरी हैं। पटना गैंग रेप की शिकार लड़की को कुतर्कों के आधार पर गलत ठहराए जाने की कोशिश हो या नवादा में गैंग रेप की शिकार लड़कियों को सेक्सुअली हैबीचुयल बता कर उनके साथ हुए कुकृत्य को जायज ठहराने की कोशिश, स्त्रियों के खिलाफ शोषण की सारी घटनाएं पुरुष की इसी सोच से जुड़ती है। इस सोच सदियों से मर्दों ने समाज के हर अंग पर कब्जा करने के साथ ही स्थापित किया है, जिसका विरोध जरुरी हो गया है। इस कुंठित पुरुषवाद को नहीं खत्म किया गया तो ऐसी घटनाएं और बढ़ेंगी।

सरोज युवा पत्रकार हैं. पत्रकारिता की पढ़ाई आईआईएमसी से. 
अभी पटना में एक दैनिक अखबार में काम . 
इनसे krsaroj989@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.