क्यों आशंकित है न्यायपालिका?

सत्येंद्र रंजन

''.. अगर न्यायपालिका ने भ्रष्टाचार की शिकायतों के निवारण एवं पारदर्शिता को स्थापित की प्रभावी आंतरिक व्यवस्था की होती, तो राजनीतिक व्यवस्था को उससे संबंधित मसलों में दखल देने की हिम्मत नहीं होती।..'' 
हालांकि प्रधान न्यायाधीश एसएच कापड़िया ने यही कहा है कि न्यायपालिका जजों को उत्तरदायी बनाने के लिए कानून बनाने की कोशिशों से भयभीत नहीं है, लेकिन स्वतंत्रता दिवस पर उन्होंने जिस तरह प्रस्तावित न्यायिक प्रतिमान एवं उत्तदायित्व कानून का मुद्दा उठाया, उससे साफ है कि इस कानून को लेकर सर्वोच्च न्यायपालिका में गहरी आशंकाएं हैं। जस्टिस कापड़िया ने कानून लिखने (यानी कानून का प्रारूप तैयार करने) के कौशल की वर्तमान स्थिति पर चिंता जताई। यानी उन्हें लगता है कि सरकार ने जो प्रारूप तैयार किया है और जिसे संसद की मंजूरी मिलने की पूरी संभावना है, उसमें कुछ ऐसे गैर-इरादतन प्रावधान हो सकते हैं, जिनसे न्यायपालिका के फैसले देने संबंधी और उसकी ढांचागत स्वतंत्रता पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा- देश में कानूनों के प्रारूप तैयार करने की जो स्थिति है, उसके बीच मुझे आशंका है कि हम बड़ा जोखिम उठाएंगे और संवैधानिक संतुलन में बाधा डालेंगे, जिस पर भविष्य में हमें पछताना पड़ सकता है।

प्रस्तावित उत्तरदायित्व कानून का विधेयक लोकसभा में पास हो चुका है। अब उस पर राज्यसभा में चर्चा होनी है। चूंकि इस विधेयक पर लगभग राजनीतिक आम-सहमति है, इसलिए इसके पास होने की काफी संभावना है। इसके बावजूद ऐसी खबरें हैं कि सरकार ने इसका एक खास प्रावधान हटा देने का मन बनाया है, जिसकी कुछ हलकों में आलोचना हुई थी। इसके मुताबिक यह व्यवस्था की जा रही थी कि सुनवाई के दौरान जज किसी अन्य संवैधानिक या वैधानिक संस्था के आचरण के खिलाफ अवांछित टिप्पणियां नहीं करेंगे। इसके अलावा इस बिल के जरिए जजों की नियुक्ति, उनके खिलाफ शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया, महाभियोग आदि के खास प्रावधान किए जा रहे हैं। जजों के खिलाफ आम नागरिक को शिकायत का अधिकार देने के प्रावधान पर भी सवाल उठे हैं। कुछ खबरों में बताया गया है कि सरकार इसमें भी बदलाव पर विचार कर रही है।

क्या इन प्रावधानों से न्यायपालिका की स्वतंत्रता सीमित होगी? इस प्रश्न पर गौर करने के लिए हमें प्रस्तावित कानून की पृष्ठभूमि में जाना होगा। उच्चतर न्यायपालिका ने बीते दशकों में भारतीय राज्य-व्यवस्था में अपनी विशिष्ट स्थिति बना ली है। अनेक जानकारों का ख्याल है कि आज उसकी ताकत या अधिकार-क्षेत्र उससे बहुत ज्यादा है, जितना संविधान ने उसे दिया था या जैसी संविधान की भावना थी। सबसे पहले न्यायपालिका ने संविधान के मूल ढांचे की अवधारणा विकसित कर और इस ढांचे की सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेकर संवैधानिक मामलों में अपने लिए अनूठी स्थिति बनाई। फिर मूल अधिकारों के संरक्षक के रूप में उसने वे जिम्मेदारियां और अधिकार हासिल कर लिए, जिससे- जैसाकि कहा जाता है- शासन संबंधी किसी भी मामले में हस्तक्षेप का अधिकार उसने प्राप्त कर लिया। इन दोनों ही मकसदों को पूरा करने के लिए न्यायपालिका जन हित याचिका की अवधारणा को आम चलन के रूप में कायम कर दिया। इस प्रक्रिया में शासन के बाकी दोनों अंगों- विधायिका और कार्यपालिका- के अधिकार क्षेत्र में न्यायपालिका का दखल बढ़ता गया है, ऐसी धारणा आज गहरी है। इसकी अभिव्यक्ति कई बार संसद में न्यायपालिका संबंधी विषयों पर बहस के दौरान भी हुई है।

1975 में लगा आपातकाल न्यायपालिका के लिए सबसे बुरा दौर था। तत्कालीन सरकार द्वारा पूरी सत्ता अपने हाथ में समेट लेने की कोशिश के कारण न्यायपालिका की आजादी पर प्रहार हुआ। वैसे बहुत से लोगों की यह शिकायत भी है कि उस दौर में अपनी स्वतंत्रता के की रक्षा लिए न्यायपालिका को जो साहस दिखाना चाहिए था, उसमें वह नाकाम रही। बहरहाल, 1990 के दशक में जब गठबंधन सरकारों के दौर में कार्यपालिका कमजोर हो गई, उस समय न्यायिक सक्रियता की एक नई प्रवृति उभरी। इसी समय सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले से जजों की नियुक्ति का पूरा अधिकार अपने हाथ में ले लिया। कानून के जानकार बताते हैं कि दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं है, जहां कार्यपालिका या विधायिका की जजों की नियुक्ति में कोई भूमिका नहीं हो। उधर न्यायिक सक्रियता के सिलसिले में नीतिगत मसलों से लेकर आम प्रशासन तक में अदालतों ने अपनी भूमिका बना ली। प्रशासनिक मामलों में निगरानी समितियों का गठन किया गया और उन समितियों से सीधे कोर्ट को रिपोर्ट करने का आदेश दिया गया। कुछ ऐसे मामले रहे, जब संसद द्वारा पूर्ण राजनीतिक सहमति से पास कानून के ऊपर भी अदालतों ने अपने आदेश को तरजीह दी।
    
पिछले साल 2-जी घोटाले के क्रम में सभी प्राकृतिक संसाधनों की नीलामी और काले धन की जांच के मामले में सरकार की भूमिका लगभग खत्म कर देने वाले आदेश, सलवा जुडुम के मामले में प्रशासनिक कार्य-क्षेत्र में हस्तक्षेप करता दिखने वाला आदेश तथा विभिन्न मामलों की सुनवाई के दौरान शासन के दूसरे अंगों की मर्यादा की लगभग पूरी अनदेखी करने वाली सैकड़ों टिप्पणियां वो पृष्ठभूमि है, जिससे प्रस्तावित कानून को एक बड़े सार्वजनिक दायरे में आवश्यक माना जाने लगा। इसी बीच अनेक जजों पर लगे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों ने न्यायपालिका की छवि को प्रभावित किया। सूचना के अधिकार कानून के दायरे में आने और पारदर्शिता की बढ़ती अपेक्षाओं के मुताबिक ढलने में उच्चतर न्यायपालिका की अनिच्छा ने भी न्यायपालिका के उत्तरदायित्व को सुनिश्चित करने के लिए कानून की जरूरत को रेखांकित किया। अवमनाना की कार्यवाही का अधिकार एक और विवादास्पद मुद्दा है, जिसके कारण न्यायपालिका स्वस्थ एवं खुली आलोचना से भी बची रहती है। जबकि विकसित लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में अवमानना के प्रावधान खत्म या बहुत संकुचित कर दिए गए हैं।  

यहां ये गौरतलब है कि खुद जस्टिस कापड़िया ने पिछले दो साल में अनेक बार न्यायपालिका को अपने अधिकार क्षेत्र के उल्लंघन के प्रति आगाह किया है। बल्कि 15 अगस्त के भाषण में उन्होंने सिर्फ न्यायिक स्वतंत्रता का मुद्दा नहीं उठाया। बल्कि न्यायपालिका को एक बार फिर उसकी हदों की याद दिलाई। उन्होंने कहा, हमें यह अवश्य ध्यान में रखना चाहिए कि कि (हमारे देश में) एक संस्थागत ढांचा है और संविधान की संचरना है, जिसमें अवरोध एवं संतुलन की व्यवस्था है। कभी-कभी न्याय करने की चिंता में हम ऐसी व्याखाएं कर देते हैं, जिससे शासन के तीनों अंगों (कार्यपालिका, विधायिका एवं न्यायपालिका) के बीच संतुलन बिगड़ सकता है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि हम (भारत के) लोग और कानून के शासन से संबंधित अवधारणाएं व्यापक हैं। न्यायपालिका को इनकी व्याख्या करते समय यह ध्यान में रखना चाहिए कि व्यवस्था का आंतरिक संतुलन कायम रहे।

कहा जा सकता है कि अगर जस्टिस कापड़िया की सलाह न्यायपालिका ने मानी होती, तो संभवतः उत्तरदायित्व कानून के लिए वैसी जरूरत महसूस नहीं होती, जैसी पिछले कुछ समय में हुई है। अगर न्यायपालिका ने भ्रष्टाचार की शिकायतों के निवारण एवं पारदर्शिता को स्थापित की प्रभावी आंतरिक व्यवस्था की होती, तो राजनीतिक व्यवस्था को उससे संबंधित मसलों में दखल देने की हिम्मत नहीं होती। मगर अब इस मुद्दे पर पलड़ा विधायिका एवं कार्यपालिका के पक्ष में झुका हुआ है। यहां ये गौरतलब है कि न्यायपालिका प्रातिनिधिक संस्था नहीं है। विधायिका एवं सरकारों की जवाबदेही राजनीतिक तौर पर न सिर्फ तय होती है, बल्कि वह व्यवस्था व्यवहार में कारगर भी है। भारत में सिर्फ न्यायपालिका ही ऐसी संस्था है, जो किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं है। प्रस्तावित कानून इस कमी को दूर करने का प्रयास है। अगर इस क्रम में न्यायपालिका की कुछ वाजिब शिकायतें हैं, तो उन पर जरूर ध्यान दिया जाना चाहिए। इसके बावजूद, प्रस्तावित कानून की जरूरत है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। 


सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं.  

satyendra.ranjan@gmail.com पर इनसे संपर्क किया जा सकता है.