सत्यमेव नहीं चुप्पीमेव जयते!


यह आलेख आउटलुक (अंग्रेजी), २३ जुलाई,२०१२, से साभार प्रकाशित किया जा रहा है.

-एस आनंद
अनुवाद: रोहित जोशी 

स्पृश्यता पर आधारित सत्यमेव जयते का 8 जुलाई का एपीसोड कौशल पंवार की कहानी से शुरु होता है। उनके बचपन में मजबूरीवश मां के साथ मल उठाने से लेकर संस्कृत में पीएचडी करने तक। फिर ‘एन अनटचेबल इन द आईएएस’ के लेखक बलवंत सिंह के जीवन की झलकियां दिखाई जाती हैं। अपने सहारनपुर आवास में उनका, डॉ. भीमराव अंबेडकर के कालजयी पोर्टेट को देखता हुआ एक शॉट शामिल है। मुझे ख़याल है कि 30 मिनट के इस कार्यक्रम में इस शॉट के अलावा डॉ. अंबेडकर का कोई मौखिक जिक्र तक नहीं है। बलवन्त सिंह शायद पहले और एकमात्र ऐसे आईएएस अधिकारी हैं जिन्हें डिमोट करके तहसीलदार बना दिया गया। इस बात को भी कार्यक्रम में एडिट कर दिया गया। मुझे लगा कि कार्यक्रम में जानबूझकर दो महत्वपूर्ण बिंदुओं को टाल दिया गया - आरक्षण और अंबेडकर! 

आखिर कौशल पंवार अपनी पीएचडी कर पाने और दिल्ली विश्वविद्यालय में नौकरी पाने में कैसे सफल हुई? वह कौनसी नीति है जिसके चलते दलित मल साफ करना छोड़कर मानवता, शिक्षा और एक सम्मानजनक नौकरी का दावा कर पा रहे हैं? बेशक आरक्षण! और वो कौन था, जिसने इस नीति को संभव बनाया? बेशक अंबेडकर! ल्ेकिन आमिर ने ‘आर’(रिजर्वेशन) और ‘ए’(अंबेडकर) शब्दों का जिक्र भी अपने मध्यवर्गीय दर्शक वर्ग के बिदक जाने के डर से नहीं किया। 

इसमें आश्चर्य की बात नहीं कि आमिर ने नेश्नल क्राइम रिकार्डस् ब्यूरो के इस आंकड़े को भी शामिल नहीं किया कि- प्रत्येक 18 मिनट में एक दलित अत्याचार का शिकार होता है जब्कि शुरुआती दो एपीसोडों में कानूनों और आंकड़ों को आमिर और उनकी टीम ने भरपूर इस्तेमाल किया था। इसके बाद कार्यक्रम में डाक्यूमेंट्री फिल्म मेकर स्टैलिन के पद्मा और उनकी तीन घंटे की फिल्म ‘इंडिया अनटच्ड’ के कुछ दृश्य दिखाए गए। दोबारा से गुणग्राह्य विशेषज्ञों ने ‘ए’ और ‘आर’ का जिक्र छोड़ दिया। स्टैलिन, आमिर के मुरीद दिखे और उन्हें बधाई दी।

इसके बाद कार्यक्रम में जस्टिस सीएस धर्माधिकारी आते हैं। तमाम पदवियों को नकारने की मुद्रा से शुरूवात करते हुए धर्माधिकारी अपनी हैसियत (सामाजिक) के कारण मिलने वाली वरियताओं के रास्तों पर ही चलते हैं। जिसमें उनके पूर्वजों पर शंकराचार्य की कृपा भी शामिल है।  मैंने बैजवाडा विल्सन को दर्शकदीर्घा में देखा। मैं इंतजार कर रहा था कि यह व्यक्ति जो कि पूरे भारत में सफाई कर्मचारी आंदोलन का प्रणेता रहा है इस डूबती सुबह (कार्यक्रम) को बचा ले जाएगा। इनसे भी इनके शुरूआती जीवन के बारे में कुछ पूछा गया और इन्होंने भी आंसू ही बहाए। आमिर ने भी अपनी तैयारी के हिसाब से से ऐसा ही किया। 

अगले दिन मैंने विल्सन से पूछा कि अंबेडकर और आरक्षण को क्यों छोड़ दिया गया? उन्होंने कहा कुछ प्रसंगों को एडिट कर दिया गया और कौशल पंवार के साक्षात्कार के समय वे दर्शकों में शामिल नहीं थे। लेकिन मैंने पंवार के बोलने पर उन्हें (विल्सन) को प्रतिक्रिया करते देखा था। विल्सन ने कहा ‘‘वे खुद भौचक्के हैं।’’ कौशल पंवार का साक्षात्कार एक खाली स्टूडियो में लिया गया था। लेकिन यहां हमने इस महिला द्वारा अपनी कहानी कहे जाने के बीच में कई बार, असहज, बेचैन और दर्दभरे चेहरों के क्लोजप शाॅट को देखा। वे लयबद्ध तरीके से ताली भी बजा रहे थे। स्पष्टतः ये सब धोखा था।

मैंने कौशल पंवार से भी इस बात को जानना चाहा और यह सच था। मुझे ये भी पता चला कि- आमिर और उनकी टीम ने दलित इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के दो सदस्यों के साक्षात्कार भी किए थे। इसके अध्यक्ष मलिंद काम्ब्ले और मुख्य सलाहकार अशोक खाड़े। इन्हें प्रसारण के सिर्फ एक हफ्ते पहले बताया गया कि इनके साक्षातकार ‘कहानी में फिट नहीं होने’ के कारण प्रसारित नहीं किए जाएंगे। जबकि डीआईसीसीआई के संरक्षक चंद्रभान प्रसाद ने काम्बले के साथ पूणे में यह कार्यक्रम देखा तो उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। जब साक्षात्कार लिया जा रहा था तो काम्ब्ले, धर्माधिकारी के ठीक बगल में बैठे हुए थे। लेकिन प्रसारित संस्करण में उन्हें कहीं दूर दिखाया गया है। एडिटिंग की घटिया ट्रिक के इस्तेमाल अलावा, धर्माधिकारी भी काम्ब्ले को हटाकर नया शॉट देने से नहीं झिझके। मुझे यह भी पता चला कि प्रतिभागियों ने सोशल मीडिया में प्रसारण से कई माह पहले रिकार्ड कर लिए गए इस कार्यक्रम में अपने प्रतिभाग के बारे में ना बताने को लेकर एक काॅन्फीडेंसिलिएटी एग्रीमेंट भी साइन किया था। 

हिंदू में अपने कॉलम में आमिर, ‘गांधी जी के, अछूतों के बतौर बहिष्कृत कर दिए लोगों’ के लिए संघर्ष से शुरुआत करते हैं, अम्बेडकर का बस जिक्र भर करते हुए। लेकिन गांधी ने मैनुअल स्कैवन्ज (मानव द्वारा मल साफ करने) को ‘सबसे सम्माननीय पेशा’ बताते हुए लिखा, ‘‘मैं किसी भी तरह से इसे एक अपवित्र पेशे की तरह नहीं देखता हूं। आपको गंदगी उठानी पड़ती है यह सच है, लेकिन हर मां यह करती है और उसे करना ही होगा। कोई भी, एक मां के काम को अपवित्र नहीं कह सकता।’’ उन्होंने यह भी कहा, ‘‘मेरे आदर्श भंगी को विष्ठा और मूत्र की गुणवत्ता का पता होगा। वो इसे करीब से देखकर लोगों को स्वास्थ संबंधी चेतावनी दे पाएगा।’’

यह गांधीवादी हमदर्दी है जो मैनुअल स्कैवन्ज (मैला उठाने की प्रथा) को जिंदा रखना चाहती है। जब्कि इसके विपरीत अंबेडकर के अनुसार भारत में एक मेहतर जन्म से ही मेहतर है, ‘‘हिन्दूधर्म में मैला उठाना एक चुनाव का मामला नहीं था, यह थोपा जाने वाला मसला था। गांधीवाद क्या करता है? यह माल ढोने को समाज के लिए सबसे पवित्र काम बता कर इस व्यवस्था को सुचारू रखना चाहता है।’’ 

शो में और भी चीजें मैनुपुलेट की गई हैं। विल्सन कहते हैं,‘‘वास्तव में, मैंने रोने की शुरूआत नहीं की। आमिर ने रोना शुरू किया तो मैं साथ में रोने को तकरीबन विवश था।’’ जाहिर है, आमिर का सोचना है कि हम मध्यवर्गीय पाखाने (मानसिक) को आंसुओं से बहा सकते हैं।