लोक का चितेरा ब्रजेंद्र लाल साह

- महेश चंद्र पुनेठा 
'लोक का चितेरा ब्रजेंद्र लाल साह'
लेखक- कपिलेश भोज
प्रकाशक- 'पहाड़'
परिक्रमा तल्लाडांडा नैनीताल
ब्रजेंद्र लाल साह सांस्कृतिक दुनिया का एक ऐसा नाम है जिसने उत्तराखंड की लोक विरासत को सहेजने-सँवारने, विवेचन-विश्लेषण करने और दूर-दूर तक पहॅुचाने का अविस्मरणीय कार्य किया। लोक संस्कृति को एक नयी पहचान के साथ सांस्कृतिक आंदोलन को एक नयी गति वमति दी। लोक संस्कृति के विकास में न केवल अपना अवदान दिया बल्कि एक पूरी पीढ़ीतैयार की। वे लोक जीवन और लोक साहित्य के गहरे मर्मज्ञ थे। उनके लिए लोक साहित्य मनोरंजन का साधन मात्र नहीं बल्कि जन चेतना का वाहक था। इसीलिए उनके सांस्कृतिक कर्म में सामान्य जन की पीड़ा के प्रति गहरी सहानुभूति, शोशक व उत्पीड़नकारी शक्तियोंके प्रति आक्रोश तथा आम आदमी की दुःखदायी जीवन स्थितियों को बदलने की तड़पदिखाई देती है।

उन्होंने कुमाऊॅ की पहचान बन चुके एतिहासिक लोकगीत 'बेड़ू पाको बारामासा' सहित अन्य अनेक लोकगीतों को पुनर्रचित किया। दूर-दराज के गावों में जा-जाकर लगभग दो हजार लोकगीतों को संकलित किया जिनमें अधिकांश अभावग्रस्त श्रमजीवियों के कंठो से फूटे हैं। साथ ही दो सौ धुनों को आत्मसात किया। फिर इन लोकधुनों पर आधारित कुमाउॅनी तथा गढ़वाली रामलीला के अलग-अलग चार सौ अस्सी गीत लिखे जिन्हें विभिन्न मंचों से प्रस्तुत भी किया गया।इन लोकगीतों और लोकधुनों का उपयोग दो अन्य नृत्य नाटिकाओं भस्मासुर तथा तारकासुरमें भी किया। इनमें से भस्मासुर’ का तो अब तक दस हजार से अधिक बार प्रदर्शन हो चुका है।

इसी तरह उन्होंने लोकगाथाओं को सुना-समझा और गीत-नाटक में बदलकर माटी से मंच तक पहॅुचाया। उनके द्वारा आलेखबद्ध नाटक - राजुला मालूशाही, अजुवाबफौल, रसिक रमौल, जीतू बगड्वाल, वन्या, गंगानाथ, हरूहीत, रामी बौराणी, भोलानाथ, गोरीधना आदि न केवल कुमाउॅनी जानने वाले दर्शकों बल्कि अन्य के द्वारा भी खूब सराहे गये। इन लोक गाथाओें को पहली बार मंच में प्रस्तुत करने का श्रेय इन्हें ही जाता है। इन नाटकों के द्वारा कुमाऊॅ का ग्रामीण जन-जीवन, अभावग्रस्त जीवन कीविवशता, समाज में व्याप्त संवेदनहीनता ,सामंती समाज व्यवस्था की निर्ममता तथा समाजकी अन्य विसंगतियाॅ को तो अनावृत किया ही गया साथ ही जनपक्षीय शासन व्यवस्था की आवश्यकता तथा उसके दायित्व की ओर लोगों का ध्यान भी आकर्षित किया गया।मानव के अमानवीय एवं कुटिल ढोंगयुक्त कृत्यों पर चोट करते हुए उनके प्रतिजनाक्रोश पैदा करने में इन नाटकों ने सफलता पायी।

ब्रजेंद्र लाल साह ने लोक कलाकार संघ‘, पर्वतीय कला केंद्र’ जैसे प्रसिद्ध सांस्कृतिक संगठनों के साथ मिलकर सांस्कृतिक आंदोलन को आगे बढ़ाने में अपना अप्रतिम योगदान दिया। नई पीढ़ी को पर्वतीय लोक संगीत का प्रशिक्षण प्रदान कर उनका सांस्कृतिक मानस तैयार किया। लोक को गहराई से जानने की ललक तथा उसमें पैठने की चाहत उनमें पैदा की। एक ऐसा रास्ता उन्हें दिखाया जो अतीत से वर्तमान तक तो आता ही है भविष्य की ओर भी ले जाता है। वे अपने आप में एक संस्था थे। इस संबंध में पद्मश्री शेखर पाठक के ये शब्द बिल्कुल सटीक हैं-‘रचनात्मकता, प्रयोगशीलता, सीखने-सीखाने की ललक, निश्चलता, बात बहस को महत्ता और इस सबसे आगे लिखना, गाना, नाचाना, हुड़का बजाना इतना सब संस्थाओं में ही होता है, व्यक्तियों में नहीं। पर उनमें था।’

ऐसे बहुमुखी प्रतिभासंपन्न व्यक्तित्व के जीवन और कर्म को समग्र रूप में देखने का पहला संग्रहणीय प्रयास जनपक्षधर साहित्यकारकपिलेश भोज ने उन पर अपना षोध ग्रंथ लिखकर किया। दूसरा, इसको संपादित रूप में नई पीढ़ी के सामने लाकर ‘पहाड़ की टीम ने । ‘लोक का चितेरा ब्रजेंद्र लाल साह नाम से सद्य प्रकाशित इस पहाड़ पोथी में लेखक ने ब्रजेंद्र लाल साह के व्यक्तित्व और कृतित्व को तो विस्तार से उजागर किया ही है साथ ही उनके पूरे समय और समाज को भी गहराई से खंगाला है। एक तरह से कुमाउॅ के पूरे सांस्कृतिक आंदोलन की विकास यात्रा को देखा है जो अल्मोड़ा में विख्यात नर्तक कलाकार उदयशंकर द्वारा इंडिया कल्चर सेंटर की स्थापना किए जाने के बाद मोहन उप्रेती एवं उनके कलाकार साथियों द्वारा यूनाइटेड आर्टिस्ट अल्मोड़ा के गठन से प्रारम्भ होती है। उस आंदोलन की विशिष्टताओं और सीमाओं को इस पुस्तक में सामने लाया गया है। इसी क्रम में राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे सांस्कृतिक आंदोलन की झलक भी प्रस्तुत की है। सांस्कृतिक आंदोलन को लेकर इस पुस्तक में कपिलेश भोज एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं कि पचास के दशक में लोक कलाकार संघ से जुड़े ब्रजेंद्र तथा उनकी पीढ़ी के प्रगतिशील संस्कृतिकर्मियों ने कुमाऊॅ के अल्मोड़ा शहर में जिस सांस्कृतिक आंदोलन का सूत्रपात किया था, उसका विस्तार गांवों की ओर न होकर व अंततः दिल्ली महानगर में जाकर क्यों सिमट गया? उनका यह प्रश्न जितना लोक संस्कृति या संस्कृतिकर्मियों के संदर्भ में प्रासंगिक है उतना ही साहित्य या साहित्यकारों के लिए भी। यह विडंबना ही कही जाएगी कि लोक संस्कृति हो या फिर साहित्य उसका विस्तार गांवों की ओर न होकर नगरों या महानगरों की ओर ही अधिक देखा गया है। यह बात भी अपने आप में विचारणीय है कि यहाँ के संस्कृतिकर्मियों ने जनता से लोक अभिव्यक्ति की जिस धरोहर को आत्मसात किया आखिर वह क्यों नहीं शोषण-दमन-उत्पीड़न-अभाव व नैराश्य से यहाँ की जनता की मुक्ति का साधन बनी? जैसा कि आंध्र में जन नाट्य मंडली का काम बना। कपिलेश मानते हैं कि ब्रजेंद्र के बाद की पीढ़ी में गिरीश तिवाड़ी गिर्दा’ , बल्ली सिंह चीमा आदि ने जनांदोलनों से एकरूप होते हुए जन-जागृति की दिशा में कुछ कदम आगे तो जरूर बढ़ाये, लेकिन सांस्कृतिक आंदेालन के लिए आवश्यक व्यापक व व्यवस्थिति संगठनिक ढांचे तथा सुनिश्चित कार्य योजना के अभाव में असीम संभावनाओं के बावजूद ये भी गतिरोध को तोड़ने में आगे नहीं बढ़ सके। लेखक की यह चिंता जायज है कि वर्तमान में कुमाउनी एवं गढ़वाली लोक-संस्कृति के संरक्षण व उसके उत्थान के नाम पर विभिन्न संस्थाओं द्वारा जो सांस्कृतिक गतिविधियां संचालित की जा रही हैं उनके पीछे न तो कोई व्यापक प्रगतिशील दृष्टि है और न ही वे बहुसंख्यक जनता को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। आज तो उत्तराखंड का शहरी व ग्रामीण जन-जीवन पतनशील सामंती व साम्राज्यवादी अपसंस्कृति से आच्छादित हो चुका है।

आज उत्तराखंड के छोटे-छोटे कस्बों तक में भी लोक संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के नाम पर महोत्सव आयोजित किए जाने लगे हैं जिनमें लोक संगीत के नाम पर फूहड़ कार्यक्रम प्रस्तुत कर लोक संस्कृति को बेचा जा रहा है। न इन महोत्सवों के आयोजकों को और न कलाकारों को लोकसाहित्य व लोक जीवन की कोई समझ है। उनके लिए महोत्सवों का मतलब मात्र मनोरंजन है। भीड़ जुटाना इन महोत्सवों की सफलता का मानक माना जाता है। लोक संस्कृति उनके लिए धन कमाने का साधन हो गई है। इसके लिए सरकारी कोश से धन लुटाया जा रहा है। क्या इस तरह लोक संस्कृति को संरक्षित तथा सवंर्धित किया जा सकता है? कुछ इसी तरह के हालात लोकगीतों के नाम पर लिखे जा रहे गीतों की है जिनमें लोकगीतों के नाम पर फिल्मों गीतों की पैरोडी की जा रही है। लोक का दुःख-दर्द ,हर्ष-उल्लास, आशा-आकांक्षा ,जीवन-संघर्ष और प्रकृति इन लोकगीतों में सिरे से गायब होता है। कुल मिलाकर संस्कृति निर्माण की ताकत जनता के हाथों से निकलकर संस्कृति उद्योग के हाथों चली गई है। जनता सम्मोहित होकर उसे देख रही है। ऐसे में यह पुस्तक एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है।

लोक साहित्य एवं संस्कृति को लेकर सामान्यतः दो तरह के अतिवादी दृष्टिकोण दिखाई देते हैं - पहला, लोक साहित्य एवं संस्कृति को भाववादी तरीके से देखना । लोक में व्याप्त लोक संस्कृति के हर रूप वप्रवृत्ति को महिमामंडित करना । उसको अतिशय मोह से ग्रहण करना । लोक की हरबुरी-भली चीज को बचाने और बढ़ाने की वकालत करना। दूसरा, लोक साहित्य को पिछड़ी मानसिकता से निकला हुआ बताकर उसे आधुनिकता के नाम पर पूरा का पूरा नकारना। उसे भेड़ों के झुंड से निसृत मानना। कपिलेश इन दोनों अतिवादी दृष्टिकोणों से बाहर निकलकर लोक साहित्य व संस्कृति का विवेचन एवं विश्लेषण द्वंद्वात्मक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से करते हैं। उसके प्रगतिशील तत्वों को उभारते हैं। वे साह जी की इस बात से सहमत हैं कि लोक संस्कृति सामाजिकचेतना का सबसे संवेदनशील बिंदु है और इसलिए सामाजिक क्रांति का सशक्त माध्यम है। इस पुस्तक में भी हमें उनका यही दृष्टिकोण दिखाई देता है। लेखक ने यहाँ साहजी द्वारा संकलित, रचित व पुनर्रचित साहित्य में लोक के प्रतिरोध के स्वर तथा उस आकांक्षा व स्वप्न को रेखांकित किया है जो समतामूलक समाज की स्थापना करना चाहता है। उन उद्धरणों या अंशों का चयन किया गया है जो सामंती व्यवस्था की क्रूरता को बताती हैं। समाज की विसंगतियों पर प्रहार करती हैं तथा उसको बदलने के संकल्प को व्यक्त करती हैं। एक उदाहरण यहाँ देखा जा सकता है- जिन्हें प्रेत आत्माएं कहकर पूजा जाता / ग्राम्य -देवताओं में स्थान दिया जाता है/ वे भी तो हम ही जैसे मानव थे / यह विडंबना भी कैसी है.....कैसे हैं हम लोग / इंसानों को जीवित जलवा ....सूली देकर / और गोलियाँ दाग ....दाग कर / अपनी सभ्य करनियों का परिचय देते हैं/ फिर रखते हैं उन्हें देवताओं की श्रेणी में /मूर्ति बनाते ,पूजा करते , मालाएं अर्पित करते हैं/हाँ, हम धरती के मानव कितने महान हैं। इसी तरह के और बहुत सारे उद्धरण हैं जिनमें उस समय में व्याप्त दमन, शोषण-उत्पीड़न, अन्याय-अत्याचार की झलक मिलती है। साथ ही संगठित होकर संघर्ष करने की अपील। इससे लेखक की जनपक्षधरता एवं वैज्ञानिक एप्रोच का पता चलता है। वे साह जी पर लिखते हुए किसी भावुकता या श्रद्धा में नहीं बहते। ब्रजेंद्र लाल साह के कृतित्व का विश्लेषण करते हुए इस पुस्तक में अन्याय के प्रति लोक का आक्रोश और न्यायके प्रति आशा और संघर्ष का भाव जगह-जगह परिलक्षित होता है ।

लोक साहित्य की विभिन्न विधाओं एवं लोकजीवन को समझने की दृष्टि से भी यह पुस्तक उपयोगी है। एक तरह से लोक संस्कृति पर प्रगतिशील दृष्टि से एक विमर्श की शुरूआत है। ब्रजेंद्र लाल साह द्वारा लिखित कुमाऊॅ के लोक साहित्य एवं वहाँ के प्रमुख लोक-गायकों से संबंधित लेखों के विश्लेषण के बहाने पाठकों को इसके द्वारा कुमाऊॅ के लोक साहित्य और लोक जीवन को जानने-समझने का अवसर मिलता है। जीवनी लेखक ने इतनी कुशलता से यह विश्लेषण किया है कि साह जी की रचनाओं का पता भी चल जाता है और कुमाऊॅ के लोक साहित्य की व्यापकता एवं गहराई का भी । यह विश्लेषण बड़ा रोचक है। इसमें साह जी के जीवन-दर्शन एवं दृष्टि का भी भान होता है। समीक्ष्य पुस्तक में ब्रजेंद्र लाल साह की रचनाओं के विवेचन से कुछ निष्कर्ष निकाले गए है जो विचारणीय हैं–
  • क. लोक संगीत व लोक साहित्य के विभिन्नप्रकारों एवं पक्षों तथा उनमें समाहित लोक-जीवन के बिंबों का समग्रता में अध्ययन -विश्लेषण किए जाने की विषेश आवश्यकता है ।
  • ख. लोकगाथाओं एवं लोकगायकों के धीरे-धीरे लोप होते चले जाने की वर्तमानस्थिति में लोक विरासत को संरक्षित करते हुए उसका सृजनात्मक विकास एवं प्रचार-प्रसारकिया जाना चाहिए।
  • ग. एकाकीपन, अभाव व आर्थिक विशमता से उत्पन्न लोक-अभिव्यक्तियों में परिलक्षित होने वाली बेहतर जीवन की जनाकांक्षाओं को मूर्त रूप देने के लिए सामूहिक प्रयास किए जाने की अत्यधिक आवश्यकता है।
  • घ. लोक-विरासत के संरक्षक लोक-कलाकारों के परिचय एवं उनके महत्व को अधिकाधिकउजागर किए जाने तथा उनके विकास के लिए उन्हें आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराए जाने की भी आवश्यकता है। इस पुस्तक को अद्योपांत पढ़ लेने के बाद भी कुछ इसी तरह के निष्कर्ष निकलते हैं।
उन्होंने यहाँ ब्रजेंद्र लाल साह के बहाने उनके समकालीनों और सांस्कृतिक संस्थाओं के योगदान का गहन विवेचन किया है। इस पुस्तक में हमें ब्रजेंद्र लाल साह के अतिरिक्त मोहन उप्रेती, मोहन सिंहरीठागाड़ी, गोपीदास, बृज मोहन साह,  गिरीश तिवाड़ी गिर्दाआदि संस्कृतिकर्मियों के योगदान की झलक मिलती है। साथ ही सांस्कृतिक आंदोलन में लोक कलाकारसंघ और ‘पर्वतीय कला केंद्र’ की भूमिका का उल्लेख भी यहाँ मिलता है। उस प्रक्रिया का भी पता चलता है कि एक बड़ा कलाकार बनने के लिए कितनी तैयारी एवं साधना की आवश्यकता पड़ती है? कैसे स्वंय को वर्गांतरित कर लोक में घुलना पड़ता है? इस पुस्तक से पता चलता है कि साह जी जो कुछ पा पाए या कर पाए उसके पीछे उनका सरल-सहज हॅसमुख स्वभाव, विनम्रता, गहरी संवेदनशीलता, सहयोगी भावना, आशावादी प्रगतिशील दृष्टिकोण, अन्याय-अत्याचार-शोषण के प्रति आक्रोश, दृढ़ इच्छाशक्ति, धैर्य, सहनशीलता आदि गुण रहे। कपिलेश भोज मानते हैं कि अपने इसी आडंबररहित, सरल-सहज स्वभाव तथा जनसामान्य के प्रति गहरी संवेदनशीलता व लगाव के कारण ही वे शहर के निवासी होते हुए भी ग्रामीण जनता में आसानी से घुल-मिल सके और लोक संस्कृति की दुर्लभ विरासत को आत्मसातकर सके। इसलिए यहाँ यह कहना भी गलत नहीं होगा कि विवेकानंद और कार्ल मार्क्स की विचारधाराओं से प्रभावित होने को साथ-साथ लोक के प्रति गहरी रागात्मकता के चलते ही सामान्य जन की पीड़ा के प्रति गहरी सहानुभूति, शोशक व उत्पीड़नकारी शक्तियों के प्रति आक्रोश तथा आम आदमी की दुःखदायी जीवनस्थितियों को बदलने की तड़प उनके समूचे साहित्य में अंतःसलिला की भांति समा पाई। इस संबंध में साह जी अपने उपन्यास शैलसुताके बारे में बताते हुए कहते हैं - जनमानस के गीतों को आत्मसात करने से पूर्व जन-जीवन को आत्मसात करना परम आवश्यक है। मुझे विभिन्न स्थितियों में अनेक ग्रामों में जन-साधारण के साथ घुल-मिलकर रहने का सुअवसर प्राप्त हुआ, तभी मैं लोकमानस और लोक-जीवन का अघ्ययन कर सका और एक भ्रमणशील बंजारे का जीवन जीकर अनेक सुखद और दुखद अनुभूतियों को अपने में संजो सका और वर्षों के अंतर्मंथन के बाद यह रचना प्रस्तुत कर सका।

आज जब बाजार प्रायोजित मास कल्चर (समूह संस्कृति) द्वारा लोक संस्कृति पर आक्रमण किया जा रहा है, उसे भी बाजार की वस्तु बनाया जा रहा है, लोक जीवन से काट तमाशा दिखाया जा रहा है, उसमें फूहड़ता भरी जा रही है तथा उसकी गतिषीलता और रचनात्मकता को कुंद किया जा रहा है तब लोकसंस्कृति की ताकत को समझने के लिए यह पुस्तक बहुत उपयोगी हो जाती है । हर संस्कृतिकर्मी द्वारा जो संस्कृति कर्म को एक सामाजिक दायित्व के रूप में करना चाहता है, यह पुस्तक अवश्य पड़ी जानी चाहिए। सांस्कृतिक आंदोलन की दिशा में आज जो शून्यता-गतिरोध की स्थिति आ गयी है उसमें यह पुस्तक और अधिक प्रासंगिक हो जाती है। यह पुस्तक सांस्कृतिक आंदोलन की रिक्तता और दिशाभ्रम को तोड़ती है तथा सांस्कृतिक आंदोलन में लोक साहित्यकी भूमिका को चिह्नित करती है। बताती है कि लोक साहित्य का उद्देश्य जनता का मनोरंजन करना या अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति जानकारी बढ़ाना मात्र न होकर सामाजिक अन्याय व शोषण-उत्पीड़न के प्रति संघर्ष चेतना विकसित करना तथा समतामूलक समाज की रचना करने के लिए प्रेरित करना होता है।


 
महेश पुनेठा अभी के चर्चित कवि और समी‍क्षक हैं. हिंदी की प्रतिनिधि पत्रिकाओं में लगातार कविताऐं और कविता समीक्षाएं प्रकाशित. 'भय अतल में' नाम से इनका एक कविता संग्रह काफी पसंद किया गया. इंटरनेट में इनसे punetha.mahesh@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है और पत्राचार से संपर्क करना हो तो पता- जोशी भवन निकट लीड बैंक चिमस्यानौला पिथौरागढ़ 262501