जल चुका दलित हॉस्टल और 'इंट्रोडक्शन ऑफ द कांस्टिट्यूशन ऑफ इंडिया'

-सुधीर सुमन
फोटो : सरोज कुमार
रा में रणवीर सेना के सरगना ब्रह्मेश्वर की हत्या के बाद जलाए गए छात्रावास की वीडियो रिर्काडिंग देख रहा था। छात्रों ने इसे खुद ही तैयार करवाया था। यह वीडियो इस भीषण आगजनी का साक्ष्य है। हालांकि एक महीना से अधिक वक्त गुजर गया है, लेकिन अभी तक होस्टल की मरम्मती और छात्रों के मुआवजे के लिए प्रशासन ने कुछ नहीं किया है। प्रशासन को नीतीश सरकार से हरी झंडी नहीं मिल रही होगी। 30 जून को मैं आरा पहुंचा था और उसी दिन शाम में छात्रावास गया था। कुछ तो वातावरण में उमस थी, पर एक गहरी उमस जो जेहन को अपने चपेट में लिए हुए थी, वह सरकार, प्रशासन और शासकवर्गीय राजनीतिक पार्टियों की दलित विरोधी भूमिका के कारण थी। कुछ परिचित पत्रकारों ने इस आगजनी में जद-यू, भाजपा से जुड़े लोगों की भूमिका की जानकारी दी। मुझे यह भी पता चला कि एक अखबार के छायाकार को भी छात्रावास में तोड़फोड़ और आगजनी करने वालों ने कमरे में बंद कर दिया था। इसके पहले ब्रह्मेश्वर की शवयात्रा में भी पत्रकार उनका निशाना बने थे। एक अखबार के पत्रकार ने बताया कि आरा में ब्रह्मेश्वर की हत्या के हंगामे के बीच उसी सड़क से आ रहे किसी व्यक्ति ने अपनी जीप को होस्टल के कैंपस में लगा दिया था, ब्रह्मेश्वर समर्थकों ने उसमें भी आग लगा दी थी, उसी की तस्वीर उनके अखबार में छपी थी।

आश्चर्य यह है कि किसी भी अखबार ने छात्रावास के जले हुए कमरों की कोई तस्वीर नहीं छापी। अब भी जली हुई खिड़कियों, किताबों, प्रमाणपत्रों, आलमारियों, बुकसेल्फ, बेड, टीन के बक्सों और अनाज के डिब्बों आदि को वहां देखा जा सकता है। जलने की तेज बू अभी भी महसूस की जा सकती है। आग से कुछ कमरों का प्लास्टर उखड़ चुके हैं। खिड़कियों के टूटे हुए कांच अब भी बिखरे हुए हैं। एक बिल्डिंग हमलावर जिसका गेट तोड़ नहीं सके थे, उसकी खिड़की से उन लोगों ने जलते टायर फेंक कर आग लगाने की कोशिश की थी। हालांकि भीषण आगजनी से यह बिल्डिंग बच गई थी, पर उसकी खिड़की पर चिपका हुआ टायर का एक छोटा-सा टुकड़ा इसका गवाह था कि आग किस तरह लगाई गई होगी। छात्रों ने बताया कि उनके छोटे गैस सिलेंडरों का भी इसके लिए इस्तेमाल किया गया होगा, क्योंकि वापस आने पर उनके अधिकांश गैस सिलेंडर नहीं मिले। कमरों में पंखों के डैने आग से गलकर चू गए हैं। बिजली की सारी वायरिंग उखाड़ दी गई है।  मुझे एक जगह जली हुई साइकिलों का उंचा ढेर नजर आया। एक जला हुआ ह्विल चेयर भी मुझे वहां दिखा। जली हुई बाइक और साइकिलें अब भी गवाह थीं गरीबों-दलितों के प्रति सामंती घृणा की। हमलावरों ने छात्रावास कैंपस में मौजूद सभी हैंडपैंप और छत पर मौजूद पानी की टंकी तोड़ दी थी। जब प्रशासन ने कोई इंतजाम नहीं किया तो छात्रों ने खुद ही अपने पैसे से हैंडपैंप ठीक कराए। छात्रों ने बताया कि उनके कमरे से टीवी, स्टेबलाइजर, टेबुल लैंप, लैपटाॅप, घड़ी, रेडियो और अच्छे कपड़े भी हमलावर लूटकर ले गए। 

एक कमरे में एक पिघली हुई दीवाल घड़ी को देखकर मशहूर चित्रकार साल्वाडोर डाॅली के एक अतियथार्थवादी पेंटिंग की याद आ गई, लेकिन यह घड़ी किसी अतियथार्थ का उदाहरण नहीं थी, बल्कि जातिवादी-सामंती घृणा के परंपरागत यथार्थ को प्रतिबिंबित कर रही थी, जिसे बदलना आज भी एक जनतांत्रिक समाज निर्माण के संघर्ष का जरूरी कार्यभार है। यह पिघली हुई घड़ी हमारे लोकतंत्र और समाज पर एक प्रश्नचिह्न की तरह टंगी हुई लगी। 

फोटो : सरोज कुमार
कमरों में बिखरे अनाज, बरतन, आइना, चप्पल और किताबों के बीच ही मुझे फर्श पर एक खुली हुई किताब नजर आई, जो जलते-जलते रह गई थी। खुले हुए पृष्ठ पर मोटे अक्षरों में एक अध्याय का शीर्षक लिखा हुआ था- गवर्नमेंट ऑफ द स्टेट्स। मैंने उसे अपने हाथों में उठाया, तो पाया वह किताब थी- इंट्रोडक्शन ऑफ द काॅन्सीट्यूशन ऑफ इंडिया। जेहन कड़वाहट से भर उठा। कैसा स्टेट, कैसी गवर्नमेंट और कैसा इंडिया- इसका जो इंट्रोडक्शन इस हमले ने दिया है, उसके आगे संविधान का इंट्रोडक्शन कितना बेमानी सा लगता है! भोजपुर में साठ के दशक के आखिर में जो संघर्ष शुरू हुआ था, वह संविधान प्रदत्त अधिकारों को सामंती शक्तियों और उनके इशारे पर काम करने वाली प्रशासन व सरकार द्वारा कुचलने के खिलाफ ही शुरू हुआ था। गरीब-दलित-पिछड़े-अल्पसंख्यक समुदाय के लोग शिक्षा और रोजगार हासिल करें, उन्हें उनके सामाजिक-राजनीतिक अधिकार मिलें, यह सामंती शक्तियां कतई पसंद नहीं करती थीं। मुझे यही अहसास हुआ कि संविधान और नियम-कानून से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है उनका लागू होना। बेशक शोषित-उत्पीडि़त समुदायों के संवैधानिक अधिकारों को भी बगैर संघर्ष के हासिल नहीं किया जा सकता। 


यहां हमेशा की तरह छात्रों के लोकतांत्रिक हक-अधिकार के लिए संघर्ष करने वाले छात्र संगठन आइसा ने ही संघर्ष की कमान संभाल रखी है। जेएनयू, दिल्ली से भी आइसा की एक टीम इस घटना की जांच करने पहुंची और सरकार व प्रशासन की संवेदनहीनता के खिलाफ छात्रों के संघर्ष का समर्थन किया। जिलाधिकारी के घेराव और तालाबंदी के बाद छात्रों ने भारी बारिश में पटना में प्रदर्शन किया, तब कल्याण मंत्री जीतन मांझी ने एक हफ्ते के भीतर जांच टीम भेजने का आश्वासन दिया, लेकिन दो हफ्ता से अधिक समय गुजर चुका है, कोई जांच टीम आरा नहीं पहुंची है। एक माह के बाद भी किसी दूसरे छात्र संगठन ने दलित छात्रावास पर हमले और लूटपाट के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया है। कारण यह है कि जिन राजनीतिक पार्टियों से वे संबद्ध हैं, वे तो गरीब-दलित-अल्पसंख्यकों के हत्यारे ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या को लेकर आंसू बहा रही थीं और उनमें खुद को सामंती शक्तियों का हितैषी दिखाने की होड़ लगी हुई थी, तो भला दलित छात्रावास की उन्हें फिक्र क्यों होती? 

मुझे एक जले हुए कमरे में मिली ग्रामर एंड कम्पोजिशन की किताब की उस वक्त याद आई, जब मालूम हुआ कि मेरे वहां जाने के ठीक एक दिन बाद भाजपा, राजद, लोजपा, बसपा आदि के स्थानीय दलित नेता छात्रावास पहुंचे और छात्रों के बीच जिलाधिकारी के पास धरना-प्रदर्शन का प्रस्ताव रखा। वे इस मामले में आइसा की भूमिका की सराहना करने के लिए विवश थे, पर उनका कहना था कि जिलाधिकारी के पास प्रदर्शन बिना किसी संगठन के बैनर के किया जाए, जबकि छात्रों का कहना है कि उनका आंदोलन आगे बढ़ चुका है, अगर वे इस मुद्दे पर साथ हैं, तो अपनी-अपनी पार्टियों के पैड पर हमलावरों के खिलाफ बयान दें और अपने अपने पार्टियों के बैनरों के साथ प्रदर्शन करें तथा छात्रों को मुआवजा देने के लिए प्रशासन पर दबाव बनाएं। इसी दौरान जद-यू से संबद्ध एक दलित नेता को छात्रों ने छात्रावास में घुसने नहीं दिया। जाहिर है शासकवर्गीय राजनीति का जो ग्रामर और कम्पोजिशन है, उसे भी छात्र बखूबी समझ रहे हैं। 

इस हमले में करीब तीस छात्रों के शैक्षिक प्रमाणपत्र भी जल गए हैं। छात्रों ने बताया कि जब साढ़े नौ बजे छात्रावास पर दूसरा हमला हुआ, तब कुछ पुलिसकर्मियों ने छात्रों से भागकर अपनी जान बचाने के लिए कहा। हमलावरों ने भागते हुए छात्रों में से कुछ के साथ मारपीट भी की और उनके प्रमाणपत्र फाड़ डाले। इसलिए दलित छात्रावास पर यह हमला महज ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या की प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि परंपरागत सामंती-वर्णवादी घृणा और विद्वेष की ही अभिव्यक्ति है। यह मानसिकता गरीबों-दलितों, शोषित-उत्पीडि़त वर्गों के हर किस्म के उत्थान और दावेदारी के विरुद्ध होती है। नहीं तो कोई वजह नहीं थी कि जिस हत्या में शक की सूई सीधे तौर पर सत्ताधारी विधायक और रणवीर सेना के एक दूसरे सरगना की ओर मुड़ी हुई थी, तब बिल्कुल सुनियोजित तरीके से दलित छात्रावास पर हमला किया गया। छात्रावास पर जब दूसरा हमला हुआ उसी के आसपास डीजीपी अभयानंद भी उस मुहल्ले में पहुंचे थे। एसपी का आवास भी छात्रावास से महज आधे किलोमीटर पर मौजूद है। दोपहर में जब तीसरी बार छात्रावास पर हमला कर भीषण आगजनी की गई, तब शहर में वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय के बगल में मौजूद इस छात्रावास को बचाने वाला कोई नहीं था। इसने बरबस बथानी टोला जनसंहार की याद दिला दी, जहां भरी दोपहरी में 16 साल पहले दलित-अल्पसंख्यक बच्चों और महिलाओं की नृशंस हत्या करके उनकी बढ़ती सामाजिक-राजनैतिक दावेदारी को कुचलने की कोशिश की गई थी और उन्हें बचाने के लिए आसपास के तीन पुलिस कैंपों से पुलिस नहीं आई थी, बल्कि पुलिस, प्रशासन, शासकवर्गीय राजनीतिक पार्टियां और सरकारें हत्यारों के पक्ष में खड़ी रहीं, यहां तक कि 16 साल के बाद हाईकोर्ट ने हत्यारों को छोड़ दिया। कभी ब्रह्मेश्वर ने बेगुनाह महिलाओं और बच्चों की हत्या को जायज ठहराने के लिए यह कुतर्क दिया था कि महिलाएं नक्सलाइटों को जन्म देती हैं और बच्चे बड़े होकर नक्सलाइट बनते हैं और आज उसके समर्थकों ने छात्रावास और छात्रों पर हमले किया है, शायद इसलिए कि उन्हें लगता है कि गरीब-दलित छात्र पढ़-लिखकर अपने हक-अधिकार की बात करते हैं, सामाजिक-आर्थिक और राजनैतिक बराबरी चाहते हैं। इस आगजनी और लूट के जरिए उन्होंने दलित छात्रों को एक चेतावनी देने की ही कोशिश की है। आखिर क्या वजह है कि ब्रह्मेश्वर के श्राद्ध में गैस सिलेंडर फटने पर तो 8 लाख का मुआवजा दिया जाता है, पर दलित छात्रों की कोई मदद नहीं की जाती। हालांकि छात्रों का जो प्रतिनिधिमंडल जिलाधिकारी से मिला उससे उन्होंने इनकार किया है कि उनकी ओर से 8 लाख का मुआवजा दिया गया है। उनका कहना है कि मीडिया ने यह गलत खबर दी है। सवाल यह है कि अगर मीडिया ने गलत खबर दी है, तो प्रशासन ने इसके खिलाफ बयान क्यों नहीं दिया?
फोटो : सरोज कुमार

यह विडंबना है कि मीडिया ने भी इस हमले की बिल्कुल अनदेखी की है। दलित छात्र उनके लिए भी उतने ही पराये हैं, जितना पुलिस, प्रशासन, सरकार और शासकवर्गीय पार्टियों ने उन्हें पराया समझा। सिर्फ एक नौजवान पत्रकार सरोज कुमार आरा आए और उन्होंने इसके बारे में विस्तार से लिखा, जिसे किसी अखबार और पत्रिका ने कोई जगह नहीं दी। एक-दो ब्लाॅग्स पर उनकी रिपोर्ट आई। फिलहाल इस छात्रावास के छात्र अपने छात्रावास की मरम्मती तथा मुआवजे के साथ-साथ बथानी जनसंहार के पीडि़तों के लिए न्याय की मांग को लेकर आरा में 11 जुलाई को हो रही भाकपा-माले की ‘न्याय रैली’ की तैयारियों में जुटे हैं, जिसमें बिहार में वर्तमान सत्ता द्वारा की जा रही बेइंसाफी की कई दूसरी घटनाओं के खिलाफ भी व्यापक संघर्ष चलाने का संकल्प लिया जाना है।



सुधीर सुमन वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं. इनसे  इंटरनेटीय पते s.suman1971@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.