अतिवादी उत्साह की विवेकहीनता (अम्बेडकर कार्टून विवाद)


-सत्येंद्र रंजन

खिरकार सुखदेव थोराट कमेटी ने उन कार्टूनों को एनसीईआरटी की किताबों से हटाने की सिफारिश कर दी है, जिन पर संसद में और बाहर भी- कई राजनीतिक समूहों की तरफ से एतराज किया गया था। सिफारिश उम्मीद के मुताबिक ही है। मगर इस निष्कर्ष से असहमत समिति के सदस्य मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्डटीज से जुड़े विद्वान एमएसएस पांडियन की यह टिप्पणी गौरतलब है कि जो बात राजनीतिक रूप से सही (पॉलिटकली करेक्ट) हो, जरूरी नहीं है कि वह शैक्षिक रूप से भी उचित हो। यानी पांडियन- और उनकी तरह ही देश में बहुत से दूसरे लोग- यह मानते हैं कि थोराट कमेटी की ये सिफारिश पॉलिटकली करेक्ट होने की कोशिश का हिस्सा है। यह शिक्षा में आलोचनात्मकता को बढ़ावा देने के मकसद के खिलाफ है। बहरहाल, यह राय आज खुद को सामाजिक न्याय का विरोधी ठहरा दिए जाने का जोखिम उठाते हुए ही रखी जा सकती है। ऐसा इसलिए कि अपने को न्याय और लोकतंत्र का पक्षधर मानने वाले जमातों में अपने हमेशा सही होने और दूसरों से अपने रुख के प्रति संपूर्ण समर्पण की आज अतिवाद की हद तक पहुंच गई है। नतीजा है कि ये जमाते लगातार बंटती ही जा रही हैं।

यही कारण है कि एनसीईआरटी की किताब में डॉ. अंबेडकर के कार्टून को शामिल करने पर हाल में हुए विवाद का लोकतांत्रिक दायरे के लिए दूरगामी नतीजा क्या होगा, यह सोचने की जरूरत अभी शायद किसी ने महसूस नहीं की है। संबंधित कार्टून में दलित चेतना के सर्वोच्च प्रतीक के प्रति सवर्ण पूर्वाग्रह अंतर्निहित है या नहीं, इस पर बहस इस लेख का विषय नहीं है। बल्कि हम अपनी बात को आगे बढ़ाने के क्रम में फिलहाल यह मान लेते हैं कि उस कार्टून से दलितों की भावनाएं आहत होती हैं। लेकिन हमारा प्रश्न उसके आगे का है- यह कि अगर ऐसा होता है, तब भी क्या जिस आक्रोश के साथ उस पर विरोध जताया गया और उस विरोध से तनिक भी असहमति रखने वाले लोगों के प्रति प्रतिक्रिया जताई गई- क्या वह दलित आंदोलन और प्रकारांतर में समाज के व्यापक लोकतंत्रीकरण के उद्देश्यों से हित में है? इस प्रश्न का संदर्भ व्यापक है। इसलिए कि जब कभी समाज का कोई हिस्सा या समूह अपनी भावनाओं, अपने उद्देश्य और अपने एजेंडे को एकसू्त्री बना लेता है, और वह एक ऐसी लकीर खींच लेता है, जिसके बाहर के तमाम लोग उसे शत्रु लगने लगते हैं, तो उस प्रक्रिया में वह अंततः व्यापक जनतांत्रिक सहमति को नुकसान पहुंचाता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पिछले कुछ वर्षों में अनेक समूहों के अतिवाद के कारण यह जनतांत्रिक समूहों का दायरा बंटता गया है। समस्या की जड़ यह है कि ऐसे समूह सभी लोगों से संपूर्ण समर्पण की अपेक्षा रखते हैं। वे चाहते हैं कि बाकी तमाम लोग दुनिया और समाज को उनके ही नजरिए से देखें। और जो ऐसा नहीं करते, वे उन्हें अपने मकसद के विरोधी लगने लगते हैं। इस संदर्भ में हम कह सकते हैं कि जॉर्ज बुश जूनियर द्वारा 9/11 के बाद अपनाई गई कसौटी को बड़े पैमाने पर वो लोग भी अपनाए हुए हैं, जो खुद डेमोक्रेट या न्याय की लड़ाई का योद्धा मानते हैं। ये कसौटी है- तुम या तो हमारे साथ हो या फिर हमारे दुश्मन।

मसलन, पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे के खिलाफ हुई गोलबंदी को याद करें। विवेक की कसौटी पर यह समझना किसी के लिए कठिन हो सकता है कि जनतांत्रिक संघर्ष में वाम मोर्चा के खिलाफ ममता बनर्जी दोस्त कैसे हो सकती हैं? राजनीतिक दोस्त एवं दुश्मन की समझ बनाने में क्या वर्ग चरित्र और किसी पार्टी या नेता के अंतिम मकसद की अनदेखी की जा सकती है? लेकिन, बंगाल और वहां के संदर्भ में खुद को जनपक्षीय मानने वाली बहुत-सी ताकतों ने ऐसा किया। माओवादियों से लेकर मेधा पाटकर तक ने ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री बनाने की अपील की। जिन माओवादी नेता किशनजी ने इसमें सबसे ज्यादा उत्साह दिखाया, उनके साथ ममता बनर्जी की सरकार ने क्या सलूक किया, यह उस पूरे घटनाक्रम की प्रतीकात्मक कथा है। दरअसल, नंदीग्राम और सिंगूर को केंद्र बनाकर हुई वाम मोर्चा विरोधी गोलबंदी का परिणाम देश के जनतांत्रिक जनमत में विभाजन के रूप में सामने आया। इसकी वाम मोर्चा की हार में कितनी भूमिका रही, यह आकलन का विषय है। उसके साथ इसका मूल्यांकन भी जरूर होना चाहिए कि उस विभाजन के कारण तमाम जन-संघर्षों की राजनीतिक ताकत कितनी कमजोर हुई है? इस सिलसिले में यह सवाल प्रासंगिक है कि माओवादियों से लेकर जन-आंदोलनों के तथाकथित प्रतिनिधियों द्वारा वाम मोर्चे की पराजय को अपनी प्राथमिकता बनाना क्या सही रणनीति थी? अंतिम परिणाम के रूप में आखिर इससे क्या हासिल हुआ? क्या आज संगठित वामपंथ की कमजोर अवस्था के साथ भारतीय राजनीति बेहतर स्थिति में है?

ऐसे कुछ प्रश्न कथित अन्ना आंदोलन की लहर पर सवार हो गए जन-आंदोलनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से भी हैं। भ्रष्टाचार विरोध के नाम पर सांप्रदायिक शक्तियों की मदद से दक्षिणपंथी समूहों द्वारा आयोजित इस आंदोलन ने संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अनादर और द्रोह का जो माहौल पैदा किया- उसमें सहभागी बन कर इन कार्यकर्ताओं ने समाज के लिए आखिर क्या हासिल किया? आंदोलन के नेतृत्व से जुड़े राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा वाले लोगों का एजेंडा साफ था। लेकिन जन-आंदोलनों के लंबे दौर से अपनी साख बनाने वाले कार्यकर्ता किस उम्मीद में वहां गए, इस पर सिर्फ अटकलें ही लगाई जा सकती हैं। बहरहाल, उस आंदोलन की तीखी जुबान इसका नतीजा जनतांत्रिक दायरे में एक और विभाजन के रूप में हुआ। बहुत से जन संगठनों और कार्यकर्ताओं में अपनी भूमिका को लेकर संशय बना। आज उन दो खेमों में बंटे समूहों के बीच समन्वय और सहमति की अपेक्षाकृत कम गुंजाइश है।

ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि परिस्थिति ऐसी बना दी जाती है, जब हम सबको कोई एक पक्ष चुन लेने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। मसलन, नंदीग्राम की मोर्चाबंदी के बाद यह विकल्प नहीं रह गया कि आप संगठित वामपंथ और चरम वामपंथ के बीच उद्देश्य की किसी एकता की तलाश कर सकें। आपको यह चुनना ही था कि उस कालखंड में आप उनमें से किसके पक्ष में हैं। अन्ना आंदोलन की भाषा और उसकी चरमपंथी अंदाज से अगर आप असहमत थे, तो उस आंदोलन के समर्थकों के नजर में आप सिर्फ कांग्रेस के समर्थक (असल में दलाल) ही हो सकते थे।

अंबेडकर के कार्टून प्रकरण ने एक बार भी यही स्थिति पैदा की। हालांकि दलित आंदोलन के भीतर से कई विवेकशील आवाजें भी उठीं, लेकिन खासकर सामान्य स्वर यही रहा कि उस कार्टून को एनसीईआरटी की किताब में शामिल करने की अगर आप निंदा नहीं करते, तो आप दलित भावनाओं के विरोधी हैं। पराकाष्ठा तो यह हो गई कि डॉ. अंबेडकर को पैगम्बर मोहम्मद की तरह का मसीहा बताकर यह दलील दी गई कि उनकी आलोचना नहीं हो सकती। स्वंत्रतता के साढ़े छह दशक बाद आज सार्वजनिक विमर्श में ऐसे कम ही तथ्य मौजूद हैं, जिनके आधार पर डॉ. अंबेडकर की आलोचना की जाए। बल्कि गुजरते समय के साथ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की विषयवस्तु में न्याय का पहलू जोड़ने और संविधान निर्माण में उनकी ऐतिहासिक भूमिका को ज्यादा बेहतर ढंग से समझा जाने लगा है। डॉ. अंबेडकर निसंदेह सबसे बड़े दलित प्रतीक पुरुष हैं, लेकिन आज उन्हें उन मूल्यों के प्रतीक पुरुष के रूप में हम सभी देखते हैं, जिनका मूर्तमान रूप भारतीय संविधान है। ऐसे में उन पर या उनकी विरासत पर एकाधिकार का दावा करने के अधिकार से किसी समूह को तो वंचित नहीं किया जा सकता, लेकिन उस दावे को सभी लोग स्वीकार करें, यह आवश्यक नहीं है। साथ ही किसी लोकतंत्र एवं विवेकशील समाज में किसी को आलोचना से ऊपर मानना एक समस्या को आमंत्रित करना है। यह विचारणीय है कि क्या यह दावा किसी एक समूह तक सीमित रह सकता है कि उसके आदरणीय व्यक्तित्व को आलोचना से ऊपर माना जाए? क्या इससे दूसरे तमाम समूहों को ऐसा ही दावा करने का हक नहीं मिल जाता और उनके भी ऐसे दावों की वैधता स्थापित नहीं हो जाती? दरअसल, तर्क और विवेक को हम जब कभी अस्वीकार करते हैं, तो यह याद रखना चाहिए कि हम उससे दूसरों को भी ऐसा करने का मौका देते हैं।

दुर्भाग्य से भावावेश के माहौल और अतिवादी विमर्श में ऐसा वे लोग करते नजर आए हैं, जिनका हित लोकंतत्र की सुदृढ़ता और तर्क की परंपरा मजबूत होने से जु़ड़ा है। अगर हाल के अनुभवों से ये समूह सबक नहीं लेते, तो लगातार उन शक्तियों को वैधता देते जाएंगे, जिनका अस्तित्व विवेकहीनता और अंध-आस्था पर आधारित है। ये शक्तियां यही तो चाहती हैं कि समाज बहस और आलोचना की जगह खत्म हो जाए, जिससे वे पुरातन मूल्यों को फिर से आस्था के नाम पर स्थापित कर सकें। अगर खुद को लोकतांत्रिक एवं प्रगतिशील मानने वाले समूह भी वही कसौटी अपनाते हैं, तो क्या यह उनका खुद अपने ही पावों पर कुल्हाड़ी मारना नहीं है?






सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं.  satyendra.ranjan@gmail.com पर इनसे संपर्क किया जा सकता है.