भ्रामक है मुख्यधारा के मीडिया से उम्मींद रखना : नवलखा


दूसरा हेम चंद्र पांडे स्मृति व्याख्यान


-प्रैक्सिस  प्रतिनिधि

माओवादी नेता आजाद के साथ फर्जी मुठभेड़ में मारे गए पत्रकार हेम चंद्र पांडे की दूसरी बरसी पर हेमचंद्र पांडे मैमोरियल कमेटी की ओर से, दूसरे हेमचंद्र पांडे स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में इंडियन डैमोक्रेसी, पीपुल्स राइट एंड स्टेट आॅफ जर्नलिज्म विषय पर जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के पक्ष में मजबूती से खड़े रहने वाले नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और इकोनोमिक एंड पालिटिकल वीकली के सलाहकार संपादक गौतम नवलखा मुख्य वक्ता थे। उन्होंने भारतीय लोकतंत्र में जनाधिकारों की विस्तार से पड़ताल करते हुए मुख्यधारा के मीडिया द्वारा जनाधिकारों के हनन की अनदेखी पर अपने वक्तव्य को केंद्रित किया। उन्होंने कश्मीर, माओवाद प्रभावित आदिवासी इलाकों और उत्तरपूर्व से विभिन्न उदाहरण देकर अनलाॅफुल एक्टिविटी प्रिवेंशन एक्ट और आफ्स्पा सरीखे कानूनों के जरिए राज्य द्वारा किए जा रहे जनाधिकारों के हनन और जनता के दमन की आलोचना की। उन्होंने इन मामलों में मुख्यधारा के मीडिया को राज्य का पक्षधर होने को उसकी संरचनात्मक दिक्कत बताते हुए उससे किसी भी किस्म की उम्मीद करने को भ्रामक बताया। 


नवलखा ने उत्तरपूर्व में बन रहे बांधों के खिलाफ शांतिपूर्ण ढंग से विरोध कर रही जनता को यूएपीए सरीखे कानूनों की जद में लाकर विरोध की आवाज को कुचलने, कश्मीर में ऐसे ही कानूनों की आड़ में बिना जवाबदेही के क्षेत्रीय लोगों की हत्या करके सामूहिक कब्रगाहों में दफना देने और सामान्य वैचारिक साहित्य को प्रतिबंधित साहित्य दर्शाकर, लोगों को माओेवादी आदि बता कर जेलों में ठूस देने को मानवाधिकारों का हनन बताया। उन्होंने इन मामलों में मीडिया द्वारा राज्य और पुलिस की बातों को ही प्रचारित करने की भत्र्सना की। उन्होंने सरोकारों की पत्रकारिता करने वाले लोगों से लघुपत्रिकाओं, न्यू मीडिया आदि वैकल्पिक माध्यमों का भरपूर उपयोग कर लोगों तक सच्ची बातों को पहुंचाने की मुहीम को आंदोलन स्तर पर चलाने की अपील की। 

नवलखा के वक्तव्य के बाद पत्रकारिता के अध्यापक और स्तम्भकार डा. आनंद प्रधान ने बथानी टोला के मामले में उच्चन्यायालय के फैसले में किसी को भी दोषी ना मानने को असंगत और अविवेकपूर्ण बताया। उन्होंने यूपी, बिहार और अन्य जगहों में मुस्लिम युवाओं की बेतुकी धरपकड़ और एनकांउटरों को जनाधिकारों का हनन बताया। उन्होंने मीडिया के जनविरोधी चरित्र की आलोचना करते हुए पत्रकारिता के क्षेत्र में ट्रेड यूनियन आंदोलन के अभाव पर अपनी चिंताएं जाहिर की।

वरिष्ठ पत्रकार और समकालीन तीसरी दुनिया के संपादक आनंद स्वरूप वर्मा ने पत्रकारिता की दुर्दशा पर बात करते हुए कहा कि 90 के दशक के बाद पत्रकारिता में ठेके पर कर्मचारी रखे जाने लगे जिससे कि कोई ट्रेड यूनियनें ना बन सकें और मालिक और संपादकों को मुनाफा कमाने की होड़ में कोई दिक्कत ना हो। उन्होंने भारतीय पत्रकारिता के पतन के दौर को रेखांकित करते हुए कहा कि कारपोरेट पत्रकारिता के उभार ने ऐसे कई पत्रकारों को जो कि जनपक्षधर पत्रकारिता से आते थे अपनी गिरफ्त में लेना शुरू किया और वह उसी दलदल में फंसते चले गए। उन्होंने अफसोस जाहिर किया कि इस प्रवृत्ति को क्रांतिकारी राजनीतिक शक्तियां नहीं रोक सकीं। 

जनपक्ष आजकल के संपादक चारू तिवारी ने हिमालय में विकास के नाम पर बांध आदि बना कर चल रही प्राकृतिक संसाधनों की लूट के खिलाफ जनता के प्रतिरोध का पक्ष रखा। उन्होंने मुख्यधारा के मीडिया से प्रतिरोध की खबरों को गायब कर देने सरीखी जनविरोधी प्रवृत्तियों को चिन्हित किया। 

कार्यक्रम का संचालन भूपेन सिंह ने किया। दिल्ली और बाहर से भी आए कई प्रगतिशील लोग इस आयोजन में शामिल थे।