क्या अब मृत्युदंड पर लगेगी रोक?

-सत्येंद्र रंजन

कार्लोस डेलुना- ये वो नाम है, जो फांसी की सजा के तमाम समर्थकों के आगे एक अकाट्य प्रश्न बन कर खड़ा है। 1983  में डेलुना अभी सिर्फ 20 वर्ष का था, जब उसे वांडा लोपेज नाम की नौजवान महिला की हत्या के आरोप में अमेरिका के टेक्सास राज्य में गिरफ्तार किया गया। अदालत ने उसे दोषी पाया और मृत्युदंड सुना दिया। दिसंबर 1989 को सूई लगाकर उसे मौत की नींद सुला दिया गया। मुकदमे के दौरान डेलुना और उसके वकील बार-बार कोर्ट को बताते रहे कि लोपेज की हत्या उसने नहीं, बल्कि उससे मिलते-जुलते शारीरिक गठन वाले कार्लोस हर्नांदेंज नाम के व्यक्ति ने की है। मगर उनकी दलीलें ठुकरा दी गईं।  

अब कोलंबिया विश्वविद्यालय के कानून विभाग के एक अध्ययन से यह सामने आया है कि डेलुना सच बोल रहा था। विश्वविद्यालय के जर्नल कोलंबिया ह्यूमन राइट्स लॉ रिव्यू में छपी 400 पेज की रिपोर्ट में साक्ष्यों के साथ यह बात कही गई है। इस रिपोर्ट को तैयार करने का काम 2004 में चार शुरू हुआ था। यानी आठ साल की मेहनत से सारी कड़ियां जोड़ी गईं और अध्ययनकर्ता उस निष्कर्ष पर पहुंचे, जिससे मृत्युदंड के प्रावधान पर पहले से ही मौजूद सवाल और संगीन हो गए हैं।


मौत की सजा के खिलाफ यह एक प्रमुख तर्क है कि यह सजा दे दिए जाने के बाद भूल सुधार की संभावना खत्म हो जाती है। अगर आज डेलुना जिंदा होता, तो असली हत्यारे को सजा देकर उसे गलती सुधारी जा सकती थी। माफी मांगने से लेकर मुआवजे तक ऐसे कई उपाय होते, जिससे ऐसा किया जाता। लेकिन अब अगर अमेरिकी न्याय व्यवस्था ऐसा करना भी चाहे, तो वह नहीं सकती। फांसी की सजा के खिलाफ एक दूसरा प्रमुख तर्क यह है कि यह बदले की भावना पर आधारित है, जबकि किसी सभ्य व्यवस्था में सजा का मकसद सुधार या अपराध का निवारण ही होना चाहिए।

यह अच्छी बात है कि दुनिया के ज्यादातर देश अपनी कानूनी व्यवस्था में प्रतिशोध की बर्बरता से ऊपर उठ रहे हैं। मानव अधिकार संगठन एमनेस्टी की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया 198 देशों में से अब सिर्फ 20 में मौत की सजा दी जाती है। यह संख्या 1995 में 41 थी। विकसित देशों में सिर्फ अमेरिका ही ऐसा है, जहां मृत्युदंड का प्रावधान है, लेकिन वहां भी 17राज्यों में यह दंड खत्म कर दिया गया है। जी-8 के सदस्य देशों में रूस में भी अभी कानून की किताब में मृत्यदंड का प्रावधान है, लेकिन व्यवहार में वहां इस पर रोक है। भारत में ऐसी कोई रोक तो नहीं है, लेकिन 2004 के बाद से किसी को फांसी नहीं दी गई है।
एमनेस्टी के मुताबिक 2011 में 20 देशों में बतौर सजा कुल 676 लोगों की जान ली गई। इनमें चीन के आंकड़े शामिल नहीं हैं। चीन एक ऐसा देश है, जहां आज सबसे धड़ल्ले से लोगों को मौत की सजा दी जाती है। कुछ अनुमानों के मुताबिक वहां हर साल यह संख्या हजारों में होती है। यहां तक कि भ्रष्टाचार जैसे आरोप में भी वहां मृत्युदंड दे दिया जाता है और सरकार इसके कोई आंकड़े तक जारी नहीं करती। दुनिया में सजा-ए-मौत देने के लिए फांसी, धड़ से सिर अलग कर देना, जहरीली सूई देना और गोली मारना जैसे तरीके आज भी आजमाए जाते हैं।
लेकिन विश्व जनमत अब “कानून की आड़ में हत्या” के खिलाफ होता जा रहा है। चीन और पश्चिम एशिया के कुछ देशों को छोड़कर कहीं भी यह अब आम सजा नहीं है। भारत में अति असाधारण मामलों यह दंड देने का सिद्धांत उच्चतर न्यायपालिका ने प्रतिपादित किया है। लेकिन कार्लोस डेलुना की दुखद कथा से ऐसे मामलों में भी यह सजा देने पर गहरे सवाल खड़े हो गए हैं।
 


सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं.  satyendra.ranjan@gmail.com पर इनसे संपर्क किया जा सकता है.