प्रवेश परीक्षा के पेंच

-अभिनव श्रीवास्तव


ईआईटी समेत दूसरे केंद्रीय संस्थानों में संयुक्त प्रवेश परीक्षा के मुद्दे पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय और आईआईटी संस्थानों के आमने-सामने आने के बाद इस मामले पर अब बीच का रास्ता निकालने के प्रयास तेज हो रहे हैं और बहुत संभव है कि जल्द ही आम सहमति से कोई फैसला ले लिया जाय। मानव संसाधन मंत्रालय ने अगले हफ्ते नए परीक्षा प्रारूप के विवादित प्रावधानों पर चर्चा करने के लिए संयुक्त नामांकन बोर्ड की बैठक में आईआईटी संस्थानों के निदेशकों को बुलाकर इस दिशा में पहल कर दी है।

    
संयुक्त प्रवेश परीक्षा के प्रारूप पर चल रहे इस विवाद का सबसे सकारात्मक पक्ष यह हो सकता था कि इसके जरिए उन सभी मुद्दों पर एक वस्तुनिष्ठ बहस की जाती जिससे छात्रों के व्यापक हितों को समझा जा सकता और उनकी रक्षा की जा सकती। दुर्भाग्य है कि संयुक्त प्रवेश परीक्षा के नए प्रारूप का पूरा मुद्दा आईआईटी संस्थानों की संस्थागत स्वायत्तता और सरकार एवं आईआईटी संस्थानों के अधिकार क्षेत्र की सीमाओं जैसी बहसों में उलझकर रह गया।  परिणाम यह हुआ कि पूरे विवाद के दौरान इस बात पर सोचने-विचारने की जरुरत महसूस नहीं की गई कि देश के सबसे प्रतिष्ठित प्रौद्योगिकी संस्थानों की प्रवेश प्रक्रिया में बदलाव का प्रस्ताव किन तर्कों के आधार पर रखा गया था।  अगर आईआईटी संस्थान वर्तमान चयन प्रक्रिया के साथ अपना सर्वश्रेष्ठ देश को दे रहे हैं, तो फिर प्रवेश प्रक्रिया में बदलाव की जरुरत क्यों महसूस की जा रही है, वर्तमान में चल रहे विवाद के सन्दर्भ में इस सवाल का ढूंढने की कोशिश की जानी चाहिए थी
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यह गौर करने वाली बात है कि पिछले पांच दशकों में आईआईटी संस्थानों को प्रसिद्धि देश के विकास में किसी चमत्कारी योगदान की वजह से नहीं, बल्कि विदेशों में भारतीय प्रतिभा का एक रहस्यमयी वातावरण तैयार करने से मिली। अपने स्नातक पाठ्यक्रमों में उच्च गुणवत्ता वाले छात्रों के चयन के लिए बनाई गई बेहद कठिन प्रवेश परीक्षा प्रणाली ने स्नातकों की ऐसी फौज तैयार की जिसको अंतर्राष्ट्रीय बाजार में मुंहमांगे दाम मिले। इसका ही परिणाम था कि एक तरफ आईआईटी से पास हुए स्नातक छात्रों की वेतन संरचना में भारी बदलाव हो गए तो दूसरी तरफ वैश्विक मंच पर आईआईटी संस्थानों की एक विशिष्ट छवि भी बनती चली गई। इस बात का पूरा श्रेय आईआईटी संस्थानों की चयन पद्धति को दिया गया और यहीं से आईआईटी संस्थानों में विशिष्टता की भावना का संचार भी हुआ।  यहां ध्यान रखने वाली बात यह रही कि आईआईटी संस्थानों से पास होने वाले छात्रों ने जिस कौशल के दम पर वैश्विक बाजार में अपना लोहा मनवाया, उसमें आईआईटी संस्थानों के शैक्षणिक वातावरण का योगदान कम और छात्रों की अपनी प्रतिभा का योगदान ज्यादा था।  इसका कारण यह था कि आईआईटी संस्थानों में प्रवेश लेने के लिए होने वाली परीक्षा के बेहद कठिन स्वरूप को पास कर आने वाले छात्र स्वयं बहुत प्रतिभाशाली होते थे और उनको तराशने में शिक्षकों को बहुत मेहनत नहीं करनी पड़ती थी। स्वभाविक रूप से विशिष्ट चयन पद्धति के जरिए चयनित हुए उच्च गुणवत्ता वाले छात्रों की सफलता में आईआईटी संस्थानों के शैक्षणिक योगदान को मानने का आधार कमजोर था, लेकिन इसके बावजूद छात्रों की सफलता को संस्थानों की सफलता से जोड़कर देखा जाने लगा। कालांतर में आईआईटी संस्थानों की इस ब्रांड छवि के चलते ही विशिष्ट प्रवेश परीक्षा  प्रणाली की प्रासंगिकता और उपयोगिता पर कोई चर्चा नहीं हुई, जबकि सच यह था कि विश्व मे तेजी से बदल रहे शैक्षिक परिदृश्य के बीच विशिष्ट प्रवेश परीक्षा प्रणाली की अवधारणा विकसित होकर अन्य रूपों में परिवर्तित होने की प्रक्रिया में थी और उसे लचीला बनाए जाने की सख्त जरुरत थी।  दुनिया भर के उच्च शिक्षण संस्थानों ने इस जरुरत को भांपते हुए ही विशिष्ट चयन प्रणाली की प्रक्रियाओं को लचीला बनाने की शुरुआत काफी पहले ही कर दी थी और उसी का परिणाम है कि आज आक्सफोर्ड, हार्वर्ड और प्रिंसटन जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में प्रवेश जीआरई (ग्रेजुएशन रिकॉर्ड एग्जामिनेशन) स्कोर के आधार पर होता है।  

इस बात को कहने का अभिप्राय यह बिलकुल नहीं है कि आईआईटी संस्थानों के लिए विशिष्ट प्रवेश परीक्षा के प्रासंगिकता कभी रही ही नहीं या उसका कभी कोई आधार ही मौजूद नहीं था। जैसा कि पहले भी उल्लेख किया गया है कि इस प्रवेश परीक्षा के आधार पर चयनित हुए प्रतिभाशाली छात्रों ने अपनी उपलब्धियों से अमेरिका और यूरोप के बाजारों में भारत के प्रति बने पूर्वाग्रही नजरिए को खत्म करने में अहम भूमिका निभायी थी। हालांकि नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद भारत के प्रति यह पूर्वाग्रही नजरिया स्वतः समाप्त हो गया क्योंकि विदेशी निवेशकों को भारत के शक्तिशाली बाजार में अपने आर्थिक विस्तार के अपार संभावनाएं दिखने लगीं थीं। इस स्थिति के आने के बाद अकादमिक संस्थाओं के रूप में आईआईटी संस्थानों की भूमिका का पुर्नमूल्यांकन करने की और यह देखने की जरुरत थी कि वास्तव में कैसे इन संस्थानों को बहुविषयक और शोधपरक संस्थानों में बदला जा सकता है। यह पुर्नमूल्यांकन इसलिए भी जरूरी था क्योंकि उच्च गुणवत्ता वाले स्नातकों की फौज तैयार करने के बावजूद शोधपरक शिक्षा देने के मामले में वे विश्व के चोटी के संस्थानों से काफी पीछे थे और लगातार पिछड़ते जा रहे थे।    

भारत में इस दिशा में देर से ही सही, लेकिन सुधार की शुरुआत हुई और आईआईटी संस्थानों के लिए विशिष्ट प्रवेश परीक्षा प्रणाली समाप्त कर संयुक्त प्रवेश परीक्षा प्रणाली का नया प्रारूप इस दिशा में उठाया गया एक कदम है। यहां इस बात का जायजा लेना भी जरूरी  हो जाता है कि संयुक्त प्रवेश परीक्षा का नया प्रारूप किस प्रकार बदले हुए शैक्षिक परिदृश्य में आईआईटी संस्थानों की भूमिका के साथ न्याय कर पाएगा और नए प्रारूप से जुड़े प्रावधानों के विरोध किस हद तक जायज हैं। नए प्रारूप के जरिए व्यापक रूप से एक ऐसी प्रवेश प्रक्रिया विकसित करने की तैयारी की जा रही है जिसके जरिए सही अर्थों में तकनीक और प्रौद्योगिकी में रुझान रखने वाले छात्रों का चयन किया जा सके।  वर्तमान चयन प्रक्रिया के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इसके जरिए यह सुनिश्चित कर पाना बहुत मुश्किल होता है कि जो छात्र प्रवेश परीक्षा में गणित, भौतिकी और रसायन के प्रश्नों को हल करता हुआ आ रहा है, उसमें वास्तव में प्रौद्योगिकी और शोध कार्यों के प्रति कितनी रूचि है। इसका उल्टा भी सच है। एक ऐसे छात्र में भी प्रौद्योगिकी कार्यों के प्रति रुचि हो सकती है जिसने प्रवेश परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया हो।  वर्तमान चयन प्रक्रिया ऐसे छात्रों को आईआईटी संस्थानों में प्रवेश से वंचित करती है जिनमें असल में प्रौद्योगिकी कार्यों और शोध कार्यों के प्रति रूचि और क्षमता होती है। वास्तव में संयुक्त प्रवेश परीक्षा के नए प्रारूप में 12 वीं के अंकों को शामिल किए जाने का प्रावधान छात्रों के ऐसे वर्ग के लिए अवसरों का विस्तार करता है जिनमें प्रौद्योगिकी कार्यों के प्रति रूचि तो होती है लेकिन जो अलग-अलग वजहों से प्रवेश परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते।  इसका कारण यह है कि 12 वीं के अंकों को शामिल किए जाने के बाद उनको आईआईटी संस्थानों में प्रवेश के लिए पूरी तरह प्रवेश परीक्षा के अंकों पर निर्भर नहीं रहना होगा। यह एक तथ्य है कि बदली हुई परिस्थितियों में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में वे छात्र देश के तकनीकी विकास में सहयोग कर पा रहे हैं, जो स्नातक के बाद शोध कार्यों में शामिल हैं या उच्च शिक्षा हासिल कर रहे हैं।  जरुरत इस बात की है छात्रों के ऐसे वर्ग को लगातार उत्साहित किया जाए जिनमें अकादमिक और शोध कार्यों के प्रति रूचि है और प्रवेश परीक्षा के स्वरूप को भी उसी के अनुकूल बनाने के प्रयास तेज किए जाएं।

आईआईटी संस्थानों के शिक्षक संघ समेत देश के कई अकादमिक हिस्सों से नए प्रारूप का जैसा विरोध सामने आया, वह आईआईटी संस्थानों की शोध कार्यों संबंधी गुणवत्ता को बढ़ाने की जरूरतों की पूरी तरह अनदेखी करता है। आईआईटी संस्थानों का शिक्षक संघ यह भी नहीं देख पा रहा कि विश्व की श्रेष्ठ उच्च शिक्षण संस्थाओं के बराबर खड़े होने के लिए विशिष्ट प्रवेश परीक्षा पद्धति का त्याग करना देश के बेहतर भविष्य की जरुरत है।  आईआईटी संस्थानों और वहां के शिक्षक संकाय का विरोध जिस डर से उपजता है उसकी वजह से उन्हें लगता है कि संयुक्त प्रवेश परीक्षा के नए प्रारूप के लागू होने के साथ ही आईआईटी संस्थान अपनी उस विशिष्टता और अपनी ब्रांड छवि को खो देंगे जो उन्होंने विशिष्ट चयन पद्धति के जरिए हासिल की थी। यही वजह है कि आईआईटी संस्थानों की ब्रांड छवि को बचाए रखने के लिए उन्हें उच्च गुणवत्ता के छात्र देने वाली चयन प्रणाली का चलते रहना ज्यादा सुविधाजनक और सहज लगता है। 
  
यह देखने वाली बात होगी कि संयुक्त प्रवेश परीक्षा का प्रारूप अपने मूल प्रावधानों के साथ लागू हो पाता है या नहीं। इस शंका का आधार इसलिए मजबूत होता है क्योंकि ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि आईआईटी संस्थानों के शिक्षक संघ और निदेशकों से पड़ने वाले दबाव के चलते मानव विकास संसाधन मंत्रालय परीक्षा के मूल प्रारूप में कुछ बदलाव कर सकता है।  कहा जा रहा है कि प्रस्तावित प्रारूप में बोर्ड परीक्षा के अंकों को प्राथमिकता देने के स्थान पर परसेंटाइल की प्रक्रिया को अपनाया जा सकता है। अगर यह हुआ इन बदलावों के साथ संयुक्त प्रवेश परीक्षा के नए प्रारूप को अपनाने का कोई औचित्य नहीं बचा रह जाएगा।  सरकार अगर संयुक्त परीक्षा प्रणाली के नए प्रारूप को लागू करने के प्रति वाकई गंभीर है तो उसे प्रारूप को उसके मूल रूप में लागू करना सुनिश्चित करना चाहिए।     


अभिनव पत्रकार हैं. पत्रकारिता की शिक्षा आईआईएमसी से. राजस्थान पत्रिका (जयपुर) में कुछ समय काम. अभी स्वतंत्र लेखन. इन्टरनेट में इनका पता  abhinavas30@gmail.com है.