विज्ञापन बनता लोकतंत्र

-भूपेन सिंह
कॉरपोरेट मीडिया संगठन, पाठकों/दर्शकों को धंधे की वस्तु समझकर आकर्षित करते हैं और आखिरकार उऩ्हें विज्ञापनदाताओं को बेच देते हैं डैलस स्माइथ
Fighting advertising helps to keep up democracy and investigative journalism
मिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने एक साल का कार्यकाल पूरा  होने पर आत्म प्रशंसा में जी भर कर सरकारी खजाना लुटा डाला. 16 मई को तमिलनाडु के अख़बारों के अलावा राजधानी दिल्ली के अंग्रेजी अख़बार भी उनके विज्ञापनों से अटे पड़े थे. उस दिन दिल्ली के सभी प्रमुख अंग्रेजी अख़बार जयललिता के चार पृष्ठ वाले विज्ञापन जैकेट से ढके थे. इनकी क़ीमत क़रीब पच्चीस करोड़ बैठती है. इऩ विज्ञापनों के माध्यम से जयललिता ने राष्ट्रीय प्रचार पाने की कोशिश तो की ही, साथ ही उऩ्होंने मीडिया पर विज्ञापन का चारा फेंककर उसे अपने पक्ष मे  करने की कवायद भी की. जयललिता की जैकेट पहनने वालों में टाइम्स ऑफ़ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, द हिंदू, इकोनोमिक टाइम्स, हिंदुस्तान टाइम्स जैसे अख़बार प्रमुख थे.

विज्ञापनों में जयलतिता को हिंदुस्तान की महानतम नेता के तौर पर प्रचारित करने की कोशिश की गई. अख़बारों में ऊपर से नीचे तक, पूरे पृष्ठ लंबी, जयललिता की एक तस्वीर थी. सामने लिखा था- वन ईयर ऑफ़ एचीवमेंट, हंड्रेड ईयर्स लीप फॉरवर्ड (एक साल में ही सौ साल जितनी तरक्की) इसी विज्ञापन में उन्हें पुरातची थलाईवी (क्रांतिकारी नेता) घोषित किया गया था. इस विज्ञापन जैकेट को देखना पाठक की मजबूरी थी. जब तक वो उसे उतारे नहीं, अख़बार नहीं पढ़ सकता. जिस तरह से हाल के दौर में विज्ञापन जैकेट छापने का चलन बढ़ा है, यह भारतीय पत्रकारिता के निम्नतम स्तर की ओर जाने का संकेत है. अख़बारों की बढ़ती मुनाफ़ाखोरी की वजह से उनमें ख़बरें कम और विज्ञापन ज़्यादा होते जा रहे हैं. हालत यह हो गई है कि टाइस्म ऑफ़ इंडिया जैसे कई अख़बार अब अक्सर साठ से अस्सी फ़ीसदी तक विज्ञापन और सिर्फ़ बीस से चालीस फ़ीसदी तक ख़बर छापते हैं. विज्ञापनों को लेकर कोई प्रभावी नीति न होने के कारण अख़बार हमेशा पत्रकारिता के उसूलों को ठेंगा दिखाते रहते हैं तो नेता और व्यावसायिक घराने भी विज्ञापनों का चारा फ़ेंक कर अख़बारों को अपने पक्ष में करने की कोशिश करते हैं.

जयलतिता ने भी अपने पद का दुरुपयोग कर सरकारी खजाने को यूं ही लुटाते हुए अख़बारों को अपना  कृतज्ञ बना दिया है. अब करोड़ों रुपए हजम करने के बाद ये अख़बार किस मुंह से जयललिता की  आलोचना करने का साहस कर पाएंगे? आलोचना करने पर आगे से विज्ञापन न मिलने का डर क्या मीडिया के प्रबंध संपादकों की नींद नहीं उड़ाए रहेगा? ऐसा नहीं कि इस तरह मीडिया को कृतार्थ करने वाली जयललिता अकेली नेता हैं. इससे पहले उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने राज्य और राजधानी दिल्ली के अख़बारों को विज्ञापन देकर उन्हें इतना वफ़ादार बना दिया कि उन पर लगे अनगिनत भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद भी उनके ख़िलाफ़ कुछ छपा नहीं. निशंक को उत्तराखंड की राजनीति में अब मीडिया मैनेजमेंट में माहिर खिलाड़ी के तौर पर भी जाना जाता है. ठीक इसी तरह का काम बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी कर रहे हैं. राज्य की जनता में उनके ख़िलाफ़ कितना भी असंतोष क्यों न हो, मुनाफ़े के लिए निकलने वाले अख़बार उनके ख़िलाफ़ कुछ नहीं छापते. विज्ञापन न मिलने के डर की वजह से बिहार में समाचार मीडिया की आज़ादी का असली चेहरा देखा जा सकता है. ऐसे  हालात में स्वाभाविक तौर पर सत्ता के ख़िलाफ़ संगठन और जन आंदोलन बिके हुए मीडिया के निशाने पर होते हैं.  

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी यूं तो अपने बड़बोलेपन और अराजकता की वजह से अक्सर चर्चा में बनी ही रहती हैं लेकिन ऊल-जुलूल हरकतों की वजह से मुख्यधारा का मीडिया कुछ हद तक उनकी आलोचना भी करता रहा है. ममता भी अब रूठे मीडिया को मनाने का काम शुरू कर चुकी हैं. 20 मई को जब उनकी सत्ता का एक साल पूरा हुआ तो उन्होंने भी विज्ञापनों पर काफ़ी पैसा ख़र्च किया. यह बात और है कि वे जयलतिता का रिकॉर्ड नहीं तोड पाईं. लेकिन विज्ञापन पर सरकारी खजाना लुटाने की वजह से उनकी भी आलोचना हुई. ममता ने उस दिन कई अख़बारों को दो पृष्ठ का विज्ञापन दिया. जिसमें उनकी तारीफ़ का शीर्षक था- वन ईयर टुवर्ड्स रे ऑफ़ होप (उम्मीद की किरण की तरफ़ एक साल). ममता भूल गई कि उन्होंने एक साल में लोकतंत्र का कैसा मजाक बनाया है. वे मुख्यधारा के मीडिया को भले ही कितना ही कृतज्ञ करने की कोशिश क्यों न करें, उनके तुगलकी फ़ैसलों के ख़िलाफ़ इंटरनेट की दुनिया में प्रतिरोध जारी है. सीएनएन-आईबीएन के एक शो में वे असुविधाजनक सवाल पूछने वाली छात्रा को माओवादी बोलकर चलती बनी, पूरे इंटरनेट पर इस मामले में उनकी सनक की आलोचना होती रही. न जाने किन शर्तों के तहत उन्होंने दो ही घंटे बाद सोगोरिका घोष को फिर से इंटरव्यू देखकर अपनी सफ़ाई दी. इसी बीच 21 मई को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की बरसी आयी तो कांग्रेस सरकार ने भी उनकी महानता में सरकारी खजाना पूरी तरह खोल दिया. ये सारी घटनाएं बताती हैं कि राजनीतिक किरदारों और धंधेबाज़ मीडिया के बीच किस तरह लेन-देन का गणित चलता रहता है. मालिक बन चुके कई पत्रकार सत्ता से हर हाल में दोस्ती बनाए रखना चाहते हैं. मकसद सिर्फ़ फ़ायदा होता है, चाहे वो पैसे के तौर पर हो या पद्म श्री-पद्म भूषण या राज्यसभा की सीट के रूप में. उनकी पक्षधरता अक्सर उनके व्यक्तित्व और कर्मो से झलकती रहती है.

हिंदू एक ऐसा कॉरपोरेट अख़बार है जो प्रगतिशील और लोकतांत्रिक ब्रैंड बनने में कामयाब रहा है. इसके साथ जाने-माने पत्रकार पी साईनाथ जैसे लोग भी जुड़े हैं. जो विदर्भ के किसानों की आत्महत्या  के अलावा और भी कई ऐतिहासिक महत्व की ख़बरें देश के सामने लाए हैं. साइनाथ कहते  हैं कि कॉरपोरेट मीडिया के सामने हमेशा मुनाफे के लिए झूठ बोलने की संरचनागत बाध्यता होती है. हाल ही में उन्होंने टाइम्स ऑफ़ इंडिया (टीओआइ) का ऐसा ही एक झूठ पकड़ा  है. 2008 के आसपास देश में जैव संवर्द्धित (जैनेटिकली मोडीफ़ाइड) बीजों के खिलाफ़ जनता में आक्रोश था लेकिन बहुराष्ट्रीय कंपनी मोहिया मॉन्सेंटो इन बीजों के पक्ष में लॉबिंग कर रही थी. टीओआइ ने विदर्भ के एक  गांव का उदाहरण देकर पूरे एक पृष्ठ की  ख़बर छापी कि कपास की खेती करने वाले किसानों की ज़िंदगी जैव संवर्द्धित बीटी कॉटन अपनाने के बाद बेहद खुशहाल हो गई है. यह ख़बर पूरी तरह मनगढ़ंत थी लेकिन टीओआइ ने 31 अक्टूबर 2008 को इस ख़बर को काफ़ी प्रमुखता दी. ताज्जुब की बात यह है कि क़रीब तीन साल बाद वही ख़बर 28 अगस्त 2011 को टीओआइ में फिर से एक विज्ञापन के रूप में छापी जाती है. मतलब साफ़ है कि पहली ख़बर भी पूरी तरह पेड न्यूज़ थी लेकिन मॉन्सेंटो का कहना है कि उसने उस  ख़बर को कवर करने के लिए सिर्फ़ पत्रकारों के आने-जाने की व्यवस्था की थी (जैसे, कॉरपोरेट की तरफ़ से पत्रकारों के आने-जाने-घुमाने-खिलाने-पिलाने की व्यवस्था करना पत्रकारीय नैतिकता में शामिल हो) और बाद में उसी ख़बर को विज्ञापन के तौर पर छाप लिया. इस घटनाक्रम  से समझ में आता है कि किस तरह बहुराष्ट्रीय कंपनियां और  कॉरपोरेट मीडिया मिलकर देश की जनता को बेवकूफ़ बना रहे हैं. द हिंदू की टीओआइ से व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता है शायद इसीलिए यह ख़बर बाहर आ पाई वरना ऐसे अनगिनत किस्से हैं जहां कॉरपोरेट और उनका मीडिया एक-दूसरे  को बचाने में जुटे रहते हैं या कम से कम  चुप्पी साधे रहते हैं. कभी-कभी जब इनके बीच के अंतर्विरोध गहराते हैं तभी  कुछ सच्चाइयां बाहर आ पाती हैं. राडिया कांड में भी ओपन और आउटलुक पत्रिका की पर्दाफाश वाली भूमिका को इसी तरह समझा जा सकता है. इस घटनाक्रम के ज़िक़्र करने का मक़सद सिर्फ़ इतना है कि आज का भारतीय मीडिया पूरी तरह से मुनाफ़े के हवाले है. टाइम्स ऑफ़ इंडिया की तरह वो कुछ भी छाप सकता है. एक-दो पत्रकारों की व्यक्तिगत ईमानदारी से इसे ठीक करना मुश्किल है.

हैरानी की कोई बात नहीं कि टीओआइ की पोल खोलने वाला द हिंदू भी जयललिता के विज्ञापन की जैकेट बड़ी शान से पहन लेता है. द हिंदू पर भी पेड न्यूज़ छापने के आरोप पहले लग चुके हैं. इस संदर्भ में मज़ेदार बात यह भी है कि 1 जनवरी 2012 को द हिंदू ने यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी का जैकेट पहना था. जिसमें कांग्रेसियों की तरफ़ से लिखा गया था- वी रिमेन मैडमजी एवर एट यूअर फीट (मैडम जी हम हमेशा आपके चरणों में रहते हैं). वामपंथी रुझान के माने जाने वाले और तब नए-नए द हिंदू के संपादक बने सिद्धार्थ वर्धराजन की जब इस मामले में में चौतरफ़ा आलोचना हुई तो उन्होंने अपने फेसबुक स्टेट्स में लिखा- जिन लोगों ने एक जनवरी को हिंदू में छपे सोनिया के जैकेट की आलोचना की है मैं उनसे कहना चाहता हूं इस तरह के व्यावसायिक समझौते हमारे अख़बार की छवि को बिगाड़ते हैं. हम लोग जल्द ही तय करेंगे कि आगे से पहले पृष्ठ का इस्तेमाल विज्ञापन के लिए न किया जा सके. जयललिता का विज्ञापन फिर से हिंदू में जैकेट की शक्ल पर आने से साफ़ हो जाता है कि या तो सिद्धार्थ कठपुतली संपादक हैं या फिर वे सिर्फ़ चुनावी नेताओं की तरह खोखले वादे करते हुए द हिंदू और ख़ुद को वामपंथी ब्रांड की तरह बचाने की कोशिश कर रहे थे.  

मॉन्सेंटो के बीटी कॉटन और टीओआइ वाले किस्से से साफ़ है कि धंधेबाज़ मीडिया को विज्ञापन देकर कृतार्थ करने का काम सिर्फ़ नेता ही नही कर रहे हैं बल्कि राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी उसे धन्य कर रही है. बदले में मीडिया और उसके कर्ता-धर्ता उनके सामने रेंगने लगते हैं. इनमें जोश तभी आता है जब गला फ़ाडकर झूठ बोलने की ज़रूरत पड़ती है. जब भी जनता के दबाव में मीडिया को क़ानून के दायरे में लाने की बात की जाती  है तो वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर शोर करने लगता है. हाल ही में भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने जब टेलीविजन चैनलों में एक घंटे के कार्यक्रम के दौरान सिर्फ़ बारह मिनट के विज्ञापन दिखाने की बात कही तो कॉरपोरेट मीडिया ने अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर ज़मीन-आसमान एक कर दिया. मजबूरन सूचना और प्रसारण मंत्री को कहना पड़ा कि वे मीडिया और विज्ञापनदाताओं के हितों का पूरा ध्यान रखेंगी. ठीक इसी तरह की नूरा कुश्ती मीडिया के नियमन के नाम पर सरकार और कॉरपोरेट मीडिया के बीच लंबे अरसे से चलती आ रही है. दोनों ही कॉरपोरेट के इशारे पर लड़ने का नाटक करते हैं लेकिन हैं दोनों एक दूसरे के स्वाभाविक सहयोगी, तभी उनका अस्तित्व बचा हुआ है. नव उदारवाद की इस जटिल स्थिति को न समझना चाहने वाले विद्वान कई बार आस लगाए बैठते है कि एक दिन हमारे नेता कॉरपोरेट दबाव से मुक्त होकर ईमानदार हो जाएंगे और एक पवित्र मीडिया परिदृश्य की स्थापना करेंगे. लेकिन जब तक नव उदारवाद की आत्मा पर चोट करने वाले जन आंदोलन खड़े नहीं होंगे तब तक इस चौतरफ़ा पाखंड का पर्दाफ़ाश मुश्किल है. वरना कोई और आमिर (जादा) ख़ान कॉरपोरेट की मदद से क्रांतिकारी बनकर टेलीविजन स्क्रीन पर चमकने लगेगा और देश को सत्यमेव जयते का पाठ पढ़ाएगा. हम उस व्यापारी की नीयत और भूमिका पर बात करके थकते रहेंगे.

पूरा भारतीय समाचार मीडिया फिलहाल विज्ञापनों पर चल रहा है. अख़बार, रेडियो, टेलीविजन और इंटरनेट जैसे माध्यमों में इऩकी मौज़ूदगी बढ़ती जा रही है. कॉरपोरेट मीडिया के प्रवक्ताओं ने ऐसा माहौल बना रखा है कि विज्ञापनीं झूठ के ख़िलाफ़ बात करने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बता दिया जाता है और ऐसी बात कही जाती है जैसे विज्ञापनों के बिना समाचार मीडिया का अस्तित्व ही संभव नहीं. इस झूठ के सहारे यहां विकल्पों की किसी भी संभावना को पूरी तरह ठुकरा दिया जाता है. विकल्पों के ऐसे निषेध से ही कॉरपोरेट मीडिया अपनी मनमानी को सही साबित करने की कोशिश करता है. असल बात यह है कि इस मीडिया ने दर्शकों को नागरिक के बजाय सिर्फ़ उपभोक्ता में तब्दील कर उनमें कम क़ीमत में ज़्यादा सूचनाओं तक पहुंचने का नशा पैदा कर दिया है. अस्सी पृष्ठ का अख़बार ढाई-तीन रुपए में या सौ रुपए में दो सौ चैनल पाकर वो ख़ुद को धन्य समझता है लेकिन यह हालत ठीक उसी तरह से है जैसे कोई किसी को हर रोज़ देह और चेतना को नष्ट करने वाले तरह-तरह के नशे मुफ़्त में करवाए. सिर्फ़ मुनाफ़ा कमाने के मकसद से निकल रहे अख़बार, टीवी, रेडियो और इंटरनेट का धंधा इस तरह की नशाखोरी को बढ़ाने के कारण ही फल-फूल रहा है.

सीएनएन-आईबीएन चैनल कॉरपोरेट बेईमानी के लिए पहले से ही कुख्यात है. आजकल उसमें पर्यावरण के मनमाने दोहन के लिए ज़िम्मेदार जेपी ग्रुप की स्पॉन्सरशिप में इंडिया पॉजिटिव नाम से ख़बरों की एक सिरीज चल रही है. जिसमें तथाकथित सकारात्मक घटनाओं की तरफ़ दर्शकों का ध्यान आकर्षित कर यह भ्रम पैदा करने की कोशिश की जाती है जैसे इंडिया शाइन कर रहा  हो. लब्बोलुआब सिर्फ़ इतना है कि यह कार्यक्रम कॉरपोरेट लूट के ख़िलाफ़ चलने वाले आंदोलनों को नकारात्मक ठहराता है और इस व्यवस्था को बचाये रखने के लिए सामने आई घटनाओं को सकारात्मक कहानियों (पॉजिटिव स्टोरीज) की तरह पेश करता है. इस प्रायोजित कार्यक्रम के अलावा भी जेपी ग्रुप लगातार बड़े पैमाने पर मीडिया को विज्ञापन बांटता है. इंडियन एक्सप्रेस जैसे अख़बार पर प्रशांत भूषण जैसे वकील पर्यावरण के दोहन की अनदेखी करते हुए जेपी के पक्ष में ख़बर छापने का आरोप खुलेआम लगा चुके हैं. जहां-जहां भी जेपी के प्रोजेक्ट चल रहे हैं उन क्षेत्रों की जनता जानती है कि इस कंपनी ने इनकी जिंदगी को किस तरह से उजाड़ कर रख दिया है. लेकिन बड़े बांध को रचनात्मकता और तरक्की का प्रतीक बताकर, दो बच्चों की मासूमियत की आड़ में, कॉरपोरेट लूट का माहौल बनाता जेपी का विज्ञापन टेलीविजन स्क्रीन पर लोगों का ध्यान खींचता रहता है. ऐसे में जेपी के पैसों पर पलने वाले मीडिया से बड़े बांध विरोधी आंदोलनों की ख़बरें बिना लाग-लपेट प्रस्तुत करने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?

प्राकृतिक संसाधनों की लूट के लिए कुख्यात बहुराष्ट्रीय खनन कंपनी वेदांता ने भी अपनी छवि सुधारने का अभियान शुरू किया है. उडीसा के नियमगिरी समेत देश के कई इलाक़ों में उसके ख़िलाफ़ जबरदस्त जन आक्रोश है. जब वेदांता के जनविरोधी कामों की पोल खुलना शुरू हुई और सरकार और मीडिया के एक हिस्से ने भी उसे कटघरे में खड़ा करना शुरू कर दिया तो अचानक वेदांता ने पूरे मीडिया को अपने विज्ञापनों से पाट दिया. इसका फ़ायदा उसे मिला, मुख्यधारा के मीडिया पर विज्ञापनों का असर दिखने लगा. इतना ही नहीं तरक्कीपसंद लोगों की तरफ़ से बराबर हो रही आलोचना का जवाब देने के लिए वेदांता ने शैक्षणिक संस्थानों में जाकर युवाओं के बीच अपने विकास के कामों की जानकारी देनी शुरू कर दी और नए दीमागों को लुभाने के लिए क्रिएटिंग हैप्पीनेस नाम से एक फिल्म प्रतियोगिता भी करवाई. फिल्म बनाने का सारा पैसा वेदांता ने दिया. बाज़ार के चंगुल में समाती जा रही नई पीढ़ी के लिए यह मुफ़्त में मिला शानदार अवसर था. कुछ जगहों पर वेदांता के जन संपर्क अधिकारियों को छात्रों के बीच से खरी-खोटी भी सुननी पड़ी लेकिन वे रणनीतिक तौर पर सबकुछ चुपचाप सुनते रहे. ऐसा ही उदाहरण इन पंक्तियों के लेखक ने भारतीय जन संचार संस्थान के छात्रों और वेदांता के अधिकारियों के बीच देखा. यह बात और है कि वहीं से कुछ छात्र वेदांता की फिल्म प्रतियोगिता में भी शामिल हुए. पैसे वालों की सेवा में जुटे रहने वाले फिल्मकार श्याम बेनेगल भी छात्रों की फिल्मों को छांटने वाली जूरी में थे. इस तरह आदिवादियों की जमीन से उन्हें बेदखल करने वाला वेदांता विज्ञापन के माध्यम से ख़ुद को आदिवासियों का सबसे बड़ा हितैषी बनाने की कोशिश मे जुटा है.

नव-उदारवादी भारत में कॉरपोरेट ने हर तरह की सार्वजनिक संस्थाओं को खोखला करने का काम किया है. उनके इस हमले से तथाकथित अनुशासन और ईमानदारी के लिए पहचानी जाने वाली भारतीय सेना भी नहीं बची है. बहुराष्ट्रीय कंपनी टाट्रा ने जिस तरह अधिकारियों को घूस देकर सेना में अरबों रुपए के ट्रक खपाए, इसका अब पर्दाफ़ाश हो चुका है. जैसे ही यह ख़बर सामने आई टाट्रा ने बदनामी से निकलने के लिए अचानक मीडिया में अंधाधुंध विज्ञापन देने शुरू कर दिए. ऐसे में, विज्ञापनों का ख़बरों पर कोई असर नहीं पड़ता, कहने वाले लोग या तो बिल्कुल ही बेवकूफ़ हो सकते हैं या फिर बहुत ही धूर्त.

तथाकथित चौथे खंभे की ख़बरें, जयललिता, ममता बनर्जी, नीतिश कुमार, राहुल गांधी, सचिन तेंदुलकर और अमिताभ बच्चन जैसे विज्ञापनी नायकों के आसपास घूमती रहती हैं. जेपी और वेदांता जैसे कॉरपोरेट भारत की फ़र्जी सकारात्मक कहानियों को दिखाकर नकली खुशी पैदा कर रहे हैं और कॉरपोरेट राज की वकालत करने वाले आज इस देश को चला रहे हैं.

इस तरह हमारा लोकतंत्र कॉरपोरेट का एक विज्ञापन बनकर रह गया है.


 भूपेन मीडियाकर्मी और विश्लेषक हैं। तमाम न्यूज चैनलों में काम। अभी आईआईएमसी में अध्यापन कर रहे हैं। इनसे bhupens@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।