नीतिगत निरंकुशता की जड़ें

-सत्येंद्र रंजन

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब अपनी सरकार की उपलब्धियों के रूप में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून या प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून की गिनती करते हैं (जैसाकि उन्होंने चार जून को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में किया), तो यह एक अजीब किस्म का विरोधाभास लगता है। ऐसा इसलिए नहीं कि मनरेगा, सूचना का अधिकार कानून, आदिवासी एवं अन्य वनवासी भूमि अधिकार कानून, मुफ्त एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा का कानून, आदि उनकी सरकार की उपलब्धियां नहीं हैं। दूरगामी प्रभाव वाले ये सारे विधायी कदम सचमुच उनकी सरकार ने ही उठाए हैं। लेकिन इस धारणा का भी आधार है कि प्रधानमंत्री और उनके निकट सहयोगी इन कानूनों को लेकर बहुत उत्साहित नहीं रहे हैं। बल्कि इनमें जो कानून बन गए, उनके पर कुतरने की कोशिश में भी यूपीए सरकार कभी बाज नहीं आई। प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून अगर अगर अभी भी लटका हुआ है, तो उसके लिए कौन दोषी है- यह आम जानकारी है। 

बहरहाल, अगर यह धारणा निराधार भी हो, तब भी यह तो पूरे ठोस आधार के साथ कहा जा सकता है कि मनमोहन सिंह के जिस नव-उदारवादी और राजकोषीय रूढ़िवाद (फिस्कल कंजरवेटिज्म) की विचारधारा के भारत में सबसे बड़े प्रतीक हैं, उसके नजरिए से ये सारे कदम (संभवतः सूचना के अधिकार कानून को छोड़कर) ‘सब्सिडी’ पर आधारित हैं, जो अर्थव्यवस्था में असंतुलन पैदा करते हैं। इस विचारधारा के नजरिए से मनमोहन सिंह सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि भारतीय अर्थव्यवस्था को ऊंची विकास दर के राजपथ पर ले जाना था। लेकिन यह “विकास-कथा” अब अगर खतरे में नहीं, तो कम से कम भारी दबाव में जरूर है। 

यह निश्चित रूप से हमारी आज की सार्वजनिक स्थिति पर एक प्रतिकूल टिप्पणी है कि राजनीतिक विचारधारा एवं आर्थिक दिशा के इस व्यापक परिप्रेक्ष्य में मनमोहन सिंह/यूपीए सरकार को प्रश्नों के कठघरे में खड़ा करने की कोई कोशिश नहीं होती। इसके विपरीत उसे भ्रष्टाचार के निराकार सवालों से उसे घेरने की कोशिश पिछले एक-सवा साल से जोरों पर है। चूंकि डॉ. सिंह की व्यक्तिगत ईमानदारी की छवि अतीत में यूपीए सरकार का एक ढाल रही है, इसलिए अब उनके विरोधियों ने सीधे इस छवि पर हमला बोल दिया है। लेकिन विचारधारा-विहीन माहौल में ईमानदारी को जिस संकुचित रूप में परिभाषित किया जाता है, उसमें डॉ. सिंह की छवि इन हमलों से बहुत प्रभावित होगी, ऐसा नहीं लगता। इसलिए कि उन संकुचित अर्थों में डॉ. सिंह ने बेईमानी की होगी- यानी उन्होंने अपने या अपने लोगों के लिए पैसा बनाया होगा- यह डॉ. सिंह के लंबे करियर के बारे में जानने वाले किसी विवेकशील व्यक्ति के गले उतरना कठिन है। जिसे कोयला घोटाले का नाम दिया गया है, वह असल में घोटाला में है, यह भी साबित नहीं किया जा सकता। महालेखा नियंत्रक एवं परीक्षक (सीएजी) की अंतरिम रिपोर्ट में सरकारी खजाने को नुकसान का जो जायजा लगाया गया, वह इस पूर्व-अनुमान पर आधारित था कि अगर कोयला खदानों की नीलामी होती, तो कितना पैसा राजकोष में आता। लेकिन भारत में कोयला खदानों की कभी नीलामी नहीं हुई। 1973 में कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण के बाद से इन्हें लौह एवं इस्पात, बिजली और सीमेंट कंपनियों को आवंटित करने की नीति व्यवहार में रही है। यह नीति सही है या गलत- इस पर बहस हो सकती है, लेकिन अगर उस नीति को मनमोहन सिंह सरकार ने जारी रखा, और जब कोयला मंत्रालय मनमोहन सिंह के पास था, तब खदानों का आवंटन हुआ, तो उसके पीछे बेईमानी सिर्फ वे लोग ही देख सकते हैं, जिनका मकसद भ्रष्टाचार का ऐसा धुंधलका पैदा करना है, जिसमें तर्क एवं विवेक की बातें कहीं खो जाएं।  

बहरहाल, अगर ईमानदारी को सिर्फ गलत ढंग से पैसा बनाने के संकुचित अर्थ में ना समझा जाए, तो मनमोहन सिंह की साख पर कई कठिन प्रश्न खड़े किए जा सकते हैं। और उनका संबंध सिर्फ उन तरीकों से नहीं है, जिनके जरिए डॉ. सिंह ने 2008 में वाम मोर्चे के समर्थन वापस लेने के बाद अपनी सरकार बचाई थी। दरअसल, इनका कहीं अधिक संबंध लोकतांत्रिक जवाबदेही से है, जिसकी यूपीए सरकार लगातार- खासकर अपने दूसरे कार्यकाल में- अनदेखी करती रही है। इसकी एक मिसाल संसद से बचने की कोशिशों में देखने को मिला है। इसकी दूसरी मिसाल डॉ. सिंह की वो कार्यशाली है, जिसमें उन दलों की राय या विचारों की भी कोई कीमत नहीं समझी जाती, जिनके समर्थन के बिना कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार एक दिन भी सत्ता में नहीं रह सकती। अभी कुछ महीने पहले तक डॉ. सिंह की कार्यशैली कुछ ऐसी थी कि सहयोगी दलों को सत्ता के सुख भोगने दो और नीतियों के मामले में अपनी मर्जी चलाते जाओ। ममता बनर्जी की आक्रामकता ने फिलहाल इस अंदाज पर कुछ रोक लगाई है, लेकिन अगर अभी वैसे कदम नहीं उठाए जा रहे हैं तो यह लोकतांत्रिक परंपरा में किसी आस्था के कारण नहीं है।

यह विचारणीय है कि निरंकुशता की यह इच्छा कहां से पैदा होती है? मनमोहन सिंह को जानने वाले लोग बताते हैं कि निजी रूप से प्रधानमंत्री एक सज्जन एवं शिष्ट व्यक्ति हैं। इसीलिए जब उन्होंने अमेरिका से असैनिक परमाणु सहयोग के समझौते के मुद्दे पर अडिग रुख अपनाया, तो उससे बहुत से लोगों को आश्चर्य हुआ। उनके उस रुख ने एक खास सामाजिक दायरे में उनका रुतबा बढ़ाया। आज भी वह दायरा यही चाहता है कि कथित आर्थिक सुधारों के मामले में प्रधानमंत्री वही 2008 वाला रूप धारण करें। प्रधानमंत्री भी यह करना चाहते हैं, लेकिन उनके हाथ कुछ उन गठबंधन सहयोगियों के कारण बंधे हुए हैं, जो सिर्फ केंद्रीय सत्ता का सुख भोगकर संतुष्ट नहीं हैं। बहरहाल, यहां गौरतलब सवाल यह है कि सामान्य तौर पर तार्किक एवं बौद्धिक रूप में पेश आने वाले डॉ. सिंह में कुछ नीतियों को लागू करने के मामले में अपनी चलाने की जिद क्यों पैदा हो जाती है? 

अगर हम अपनी इस चर्चा को आज के अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में ले जाएं, तो इसे समझना आसान हो सकता है। ग्रीस और इटली के हाल के उदाहरण इसमें हमारे लिए काफी मददगार हो सकते हैं। पिछले वर्ष इन दोनों देशों में निर्वाचित सरकारों को हटाकर वहां टेक्नोक्रेट सरकारें बनवाई गईं। प्रधानमंत्री कौन बने, यह एथेंस या रोम में नहीं, बल्कि ब्रसेल्स (यूरोपीय संघ के मुख्यालय) में तय हुआ। उसे तय करने में उन दोनों देशों की राजनीतिक शक्तियों की कोई भूमिका नहीं थी। बल्कि सबसे प्रमुख भूमिका जर्मनी की चांसलर एंगेला मार्केल और फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति निकोला सरकोजी की थी। टेक्नोक्रेट प्रधानमंत्रियों ने अपने देश में किफायत की नीतियों को लागू करने का यूरोज़ोन के बैंकरों और वित्तीय संस्थानों का एजेंडा बिना किसी तर्क-वितर्क के स्वीकार कर लिया। उन नीतियों से वित्तीय पूंजी के हितों की रक्षा की तो उम्मीद थी, लेकिन उसकी मार आम मेहनतकश जनता पर पड़ी। ग्रीस के हाल के संसदीय चुनाव में इन्हीं नीतियों के प्रति आम जनता की बगावत का इजहार हुआ, जब धुर वाम एवं उग्र दक्षिणपंथी पार्टियों ने अप्रत्याशित सफलता पाई। उधर फ्रांस की जनता ने इन नीतियों को पूरे यूरोप पर थोपने पर आमादा सरकोजी को सिर्फ एक कार्यकाल के बाद एलिजे पैलेस (राष्ट्रपति निवास) से बाहर कर दिया। आज नीदरलैंड से लेकर स्पेन और खुद किफायत की नीतियों की सबसे मुखर प्रवक्ता एंगेला मार्केल के देश जर्मनी तक में वित्तीय पूंजी के खिलाफ जन विद्रोह के संकेत साफ देखे जा सकते हैं।

दरअसल यूरोप में ब्रसेल्स बनाम राष्ट्रीय राजधानियों में खड़ा हो रहे अंतर्विरोध ने नव-उदारवाद की पूंजीपरस्त राज्य-व्यवस्था के लिए कड़ी चुनौती पैदा कर दी है। इस संदर्भ में आज अगर देश में एक मजबूत वाम विकल्प होता- या कम से कम सार्वजनिक बहसों में उसकी प्रभावशाली उपस्थिति होती- तो डॉ. सिंह की सरकार जिन नीतियों पर देश को ले गई है और आज भी जिनका वह पालन करना चाहती है, उनकी उपयोगिता और प्रासंगिकता पर न सिर्फ तार्किक प्रश्न खड़े किए जाते, बल्कि उन नीतियों के परिणाम के संदर्भ में यूपीए सरकार की राजनीतिक जवाबदेही भी तय की जाती। यह हैरतअंगेज है कि अभी भी अर्थव्यवस्था की गिरावट को रोकने के लिए जो नुस्खे सुझाए रहे हैं, उनका सारतत्व यह है कि तमाम संसदीय प्रक्रियाओं और रुकावटों को दरकिनार कर सरकार नव-उदारवादी सुधारों पर तेजी से अमल करे। इस सिलसिले में डॉ. सिंह, उनके वित्त मंत्री और कांग्रेस नेतृत्व को इस बात का आभास तक होने का संकेत नहीं मिलता कि उनकी विकास दर की बेसब्री और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के बीच अंतर्विरोध लगातार गहरा होता जा रहा है।

इस परिघटना का संदेश यह है कि अब न सिर्फ भारत, बल्कि पूरी दुनिया में नव-उदारवाद एवं लोकतंत्र के बीच अंतर्विरोध उस अवस्था में पहुंच गया है, जब दोनों के बीच किसी तरह का सामंजस्य या समन्वय होना निरंतर कठिन होता जाएगा। पूंजी की निरंकुश सत्ता और विभिन्न समाजों के उत्तरोत्तर लोकतंत्रीकरण की परिघटनाएं अब परस्पर विरोधी होने की स्थिति में पहुंच गई हैं। यूरोप में यह तस्वीर ज्यादा साफ है, तो इसका कारण यह है कि वहां औपनिवेशिक या नव-औपनिवेशिक शोषण से आने वाली समृद्धि के स्रोत अब सूख गए हैं और उसके बिना कल्याणकारी राज्य को चलाना वहां की नव-उदारवादी पूंजी के लिए मुश्किल हो गया है। इसकी सीधी मार आम मेहनतकश जन-समूहों पर पड़ी है, जिसके परिणामस्वरूप  और आम जन में बैंकरों, वित्तीय संस्थानों और उनसे नियंत्रित राजनेताओं के प्रति आक्रोश उबल रहा है। भारत में विचारधारा एवं व्यवस्था के रूप में मुक्त बाजार की नीतियों को ऐसी चुनौती मिलती नहीं दिखती, तो इसके कारण ऐतिहासिक एवं सामाजिक परिस्थितियों में छिपे हैं। भारत में संवैधानिक व्यवस्था का उदय- जो हमारे लोकतंत्र का आधार है- जातीय समुदायों एवं धार्मिक संप्रदायों की आपसी सौदेबाजी और आधुनिकता से उनके समस्याग्रस्त अंतर्संबंधों के तय हुआ। इसलिए आज भी आम जन की चर्चाओं में आर्थिक व्यवस्था से जुड़े मुद्दे गौण ही रहते हैं, जबकि जातीय या सांप्रदायिक अस्मिता के मुद्दे चुनावों में निर्णायक हो जाते हैं। इन्हीं सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों के कारण अनुकूल आर्थिक हालात के बावजूद देश में माकूल वाम विकल्प का उदय नहीं हो पाया है।
 
परिणाम यह है कि जहां यूरोप और यहां तक कि अमेरिका में भी नव-उदारवाद एवं मुक्त बाजार की व्यवस्था पर बुनियादी सवाल खड़े किए जा रहे हैं, भारत में यह बात राजनीतिक बहस में हाशिये पर है। नतीजतन न सिर्फ सत्ता पक्ष, बल्कि मुख्य विपक्ष भी इस व्यवस्था का पैरोकार बने हुए हुए हैं। खुद को सिविल सोसायटी कहने वाले संगठन भी इस बुनियादी बहस में गए बिना समाज में प्रतिष्ठा पाने में सफल हो गए हैं। चूंकि इस व्यवस्था में इन सबके हित हैं, इसलिए उन्होंने राजनीति में प्रासंगिकता बनाने के लिए भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर विवेकहीनता की हद तक शोर मचा रखा है। यह स्पष्ट देखा जा सकता है कि यह सारी बहस और ये सारा राजनीतिक संघर्ष समाज के कुछ खास तबकों को लुभाने वाले एक मुद्दे तक सीमित है। वह तबका संख्या में भले छोटा हो, लेकिन उसका प्रभाव निर्विवाद है। चूंकि  उस तबके का हित भी इसी में है कि राजनीतिक बहस पूंजी की लोकतंत्र विरोधी निरंकुशता पर केंद्रित ना हो जाए, इसलिए उससे जीवन-स्रोत पाने वाली पार्टियां एवं संगठन बहस को उस बिंदु पर नहीं ले जाएंगे। इसीसिए मुख्यधारा मीडिया से लेकर संसद तक में भ्रष्टाचार का मुद्दा छाया हुआ है। इस क्रम में मनमोहन सिंह की छवि धूमिल करने की कोशिशें एक नया उपक्रम हैं, जो अगर सफल हो जाए तो उसका सर्वाधिक लाभ मुख्य विपक्षी दल यानी भारतीय जनता पार्टी को मिलेगा। लेकिन उससे उस नीतिगत निरंकुशता से देश को मुक्ति नहीं मिलेगी, जिसके पीछे असल में नव-उदारवादी पूंजीवाद की ताकत है। बहरहाल, देश में लोकतंत्र को अगर सुरक्षित होना है, तो इस निरंकुशता पर लगाम लगानी ही होगी। लेकिन दुर्भाग्य से अभी इसके लिए कोई मजबूत राजनीतिक विकल्प उपलब्ध नहीं है।

 


सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं.  satyendra.ranjan@gmail.com पर इनसे संपर्क किया जा सकता है.