सामाजिक रिश्तों के बरअक्स ब्रिटिश राज की पड़ताल


-नलिन चौहान
ग्लिटरिंग डीकेड्स : न्यू दिल्ली इन लव एंड वार

नयनतारा पोथन 

 पेंगुइनइंडिया
अंग्रेजों ने नई साम्राज्यवादी राजधानी नई दिल्ली की स्थापना के लिए पुरानी दिल्ली के उत्तरी भाग, (जहां 12 दिसंबर, 1911 को किंग जॉर्ज पंचम  ने एक भव्य दरबार में सभी भारतीय राजाओं और शासकों आमंत्रित करके राष्ट्रीय राजधानी को कलकत्ता से यहां पर स्थानांतरित करने की घोषणा की थी) की तुलना में एक अलग स्थान को वरीयता दी । इस तरह, शाहजहांनाबाद की दक्षिण में एक स्थान का चयन केवल आकस्मिक नहीं था। राजधानी के उत्तरी हिस्से को इस आधार पर अस्वीकृत किया गया कि वह स्थान बहुत तंग होने के साथ साथ पिछले शासकों की स्मृति के साथ गहरे से जुड़े हुए था और यहां अनेक विद्रोही तत्व भी उपस्थित थे । जबकि इसके विपरीत स्मारकों और शाही भव्यता के अन्य चिन्हों से घिरा हुआ नया चयनित स्थान एक साम्राज्यवादी शक्ति के लिए पूरी तरह उपयुक्त था क्योंकि यह प्रजा में निष्ठा पैदा करने और न्यूनतम असंतोष होने के अनुरूप था ।


ऑस्ट्रेलिया में रहने वाली भारतीय मूल की लेखक और शोधकर्ता नयनतारा पोथन ने पेंगुइन, इंडिया से प्रकाशित अपनी पहली किताब ग्लिटरिंग डीकेड्स : न्यू दिल्ली इन लव एंड वार में इस तथ्य का खुलासा करते हुए इस बात को रेखांकित किया है कि किस तरह नस्लीय और सामाजिक-राजनैतिक पदानुक्रम को शहर के वास्तुशिल्प डिजाइन के अनुरूप ढाला गया था और किस तरह इस पदानुक्रम को आवासीय भूखंडों के वितरण में बनाए रखा गया था। इस पुस्तक के लेखन के लिए नई दिल्ली के एक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के सदस्यों के संस्मरण, प्रकाशित  डायरियां, पत्र और साक्षात्कार की पांडुलिपियों का उपयोग करने वाली नयनतारा कहती है कि 19वीं सदी और 20वीं सदी के आरंभ 1930 के शुरुआत तक की दिल्ली में जीवन शैली पदानुक्रमित थी । भारतीयों और अंग्रेजों के बीच सम्बंधों में अलगाव था ।

वारंट आॅफ प्रीसिडेंस एक कठोर औपनिवेशिक प्रोटोकॉल का जीता जागता उदाहरण था जो कि भारतीय सिविल सेवा और सेना के सदस्यों की सामाजिक स्थिति को परिभाषित करता था । नयनतारा अपनी पुस्तक में इस ओर इशारा करते हुए कहती है कि यह न केवल इस बात को तय करता था कि एक रात्रिकालीन भोज आयोजन मेंकिसको कहां बैठना है अपितु वारंट आॅफ प्रीसिडेंस यह भी निश्चित करता था कि रात्रिकालीन भोज में किसे आमंत्रित किया जाएगा क्योंकि कोई भी एक निश्चित रैंक के ऊपर या नीचे वाले अफसर किसी को अपने से न तो रात्रिकालीन भोज पर बुला सकता था और न ही कोई उसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित कर सकता था । दूसरे शब्दों में, यह न केवल अंतरजातीय बल्कि अंतर नस्लीय अलगाव का भी एक स्रोत था । इसने आधिकारिक सामाजिक जीवन के हर पक्ष, आवास  प्राप्त करने की पात्रता से लेकर एक रात्रिकालीन भोज में सीटों की पात्रता तक, को गहरे से प्रभावित किया ।


नई राजधानी के सामाजिक क्षेत्र में यूरोपीयों और भारतीयों के आपस में घुलने मिलने की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए नयनतारा बताती है कि साम्राज्यवादी राजधानी को जानबूझकर इस तरह बनाया गया था कि साम्राज्यवादी शासन परिलक्षित हो । इस तरह, सरकारी समाज और शहर में स्थान बनाने में सफल रहे देसी जनसंख्या के सदस्यों, जैसे नौकरशाही में एक स्तर तक के कुछ  भारतीय नौकरशाह, वायसराय की कार्यकारी परिषद के भारतीय सदस्य, भारतीय  राजकुमार और कुछ भारतीय व्यापारियों से उनके यूरोपीय समकक्षों के अनुरूप  समान सामाजिक व्यवहार के स्तर को अपनाने और बढ़ावा देने की अपेक्षा थी ।

वह आगे बताती है कि ऐसी रात्रिभोज पार्टियों के उदाहरण हैं, जिसमें केवल भारतीय आईसीएस अफसर भाग लेते थे । इन पार्टियों में आधिकारिक पोशाक के नियम लागू थे, जिसमें एक डिनर जैकेट, एक सफेद टाई और टेल पहनना जरूरी था । उस दौर में, सरकारी अधिकारियों के समाज में उठने बैठने वालों में व्यवहार की एकरूपता को प्रोत्साहित किया जाता था और उससे भी अधिक  महत्वपूर्ण बात यह थी कि यह राज की प्रतिष्ठा को बताने और बनाए रखने का एक तरीका था । सरकारी अधिकारियों के इस छोटे और कठोर सामाजिक दायरे ने इस  एकरूपता के क्रियान्वयन को आसान बना दिया था और इस वजह से सरकारी आधिकारियों का समाज के साथ उससे जुड़ी राज की प्रतिष्ठा तथा उसका प्रशासनिक अंग सहजता से नियंत्रित थे । इस तरह से, राज के कड़े पदानुक्रम  को कायम रखा गया । यह इसलिए भी संभव हो पाया क्योंकि अखिल भारतीय स्तर पर आईसीएस के सदस्यों की संख्या कभी भी 1300 से अधिक नहीं हुई और उसमें से भी  गिनती के अफसर ही केंद्र यानी नई दिल्ली में तैनात होते थे ।

अपनी पुस्तक के लिए सन् 1931 से 1952 के कालखंड में राजधानी के सामाजिक जीवन का लेखाजोखा जमा करने वाली नयनतारा कहती है कि 20 वीं शताब्दी के इंग्लैंड के अंग्रेज समाजवादी थे और समानता में रुचि रखते थे । वे 19 सदी के साहबों की तरह, ब्रिटिश साम्राज्य में विश्वास नहीं करते थे । उस समय आपस में अधिक मेलजोल था और आजादी के बाद भी कुछ अच्छे मित्रवत सम्बन्ध कायम रहे । जवाहर लाल नेहरू और लार्ड माउंटबेटन की मित्रता ऐसा ही एक  उदाहरण है ।

दूसरे विश्व युद्ध के वर्षों ने वारंट आॅफ प्रीसिडेंस की लक्ष्मण रेखा से इतर राजधानी के सामाजिक जीवन में बहुलवाद की जगह बनाई । 40 के दशक में धीरे-धीरे राजधानी के सामाजिक जीवन के केन्द्रों में नस्लीय भेदभाव और असमानता कम होने लगी थी । नयनतारा बताती है कि कड़ाई से भेदभाव का अनुसरण करने वाले जिमखाना क्लब ने सांकेतिक रूप से भारतीय सदस्यों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए थे पर उन्हें अपनी पत्नियों के साथ ही क्लब में आने की अनुमति दी गई थी । अनेक बुजुर्ग भारतीय महिलाएं बाॅलरूम डांस के साथ सहज  नहीं थीं । सन् 1947 के बाद दिल्ली में पंजाबी तबके की आमद के साथ क्लब का चरित्र बदलने लगा ।

नयनतारा बताती है कि लंबे बालों के साथ (पंजाबी) पुरुषों बाथिंग कैप पहननी पड़ती थी और भारतीय सदस्यों को उनके सामाजिक और वित्तीय हैसियत  दिखानी पड़ती थी । राजधानी के सामाजिक अड्डे के रूप में इम्पीरियल  जिमखाना क्लब, उस समय ही नाम था, ने भारतीयों को सदस्य के रूप में प्रवेश देना शुरू कर दिया था हालांकि उनको मतदान के अधिकार नहीं था । उनके अनुसार, महिलाओं का लेखन, उनके पुरुष समकक्षों की तुलना में नई दिल्ली के सामाजिक जीवन की एक विस्तृत झांकी की जानकारी देता है । उस समय के रेस्तरां जैसे कनॉट प्लेस का वेंगर जाज बैंड के साथ चाय नृत्य की मेजबानी करता था । वहां पर लोग दोपहर को देर से जाते थे । आमतौर पर यहां आने वाले मेहमानों की संख्या मिलीजुली होती थी और सन् 1940 के दशक तक  यहां पर भारतीय और अंग्रेज एकसाथ में बैठे और नाचते हुए दिखते थे ।

एक नाइट क्लब में अपनी दादी की तस्वीर से प्रेरित होने वाली नयनतारा कहती है कि मैंने तस्वीर देखी और मैंने सोचा कि आम तौर पर सलवार-कमीज पहनने वाली यह सुंदर पंजाबी महिला आखिर एक नाइट क्लब में क्या कर रही है । मैंने सोचा था कि असली कहानी तो यही है । मैं इस दौर से संबंधित कागजातइतिहास, और साधन की तलाश में राष्ट्रीय अभिलेखागार, तीन मूर्ति भवन और लंदन निकल गई । सन् 30 के दशक में अंतर-जातीय और अंतर-राष्ट्रीय विवाह अपवाद थे और सन् 1930 और 1940 के दशक में अधिकतर मिश्रित जोड़े क्लबों में ही मिलते थे । जिन भारतीय परिवारों में मिश्रित विवाह हुए थे, वे रहन सहन में अत्यंत पश्चिमी थे । अंग्रेज पुरुषों की शिकायत थी कि औपनिवेशिक ब्रिटिश समाज के साथ अपनी निकटता के बावजूद भारतीय परिवारों आधुनिक न  होकर राजनीतिक रूप से अत्यंत सक्रिय थे । यहां यह उल्लेख करना लाजिमी होगा कि नयनतारा भी एक मलयाली पिता और एक उत्तर भारतीय माँ की संतान है ।



 नलिन जी का पता बी-4, ट्रांसिट हास्टल, बैटरी लेन, राजपुर रोड, सिविल लाइंस, दिल्ली-110054 है. और इन्टरनेट पर इनसे  nalin9@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.