एक हत्यारे का खात्मा, सामंतवादी ताकतें और सुशासन

-पटना से सरोज कुमार

पिछले दो दिनों में बिहार के घटनाक्रम ने एक बार फिर सत्ता के चरित्र के साथ ही सामंतवादी ताकतों को पहचानने का मौका दिया है। कई नरसंहारों को अंजाम देने वाले रणवीर सेना सुप्रीमो ब्रह्मेश्वर मुखिया की मौत के बाद जिस तरह से सरकार के साथ-साथ विपक्ष और मीडिया ने भी जो भूमिका निभाई, इससे इनमें सामंतवादी ताकतों का वर्चस्व स्पष्ट होता है। मुखिया की मौत से लेकर उसकी विभत्स शवयात्रा तक सामंतवादी उन्मांदियों ने जो उत्पात मचाया वह किसी से छिपा नहीं। बिहार में नीतीश कुमार के सुशासन के दावे के साथ ही विकास की राजनीति की पोल भी खुलती चली गई।

मुखिया का खात्मा और राजनीतिक विलाप

आरा में मुखिया के मारे जाने की खबर मिलते ही सरकार में बैठे मंत्रियों ने विलाप करना शुरु कर दिया और मुखिया की तुलना गांधी तक से कर दी। किसानों के बड़े नेता से लेकर समतामूलक समाज के पक्षधर जैसी संज्ञाओं से नवाजा। सरकार के मंत्री गिरिराज सिंह ने उसकी तुलना गांधी से करते हुए खुलेआम कहा कि जो सपना मुखिया ने देखा था वो उन्हें पूरा करने का प्रयास करेंगे। इसी तरह अनिल शर्मा, सी.पी.ठाकुर, अश्विनी कुमार चौबे ने उसे समाज सुधारक घोषित करते रहे। यहीं नीतीश कुमरा सधी हुई भाषा में कहते रहे कि मुखिया की हत्या दुखद घटना है और हत्यारों की जल्द गिरफ्तारी होगी। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह रही कि लालू यादव तक ने मुखिया को बड़ा आदमी कह डाला। जो लालू यादव पिछड़ों का हिमायती होने का दावा करते रहे। आखिर लालू के सामने ऐसी क्या मजबूरी थी। सरकार से लेकर पूरा विपक्ष करीब एक ही तरह की बातें करता रहा। सिर्फ भाकपा माले का बयान अलग आया कि मुखिया की खात्मा जनाक्रोश का परिणाम है। माले राज्य सचिव कुणाल का बयान मिला कि अगर सरकार ने गरीबों-दलितों के साथ न्याय किया होता तो आज ये नौबत नहीं आती। लेकिन यह बयान देना कम खतरनाक नहीं था। अभी जबकि मारनेवालों के बारे में कोई भी संकेत नहीं मिला था तो ऐसे बयान का मतलब ये निकाला जा सकता था कि मारने वाले गरीब-दलित(रणवीर सेना के पुराने टारगेट) थे। इससे इन वर्गों के मासूमों पर हमले होने का डर था। जैसा कि शुरुआत में ही दलित छात्रावास पर हमला हो चुका था।

वे आए और नीतीश के सुशासन की पोल खोल कर चले गए

आरा से लेकर पटना तक जो उपद्रव हुआ और उसके प्रति सरकार के रवैए ने सुशासन की पोल खोल कर रख दी। मौत के तुरंत बाद सामंतवादी उन्मांदी जमा हुए और आरा में उत्पात मचाया। दलित छात्रावास पर हमला कर दिया, गाड़ियां फूंक दी, रेलवे स्टेशन पर तोड़-फोड़ की। लेकिन दूसरे दिन आरा से लेकर पटना के बांसघाट तक मुखिया की शवयात्रा में प्रशासन जिस तरह से निष्क्रिय बनी रही, इससे साफ जाहिर हुआ कि सरकार की ओर से उपद्रवियों को पूरी छूट मिली हुई थी। बात-बात पर लाठियां चलाने वाली पुलिस, थोड़ी सी भीड़ जमा होने पर आपा खो देने वाली पुलिस ऐसे ही निष्क्रिय नहीं बनी हुई थी। यही कारण था कि इन उत्पातियों के विरोध में पटना के पुनाईचक में स्थानीय लोगों ने विरोध-प्रर्दशन भी किया। नीतीश कुमार जिस कानून व्यवस्था का दावा करते रहे हैं उस दावा की हवा कुछ ही घंटों में निकल गई। उन्मांदियों ने मिलीट्री की जिप्सी फूंकने से लेकर आम राहगीरों को परेशान किया। ठेले-खोमचे वालों, फलवालों को लूट लिया। महिलाओं से छेड़खानी की। आम राहगीरों को मारा पीटा। बांसघाट पर एक पत्रकार की पिटाई कर दी तो शवयात्रा के दौरान एक हिंदी अखबार के फोटोग्राफर को भी बुरी तरह से चोटें लगी।

उपद्रवियों का के मनोबल का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बांसघाट पर खुल्लमखुल्ला धमकियां दी जा रही थी। वहां मौजूद पुलिसवालों को माईक से धमकी मिल रही थी- रास्ता बंद करवाओ। एक जगह खड़े मत रहो वरना कान अईंठ देंगे वहीं मीडिया को धमकी मिल रही थी- एक अखबार ने मुखिया जी को कई दलितों का हत्यारा लिख दिया है, ऐसे मीडिया को भी बख्शा नहीं जाएगा पूरी शवयात्रा में खुलेआम रणवीर सेना जिंदाबाद से लेकर एक खून का बदला सैंकड़ों खून बहा कर लेंगे जैसे नारे लगाए जा रहे थे।

वहीं बड़ी बेहयाई से डीजीपी अभयानंद ने बयान देते रहे-शवयात्रा के दौरान हंगामा कर रहे लोगों पर कार्रवाई करने से स्थिति बिगड़ सकती थी। पुलिस के लिए स्थिति संभालना मुश्किल हो जाता, इसलीए पुलिस ने पूरा संयम बरता। पुलिस ने संयम थोड़े ही बरता वह तो नपुंसक बनी रही। वहीं इनकी जगह मासूमों पर पुलिस अपना पौरुष दिखाने पर नहीं चूकती है। जब स्थिति संभालना पुलिस के बूते की बात नहीं थी तो फिर पटना में शवयात्रा करने की अनुमति ही क्यों दी गई थी? आरा में ही दाह-संस्कार क्यों नहीं करवाया गया?

डीजीपी कहते रहे कि शवयात्रा के दौरान उपद्रव करने वालों पर बाद में वीडियो फुटेज के आधार पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। यानि की आप तो पहले उपद्रवियों को खुली छूट दे रहे हैं और बाद में कार्रवाई करेंगे। ये मजाक नहीं तो और क्या है?

इसी अभयानंद के बारे में बांसघाट पर माईक से कहा जा रहा थाअभयानंद आपन समाज के आदमी हैं। उन्होंने दावा किया है कि अगर वो इसी समाज की पैदाइश हैं तो हत्यारों को पकड़ कर ही दम लेंगे। यह यूं ही नहीं था कि मुखिया की मौत की खबर मिलते ही अभयानंद को तत्काल आरा भेजा गया था।

मुखिया के खात्मा पर मीडिया का विलाप-
मुखिया की मौत के साथ ही मीडिया में जिस तरह से उसे किसान नेता से लेकर बड़ा आदमी बताया जाता रहा और गांधी जैसों से तुलना की जाती रही उसने फिर दिखा दिया है कि मीडिया में किस तरह के लोग बैठे हुए हैं। यहां तक कि अखबारों में बकायदा कुछ रिपोर्टर आंसु बहाते(भावुकता से भरे रिपोर्ट लिखते) रहे। कोई उसके उवाचों को अपने रिपोर्ट का आधार बना रहा था तो कोई उसको मजदूरों का हितैषी बता रहा था। हिंदुस्तान पटना संस्करण में 2 जून को पेज 2 की खबर जिसका शीर्षक था वह अंतिम प्रेस वार्ता, विधि व्यवस्था की तारीफ और 3 जून को उसी पेज की खबर बरमेश्वर पंचतत्व में विलीन पढ़ कर आपको अंदाजा हो जाएगा कि रिपोर्टरों की सोच क्या थी। एक सीनीयर क्राइम रिपोर्टर को कहते मैंने सुना-मुखिया जी कोई चोर-डाकू थोड़े थे। आपन समाज के नेता थे। अब हंगामा तो होइबे करेगा। ठीके हो रहल है। अब इन जैसों से और क्या उम्मीद की जा सकती है। दैनिक जागरण के साथ प्रभात खबर में भी जेल से बाहर आने के बाद लड़ रहे थे हक की लड़ाई’, ‘शपथ लेना तो सरल पर निभाना कठिन-बरमेश्वर मुखिया’, अब किसानों के लिए लड़ूंगा जैसे शीर्षकों से खबर छप रहे थे।

पटना में हुए उपद्रव की खबरें तो प्रमुखता से छपी पर सरकार या प्रशासन के खिलाफ कुछ नहीं छप रहा था। अंग्रेजी के जो एक-दो अखबार पटना से निकलते हैं वो कुछ जरुर प्रशासन पर आपत्ति उठा रहे थे। लेकिन हिंदी के अखबार केवल उपद्रवियों के पराक्रम दिखाने में ही व्यस्त रहे।

कुछ लोगों या सरकार का दबाव अखबार पर कितना था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुखिया की मौत के दिन आरा से भेजी गई रिपोर्ट जिसमें इस मौत में राजनीतिज्ञों की ओर इशारा किया गया है वह हिंदुस्तान के दिल्ली संस्करण में 2 जून को रहस्यों के घेरे में है मुखिया की हत्या शीर्षक से तो छप जाती है पर बिहार में यह रिपोर्ट रोक दिया जाता है। इस खबर में राष्ट्रवादी किसान संगठन के प्रवक्ता का बयान छपा है जिसमें उसने कहा है- कुछ लोग मुखिया की बढ़ती राजनीतिक लोकप्रियता से परेशान थे। इनमें सरकार के लोग ही शामिल हैं। प्रवक्ता के साथ रिपोर्टर का पूरा वार्तालाप दिल्ली में छपा है।

वहीं मणिकांत ठाकुर ने बिना सोचे-समझे 2 जून को बीबीसी में लिखा- माना जाता है कि ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या के पीछे वामपंथी संगठन सीपीआई(माले) का हाथ हो सकता है क्योंकि रणवीर सेना की मुख्य लड़ाई माले से ही रही है। जबकि मुखिया के संगठन का प्रवक्ता दूसरी तरफ इशारा कर रहा था। माले का नाम आते ही निश्चित है कि सामंतवादियों का गुस्सा मासूम, हाशिए के लोगों पर फूटता। इसलिए इस तरह की टिप्पणी को बिना पड़ताल किए देना बिल्कुल सही नहीं।

जाति, राजनीति और मुखिया का मारा जाना
ब्रह्मेश्वर मुखिया जेल से निकलने के बाद राजनीतिक रुप से सक्रिय होने की कोशिश में था। राष्ट्रवादी किसान संगठन के बहाने वह भोजपुर और मगध के क्षेत्रों का दौरा कर सभाएं कर रहा था। वह अपने समुदाय भूमिहार के साथ-साथ अन्य अगड़ी जातियों को अपने पक्ष में खड़ा करना चाहता था। वर्तमान सरकार का प्रमुख वोटर यह जाति है। इसके कई लोग भी सत्ता में बैठे हुए हैं। चूंकि यह बहुत बड़ा, प्रभावशाली और हमेशा एकमुश्त वोट करने वाला समुदाय रहा है। इस वोटबैंक को पाने और इसपर नजर रखने वाले लोगों के लिए ब्रह्मेश्वर की सक्रियता सही नहीं थी। जैसा कि आरा में ही हिंदुस्तान के रिपोर्टर से राष्ट्रवादी किसान संगठन के प्रवक्ता ने बताया वो भी इसी तरफ इशारा करती है कि यह राजनीतिक हत्या हो सकती है। वह रिपोर्टर को बताता है, माले हमारा शत्रु है लेकिन माले के अलावा हमारे कई अन्य शत्रु भी हैं। कुछ ऐसे लोग जरुर हैं जो मुखिया जो मुखिया जी की राजनीतिक लोकप्रियता से परेशान थे। इनमें कौन लोग शामिल हैं के जवाब में वह कहता है कि सरकार ही है और वो हमारे हथियार भी जब्त कर रही है। प्रवक्ता ने तो यहां तक कह दिया कि मुखिया की हत्या सरकार के इशारे और भोजपुर जिले के एसपी की शह पर हुई है। पटना में शवयात्रा में आए लोगों का गुस्सा भी सरकार पर था। कुल मिला कर भूमिहारों के वोटबैंक का ममाला दिखाई पड़ता है। यह यों ही नहीं था कि सुनील पांडे से लेकर संजय टाइगर तक को आरा में खदेड़ा गया।

शुरुआत में जहां दलित छात्रावास पर हमला हुआ और दलितों-पिछड़ों की ओर सबका ध्यान था, वहीं बाद में इस टकराव की आशंका कम हुई है। फिर भी हाशिए के लोगों को समझ लेना चाहिए कि सरकार पूरी तरह से सामंतवादियों के साथ है। चूंकि सत्ता में बैठे लोग अपनी तरफ उंगली उठने से परेशान-हैरान होंगे इसलिए वो दूसरी तरफ उंगली मोड़ने की फिराक में रहेंगे। वैसे दलितों और सामंतवादियों के सताए लोगों को मुखिया के मारे जाने पर खुशी जरुर मिली है पर उन्हें सत्ता में बैठे लोगों की असलियत समझ लेनी चाहिए। लालू जैसे लोग भी मुखिया को महान बताने पर तुले हुए हैं। इसलिए इन जैसे सभी लोगों की असलियत हाशिए के लोगों समझ लेनी चाहिए। सत्ता में बैठे और सत्ता की जुगत में रहने वाले लोग किस तरह सिर्फ हाशिए के लागों का इस्तेमाल करते हैं और फिर उन्हें उनकी हालत पर छोड़ देते हैं। हाशिए के लोग अपनी ताकत खुद हैं, ये राजनेता तो बस इस्तेमाल करना जानते हैं।

इन चीजों से एक बात और साफ हुई है कि नीतीश जो विकास के नाम पर वोट पाने का दावा करते थे, उसकी बुनियाद जातीय मैनेजमेंट पर ही टिकी हुई है। यहां विकास की राजनीति नहीं दरसल जाति की राजनीति है। जिस तरह नीतीश सरकार ने इन सामंतवादियों के सामने घुटने टेके हैं, कोई आश्चर्य की बात नहीं। सरकार चाहती थी कि इनका गुस्सा उतर जाए और तभी सरकार ने इनको उपद्रव करने से नहीं रोका ताकि सरकार के खिलाफ गुस्सा न रहे।

जब रोम जल रहा था तो नीरो चैन की बंशी बजा रहा था
कहते हैं जब रोम जल रहा था तो नीरो चैन की बंशी बजा रहा था। नीतीश कुमार भी कुछ इसी तरह व्यस्त मालूम पड़ते हैं। इधर जब आरा से लेकर पटना में उपद्रव होता रहा। आज तक भोजपुर से लेकर मगध के इलाकों में बंद और तोड़फोड़ और आगजनी की खबरें आ रही हैं और ये उपद्रव आगे भी जारी रहने की उम्मीद है। ऐसी स्थिति में राज्य का मुखिया भागलपुर की ओर सेवायात्रा करने में व्यस्त है। दरसल नीतीश सरकार उपद्रवियों को पूरी छूट देने पर कायम है। लेकिन यह खतरनाक संकेत है। यही हाल रहा तो राज्य में जल्द ही किसी बड़ी घटना या खूनी-संघर्ष से इंकार नहीं किया जा सकता।


सरोज युवा पत्रकार हैं. पत्रकारिता की आईआईएमसी से. अभी पटना में एक दैनिक अखबार में काम . इनसे krsaroj989@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.