लूट की परियोजनाओं में डूबता पहाड़-2


( उत्तराखंड में लूट-खसोट के लिए लिए बन रही जल विद्युत परियोजनाओं के बाँध में, विकास के नाम पर पहाड़ को डुबोने की राजनीति की पड़ताल करते  इस लंबे आलेख का दूसरा भाग...-माॅडरेटर)
भाग २.
-चारु तिवारी
ऐतिहासिक टिहरी शहर को डुबो चुकी टिहरी झील
...जलविद्युत परियोजनाओं के खिलाफ मुखर हुई आवाज नई नहीं है। भागीरथी और भिलंगना पर प्रस्तावित सभी परियोजनाओं के खिलाफ समय-समय पर लोग सड़कों पर आते रहे हैं। लोहारी-नागपाला से फलेंडा और पिंडर पर बन रहे तीन बांधों के खिलाफ जनता सड़कों पर है। इस बीच जो सबसे बड़ा परिवर्तन आया है, वह है सरकार और बांध निर्माण कंपनियों का जनता को बांटने का षडय़ंत्र। इसके चलते मौजूदा समय में पूरा पहाड़ समर्थन और विरोध में सुलग रहा है। केंद्र और राज्य सरकार के बीच एक ऐसा अघोषित समझौता है जिसके तहत वह न तो इन परियोजनाओं के बारे में कोई नीति बनाना चाहते हैं और न ही बिजली प्रदेश बनाने की जिद में स्थानीय लोगों के हितों की परवाह करते हैं।इसे इस बात से समझा जा सकता है कि यदि इन सरकारों की चली तो पहाड़ में 558 छोटे-बड़े बांध बनेंगे। इनमें से लगभग 1500 किलोमीटर की सुरंगें निकलेंगी। एक अनुमान के अनुसार अगर ऐसा होता है तो लगभग 28 लाख आबादी इन सुरंगों के ऊपर होगी। यह एक मोटा अनुमान सिर्फ प्रस्तावित बांध परियोजनाओं के बारे में है। इससे होने वाले विस्थापन, पर्यावरणीय और भूगर्भीय खतरों की बात अलग है।
मौजूदा समय में एक नई बात छोटी और बड़ी परियोजना के नाम पर चलाई जा रही है। बताया जा रहा है कि पहाड़ में बड़े बांध नहीं बनने चाहिए। इन्हें रन ऑफ द रीवर बनाया जा रहा है, इसलिए इसका विरोध ठीक नहीं है। लेकिन यह सच नहीं है। उत्तराखंड में बन रही लगभग सभी परियोजनायें तकनीकी भाषा में भले ही रन ऑफ द रीवर बतायी जा रही हों या उनकी ऊंचाई और क्षमता के आधार पर उन्हें छोटा बताया जा रहा हो, लेकिन ये सब बड़े बांध हैं। सभी परियोजनायें सुरंग आधारित हैं। सभी में किसी न किसी रूप में गांवों की जनता प्रभावित हो रही है। कई गांव तो ऐसे हैं जो छोटी परियोजनाओं के नाम पर अपनी जमीन तो औने-पौने दामों में गंवा बैठते हैं, लेकिन वे विस्थापन या प्रभावित की श्रेणी में नहीं आते हैं। जब सुंरग से उनके घर-आंगन दरकते हैं तो उन्हें मुआवजा तक नहीं मिलता, जान-माल की तो बात ही दूर है। सरकार और परियोजना समर्थकों की सच्चाई को जानने के लिए कुछ परियोजनाओं का जिक्र करना जरूरी है।
जिस लोहारी-नागपाला को लेकर विवाद की शुरुआत हुई है, उसे रन ऑफ द रीवर का नाम दिया गया। इसमें विस्थापन की बात को भी नकारा गया। स्थानीय लोगों ने तब भी इसका विरोध किया था, लेकिन उनकी किसी ने नहीं सुनी। यह परियोजना 600 मेगावाट की है। इसमें 13 किलोमीटर सुरंग है। भागीरथी पर ऐसे 10 और बांध हैं। इनमें टिहरी की दोनों परियोजनाओं और कोटेश्वर को छोड़ दिया जाये तो अन्य भी बड़े बांधों से कम नहीं हैं। इनमें करमोली हाइड्रो प्रोजेक्ट 140 मेगावाट की है। इसके सुरंग की लंबाई आठ किलोमीटर से अधिक है। जदगंगा हाइड्रो प्रोजेक्ट 60 मेगावाट की है। इसकी सुरंग 11 किलोमीटर है। 381 मेगावाट की भैरोघाटी परियोजना जिसे सरकार ने निरस्त किया है, उसके सुरंग की लंबाई 13 किलोमीटर है। मनेरी भाली प्रथम 90 मेगावाट क्षमता की रन ऑफ द रीवर परियोजना है। यह 1984 में प्रस्तावित हुई। इसे आठ किलोमीटर सुरंग में डाला गया है। इसका पावर हाउस तिलोय में है। इस सुरंग की वजह से भागीरथी नदी उत्तरकाशी से मनेरी भाली तक 14 किलोमीटर तक अपने अस्तित्व को छटपटा रही है। इसके बाद भागीरथी को मनेरी भाली द्वितीय परियोजना की सुरंग में कैद होना पड़ता है। 304 मेगावाट की इस परियोजना की सुरंग 16 किलोमीटर लंबी है। इसके बाद टिहरी 1000 मेगावाट की दो और 400 मेगावाट की कोटेश्वर परियोजना है। आगे कोटली भेल परियोजना 195 मेगावाट की है। इसमें भी 0.27 किलोमीटर सुरंग है।
जल विद्युत परियोजना के लिए खोदी गई सुरंग
गंगा की प्रमुख सहायक नदी अलकनंदा पर दर्जनों बांध प्रस्तावित हैं। इन्हें भी रन ऑफ द रीवर के नाम से प्रस्तावित किया गया। इस समय यहां नौ परियोजनाएं हैं। इनमे 300 मेगावाट की अलकनंदा हाइड्रो प्रोजेक्ट से 2.95 किलोमीटर की सुरंग निकाली गई है। 400 मेगावाट की विष्णुगाड़ परियोजना की सुरंग की लंबाई 11 किलोमीटर है। लामबगड़ में बनी इसकी झील से सुरंग चाईं गांव के नीचे खुलती है जहां इसका पावर हाउस बना है। यह गांव इसके टरबाइनों के घूमने से जमींदोज हो चुका है। लामबगढ़ से चाईं गांव तक नदी का अता-पता नहीं है। तपोवन-विष्णुगाड़ परियोजना इस समय सबसे संवेदनशील है। इस परियोजना की क्षमता 520 मेगावाट है। इससे निकलने वाली सुरंग की लंबाई 11.646 किलोमीटर है। यह ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शहर जोशीमठ के नीचे से जा रही है। इससे आगे 444 मेगावाट विष्णुगाड़-पीपलकोटी परियोजना है। इससे 13.4 किलोमीटर सुरंग निकली है। 300 मेगावाट की बोवाला-नंदप्रयाग परियोजना से 10.246 किलोमीटर की सुरंग से गुजरेगी। नंदप्रयाग-लंगासू हाइड्रो प्रोजेक्ट 100 मेगावाट की है। इसमें पांच किलोमीटर से लंबी सुरंग बननी है। 700 मेगावाट की उज्सू हाइड्रो प्रोजेक्ट की सुरंग की लंबाई 20 किलोमीटर है। श्रीनगर हाइड्रो प्राजेक्ट जिसे पूरी तरह रन ऑफ द रीवर बताया जा रहा था उसकी सुरंग की लंबाई 3.93 किलोमीटर है। यह परियोजना 320 मेगावाट की है। अलकनंदा पर ही बनने वाली कोटली भेल- प्रथम बी 320 मेगावाट की परियोजना है। यह भी सुरंग आधारित परियोजना है। गंगा पर बनने वाली कोटली भेल-द्वितीय 530 मेगावाट की है। इसकी सुरंग 0.5 किलोमीटर है। चिल्ला परियोजना 144 मेगावाट की है, इसमें से 14.3 किलोमीटर सुरंग बनेगी।
जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगों के ये आंकड़े केवल भागीरथी और अलकनंदा पर बनने वाले बांधों के हैं। इसके अलावा सरयू, काली, शारदा, रामगंगा, पिंडर आदि पर प्रस्तावित सैकड़ों बांधों और उनकी सुरंगों से एक बड़ी आबादी प्रभावित होनी है। अब सरकार और विकास समर्थक इसके प्रभावों को नकार रहे हैं। उनका कहना है कि पर्यावरणीय प्रभाव और आस्था के सवाल पर विकास नहीं रुकना चाहिए। असल में यह तर्क ही गलत है। जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण का विरोध पर्यावरण और आस्था से बड़ा स्थानीय लोगों को बचाने का है। इसके लिए आयातित आंदोलनकारी नहीं, बल्कि पिछले चार दशकों से यहां की जनता लड़ाई लड़ रही है। नदियों को बचाने से लेकर अपने खेत-खलिहानों की हिफाजत के लिए जनता सड़कों पर आती रही है।
जिस तरह इस बात को प्रचारित किया जा रहा है कि इन बांध परियोजनाओं की शुरुआत में लोग नहीं बोले, यह गलत है। लोहारी-नागपाला के प्रारंभिक दौर से ही गांव के लोग इसके खिलाफ हैं। भुवन चंद्र खंडूड़ी के मुख्यमंत्रित्वकाल में लोहारी-नागपाला के लोगों ने उसका काली पट्टी बांधकर विरोध किया था। श्रीनगर परियोजना में भी महिलाओं ने दो महीने तक धरना-प्रदर्शन कर कंपनी की नींद उड़ा दी थी। लोहारी-नागपाला परियोजना क्षेत्र भूकंप के अतिसंवेदनशील जोन में आता है, जहां बांध का निर्माण पर्यावरणीय दृष्टि से कतई उचित नहीं है। विस्फोटकों के प्रयोग से तपोवन-विष्णुगाड़ जल विद्युत परियोजना में चाईं गांव विकास के नाम पर विनाश को झेल रहा है। यहां के लोगों ने 1998-99 से ही इसका विरोध किया था, लेकिन जेपी कंपनी धनबल से शासन-प्रशासन को अपने साथ खड़े करने में सफल रही। आठ साल बाद 2007 में चाईं गांव की सड़कें कई जगह से ध्वस्त हो गईं। मलबा नालों में गिरने लगा, जिससे जल निकासी रुकने से गांव के कई हिस्सों का कटाव और धंसाव होने लगा। गांव के पेड़, खेत, गौशाला और मकान भी धंस गए। करीब 50 मकान पूर्ण या आंशिक रूप से ध्वस्त हुए तथा 1000 नाली जमीन बेकार हो गई। 520 मेगावाट वाली तपोवन-विष्णुगाड़ जल विद्युत परियोजना का कार्य उत्तराखंड सरकार और एनटीपीसी के समझौते के बाद 2002 में प्रारंभ किया गया, जिसमें तपोवन से लेकर अणमठ तक जोशीमठ के गर्भ से होकर सुरंग बननी है। निर्माणाधीन सुरंग से 25 दिसंबर 2009 से अचानक 600 लीटर प्रति सेकेंड के वेग से पानी का निकलना कंपनी के पक्ष में भूगर्भीय विश्लेषण की पोल खोलता है। इस क्षेत्र में विरोध करने वालों पर अनेक मुकदमे दायर किए गए हैं।
चिपको आंदोलन की प्रणेता गौरा देवी के गांव रैणी के नीचे भी टनल बनाना महान आंदोलन की तौहीन है। वर्षों पहले रैणी महिला मंगल दल ने परियोजना क्षेत्र में पौधे लगाये थे। परियोजना तक सड़क ले जाने में 200 पेड़ काटे गए और मुआवजा वन विभाग को दे दिया गया। पेड़ लगाने वाले लोगों को पता भी नहीं चला कि कब ठेका हुआ। गौरा देवी की निकट सहयोगी गोमती देवी का कहना है कि पैसे के आगे सब बिक गया। रैणी से छह किमी दूर लाता में एनटीपीसी द्वारा प्रारंभ की जा रही परियोजना में सुरंग बनाने का गांववालों ने पुरजोर विरोध किया। मलारी गांव में भी मलारी झेलम नाम से टीएचडीसी की विद्युत परियोजना चल रही है। मलारी ममंद ने कंपनी को गांव में नहीं घुसने दिया। परियोजना के बोर्ड को उखाड़कर फेंक दिया। प्रत्युत्तर में कंपनी ने कुछ लोगों पर मुकदमे दायर किए हैं। इसके अलावा गमशाली, धौलीगंगा और उसकी सहायक नदियों में पीपलकोटी, जुम्मा, भिमुडार, काकभुसंडी, द्रोणगिरी में प्रस्तावित परियोजनाओं में जनता का प्रबल विरोध है।
पिंडर नदी में प्रस्तावित तीन बांधों के खिलाफ फिलहाल जनता वही लड़ाई लड़ रही है। यहां देवसारी परियोजना के लिए प्रशासन ने 13 अक्टूबर 2009 को कुलस्यारी में जनसुनवाई रखी। कंपनी प्रशासन ने बांध प्रभावित क्षेत्र से करीब 17 किमी दूर करने के बावजूद भी 1300 लोग इसमें पहुंचे। दूसरी जनसुनवाई 22 जुलाई 2010 को देवाल में आयोजित की गई जिसमें करीब 6000 लोगों ने भागीदारी की। लोगों ने एकजुट होकर बांध के विरोध में एसडीएम चमोली को ज्ञापन सौंपा। इस जनसुनवाई में सीडीओ चमोली ने ग्रामीण जनता को विश्वास में लेते हुए गांव स्तर पर जनसुनवाई करने की बात कही। 15 सितंबर, 2010 को थराली तहसील में मदन मिश्रा के नेतृत्व में देवाल, थराली, नारायणबगड़ के सैकड़ों लोगों ने बड़े बांधों के विरोध में जोरदार प्रदर्शन कर बांधों के खिलाफ अपना अभियान जारी रखा हुआ है।
राजनीतिकों की जाने दें क्या ऐसा हो सकता है कि हमारे तथाकथित बुद्धिजीवियों को यह सब समझ में नहीं आ रहा हो?
(यह आलेख समयांतर के जून अंक में प्रकाशित हो चुका है.)




चारु तिवारी वरिष्ठ पत्रकार हैं. विभिन्न आन्दोलनों से जुड़ाव. अभी उत्तराखंड की प्रतिनिधि पत्रिका 'जनपक्ष आजकल' का संपादन कर रहे हैं.