कलाधर या रचयिता होना नहीं है पर्याप्त : बाबा नागार्जुन

(इन दिनों पहाड़ों में बर्फ़बारी है. बाबा नागार्जुन का पहाड़ों के प्रति विशेष लगाव रहा है. क्यों ना उन्ही की एक कविता बरफ पड़ी है के जरिये इसे महसूस किया जाय और इसी क्रम में बाबा नागार्जुन को महसूस करने के लिए कवि और आलोचक महेश चंद्र पुनेठा का आलेख भी प्रस्तुत है.
-माॅडरेटर)





बाबा नागार्जुन ने कविता को जनता के पक्ष में खड़े होने का हथियार बनाया 
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                                                                       - महेश चंद्र पुनेठा

 वे कौनसी विशिष्टताएं हैं जिनके चलते नागार्जुन जनकवि कहलाए तथा उनकी कविताएं जनता में आज भी लोकप्रिय हैं? इस पर  मैं अपनी बात पिछली सदी के महान जनवादी रचनाकार ब्रेख्त के कथन से शुरू करना चाहुॅगा । उनके अनुसार ’’ लोकप्रिय वह है जो व्यापक जनता के लिए बोधगम्य हो ,जो जनता के अभिव्यक्ति-रूपों को अपनाए और उन्हें समृद्ध बनाए ,जो जनता के दृष्टिकोण को स्वीकारे और सुधारे ,जो जनता के सार्वधिक प्रगतिशील हिस्से की नेतृत्वकारी शक्ति का चित्रण करे ,जो प्रगतिशील परम्पराओं की तलाश करे और उन्हें समृद्ध करे ,जो वर्तमान शासक वर्ग के बदले राष्ट्र और समाज का नेतृत्व करने के लिए संघर्षशील जनता तक पहुॅच सके।’’ हम देखते हैं कि लोकप्रियता के ये तत्व हमें नागार्जुन की कविताओं में जगह-जगह मिलते हैं।

बोधगम्यता या संप्रेषणीयता वह पहला द्वार है जो हमें किसी रचना के भीतर प्रवेश कराती है। यह कहना गलत नहीं होगा कि यदि यही द्वार कमजोर हो तो रचना के भीतर भले कितनी ही बड़ी-बड़ी बातें हों वे धरी की धरी रह जाती हैं।कम से कम एक सामान्य पाठक की दृष्टि से तो ऐसा ही है।संप्रेषणीयता ही है जो एक पाठक को गहरे में उतरने के लिए प्रेरित करती है।कबीर -तुलसी-सूर सरीखे भक्त कवियों की लोकप्रियता का एक कारण यही रहा। संप्रेषणीयता सहजता से आती है। नागार्जुन की लोकप्रियता का पहला कारण उनकी सहजता ही है। इनके पास जटिल से जटिल बातों को भी बड़ी सहजता से कविता में व्यक्त करने का कौशल है।जनता के अभिव्यक्ति के रूपों को अपनाते हुए ये आम बोलचाल की भाषा में विराट सत्य को उद्घाटित कर देते हैं। इन्होंने आम लोगों-सा बातूनीपन ,गप्प मारने ,हॅसने-हॅसाने तथा ठिठोली करने की कला का खास रूप से उपयोग किया है । इन्होंने उस क्रियाशील आदमी से भाषा सीखी है जिसका इस दुनिया को सुंदर बनाने मंे महत्वपूर्ण हाथ है। ये किताबी भाषा के नहीं जीवन की भाषा के कवि हैं। इनके कहन का अंदाज पाठक को अपने साथ बुलाकर ले जाता है और कविता की अंतर्वस्तु के केंद्र बिंदु तक पहुॅचा देता है। पाठक को माथापच्ची नहीं करनी पड़ती है।इसी कारण इनके पाठक मजदूरों से लेकर पंडितों और किसानों की चैपालों से लेकर रसिकों की गोष्ठी तक फैले हैं।सबके लिए ग्राह्य सबके लिए सुगम । इनके बिंब इनकी भाषा ,इनका एक-एक रगरेशा आम जनता के जीवन से इतना नजदीक से जुड़ा है कि ये जनता के किसी भी तबके के समक्ष अपनी समग्र संवेदना तथा प्रभाव के साथ ग्राह्य हैं । ये लोक के बिंबों ,प्रतीकों और मिथकों से अपनी बात को कहते हैं फलस्वरूप  काव्यात्मकता की दृष्टि से भी इनकी कविताएं कमजोर नहीं प्रतीत होती हैं। इनके यहाॅ कलात्मकता भरपूर है पर इनका ध्यान मात्र कला पर नहीं है। इन्होंने कला को भी साधा साथ ही साथ लोगों के साथ जीवंत संपर्क और खुली आॅख से अपने समय और समाज की विसंगतियों को देखते-परखते हुए एक जीवन दृष्टि को भी प्राप्त किया। शिल्प के प्रति उदासीन रहे बिना इन्होंने यह सहजता पाई जो महत्वपूर्ण बात है। वरिष्ठ आलोचक शिवकुमार मिश्र बिल्कुल सही कहते हैं -कविता क्या है? इसकी पूरी समझ रखने वालों को और उसके औजारों पर पूरा अधिकार रखने वालों को  ही यह सरलता तथा सहजता नसीब होती है।


नागार्जुन ने यह सहजता सचेतन रूप से ही प्राप्त की है। सरलता की साधना बड़ी कठोर साधना होती है इसके लिए जन की संवेदना से गहरे तक एकात्म होना पड़ता है। व्यक्ति को स्वयं को डीक्लास करना पड़ता है, अपने जड़ीभूत संस्कारों को छोड़ना पड़ता है ,बड़े जन समाज से जुड़ना पड़ता हैेे। ये ऐसा कर पाए । जैसा कि नागार्जुन की कविता के लिए कवि आलोकधन्वा कहते हैं कि नागार्जुन की कविताएं इतनी खुली हैं -इनमें चीजों ,लोगों और घटनाओं का ऐसा गतिमान वर्णन है जिसके भीतर आना-जाना  समान्य जन के लिए भी सुगम है। वास्तव में कलात्मक सजगता के साथ जन का जीवन जनता की भाषा में कैसे पेश किया जाय इनकी रचनाएं इसकी जीती-जागती मिसाल हैं। कोई कवि यह सहजता तथा सरलता कैसे प्राप्त करता है ?इस बारे में वरिष्ठ आलोचक डाॅ0जीवन सिंह अपनी पुस्तक ’ कविता और कवि कर्म ’ में एक स्थान पर लिखते हैं कि कवि का वास्तविक जगत और जीवन का अनुभव जितना बहुस्तरीय ,बहुवर्गीय ,संश्लिष्ट एवं व्यापक होगा उसकी कविता उतनी ही कलात्मक ,सजीव एवं गोचर होगी । बाबा नागार्जुन का जीवनानुभव विविध ,बहुस्तरीय ,बहुवर्गीय एवं संश्लिष्ट है इसलिए उनकी कविता बोधगम्य और कलात्मक हैं। इन कवियों की अधिकांश कविताओं में एक कथा निरंतर चलती रहती है । इनके विवरण इतने सूक्ष्म एवं मार्मिक होते हैं कि सहृदय उनमें डूब सा जाता है । मिथकों का प्रयोग लोक आख्यानों का सा आनंद देती हैं। जीवन के छोटे-छोटे क्षणों को भी उत्सव बना देने की क्षमता हमें इनकी कविताओं में मिलती है।





जन-मन में ऊर्जा भरने वाले नागार्जुन  उन कवियों में रहे हैं जिन्होंने कविता को पहले अपने जीवन में रचा फिर कागज में। ये साधारण जनों की तरह सोचते तथा आचरण करते थे। इनकी कविता इनके जीवन से दूर नहीं रही। ये कविता में जिससे प्रेम करते हैं उससे जीवन में भी प्रेम करते रहे और जिससे कविता में नफरत की तो बस जीवन में भी नफरत की-

बेईमान नहीं हॅू मैं सबके साथ इंसाफ करता हूँ
मैं प्यार भी बाॅटता हॅू
मैं नफरत की भट्टी भी झोंकता हूँ ।

ये जीवन में हानि-लाभ का हिसाब लगाने वाले और जोड़-तोड़ बिठाने वाले कवियों में से नहीं रहे। इन्होंने दुनियादारी में सफल होने के लिए कविता नहीं रची । जो देखा-जो भोगा उसको कविता में उतारा इसीलिए इनकी कविताओं में जीवन का खुरदुरा यथार्थ और अपना मूुहावरा हमें दिखाई देता है। इनकी कविताएं इसलिए अधिक अपील करती हैं कि ये विचार से कविता में नहीं  बल्कि जीवन से कविता में आए। इनका इंद्रियबोध इनके विचारों और भावों का आधार बना । ये पहले अपने को आदमी मानते थे फिर कवि -कवि हॅू पीछे ,पहले तो मैं मानव ही हॅॅू/अति मानव या लोकोत्तर किसको कहते हैं-नहीं जानता । इनके लिए कवि कार्य कोई अंशकालिक या ’ बैठे से बेगार भली ’ जैसा कार्य नहीं रहा। इन्होंने अपना पूरा जीवन दाॅव पर लगाया। इसी का परिणाम है कि इनकी कविताएं एक ओर जीवन सौंदर्य की रचना का तो दूसरी ओर जीवन संघर्ष का रास्ता दिखाने में समर्थ हैं। ये कविताएं पाठक को एक ताकत देती हैं ,निराश या कुंठित नहीं करती हैं बल्कि जड़ता को तोड़ने का अह्वान करती हैं। 

नागार्जुन जनता के संघर्षों से सीखते रहने वाले कवि रहे। वे कविता की स्थितियों तथा उनसे जुड़ी संवेदनाओं को ठेठ जनता के जीवन के बीच से उठाते हैं। जीवन की सच्चाई को व्यक्त करने के लिए इन्होंने संघर्ष किया। लोकपरकता इनकी कविता की धुरी है जो उनके रचना विधान को गतिशील बनाती है। लोक-लीला इन्हें निरंतर  पे्ररणा देती रही। ये ’बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त /संकुचित ’स्व’ की आपाधापी के निषेधार्थ /अविवेकी भीड़ की ’भेडि़या धॅसान’ के खिलाफ / अंध-बधिर ’व्यक्तियों’ को सही राह बताने के लिए /अपने आप को भी व्यामोह से बारंबार उबारने के खातिर प्रतिबद्ध हैं। अपनी प्रतिबद्धता को आम जन के प्रति बनाए रखने के लिए अपने भीतर-बाहर से लड़ते रहे। एक प्रतिबद्ध कवि ही इस तरह गरज सकता है- 

नौकरशाही के ये भारी-भरकम ढाॅचे नहीं चलेंगे
शोषणमूलक लोकतंत्र के नकली साॅचे नहीं चलेंगे
पाॅच हजारी आफिसरों को वापस ले लो 
अपनी नागफनी के पौधे वापस ले लो 
नव दिल्ली तो प्रभु नगरी है,बाकी सब बंधुआ-गुलाम हैं 
आप समेटो माया अपनी ,भाई जी , तुमको सलाम है। 

बाबा नागार्जुन ने कविता को जनता के पक्ष में खड़े होने का हथियार बनाया। लोक से अपनी नजदीकी बनायी।जनता के संघर्ष को हिए की आॅख से देखा तथा तुच्छताओं को त्याग सृजन के प्रति ईमानदारी से समर्पित रहे। गुूरुवर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहा करते थे-गंगा जल से भी पवित्र अगर कोई वस्तु है तो वह है श्रम का पसीना। इसके बिना तन-मन स्वस्थ नहीं रह सकता है। नागार्जुन इसी श्रम-सौंदर्य के कवि हैं।’खुरदुरे पैरों ’ में भी सौंदर्य देखने वाले कवि । इनकी पक्षधरता उनके प्रति है जो अपने श्रम से ’नरक को सुरपुर’ बनाते हैं तभी तो वे कहते हैं-

धन्य है श्रमशील मानव विश्वभर में व्याप्त 
धन्य तेरी जाति!
नरक को सुरपुर बनाने के लिए 
श्रम करते हर घड़ी बेचैन। 

नागार्जुन उनकी और मध्यवर्ग की चिंताओं की प्राथमिकताओं को लक्ष्य करते हुए लिखते हैं-

 वे लोहा पीट रहे हैं ,तुम मन को पीट रहे हो
वे पत्थर जोड़ रहे हैं तुम सपने जोड़ रहे हो
उनकी घुटन ठहाकों में घुलती है और तुम्हारी घुटन उनींदी 
घडि़यों में चुरती है
 वे हुलसित हैं अपनी ही फसलों में डूब गए हैं
तुम हुलसित हो चितकबरी चाॅदनियों में खोए हो 
उन्हें दुःख है नए आम की मंजरियों को पाला मार गया है
तुम को दुःख है काव्य संकलन दीमक चाट गए हैं।

 वे कवियों को आगाह करते हैं -

इतर साधारण जनों से अलहदा रहो मत
कलाधर या रचयिता होना नहीं पर्याप्त है 
पक्षधर की भूमिका धारण करो
विजयिनी जनवाहिनी का पक्षधर होना पड़ेगा.....
अगर तुम निर्माण करना चाहते हो 
शीर्ष संस्कृति को अगर सप्राण करना चाहते हो।

 नागार्जुन श्रमिकों के शोषण को लेकर प्रश्न करते हैं-
लाख-लाख श्रमिकों की गर्दन कौन रहा है रेत
छीन चुका है कौन करोड़ों खेतीहरों के खेत 
 किसके बल पर कूद रहे हैं सत्ताधारी प्रेत ।

जो जनता का कवि होता है वह केवल शोषित की स्थिति का चित्रण मात्र ही नहीं करता बल्कि शोषक का भी पता बताता है और उन कारणों को उद्घाटित करता है जो शोषित की स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। जैसा कि अपनी एक कविता में केदार बाबू करते हैं- ठाट-बाट की सुविधा भोगी / ये साधक आराधक धन के /निहित स्वार्थ में लीन निरंतर/बने हुए हैं बाधक जन के/केंद्र बिंदु पर बैठे ठहरे/चक्र चलाते हैं शोषण के । नागार्जुन इन कारणों को समाप्त करने का संकल्प व्यक्त करते हैं-

 झूठ-मूठ सुजला-सुफला के गीत न अब हम गाएंगे
 दाल-भात-तरकारी जब तक नहीं पेट भर खाएंगे
सड़ी लाश हैं जमींदारियाॅ ,इनको हम दफनाएंगे
 गाॅव-गाॅव ,पाॅतर-पाॅतर को हम भू स्वर्ग बनाएंगे।
 खेत हमारे ,भूमि हमारी ,सारा देश हमारा है। 

इनकी कविताओं में श्रम और सामंती मूल्यों के बीच टकराव का देशज रूप है। वे  अज्ञेय की तरह कला मूल्यों पर जीवन मूल्यों की बलि चढ़ाने वाले ,स्वकेंद्रित तथा उच्चवर्गीय नैतिकता तथा सौंदर्यबोध से ग्रस्त कवि नहीं हैं। वे कविता में मनुष्य की तलाश के कवि हैं उस मनुष्य के जो तबाह होकर भी अपनी चरित्र की दृढ़ता को नहीं छोड़ते। नागार्जुन की कविता चालू मुहावरों का निषेध करती हैं । वे कविता क्रांति के लिए नहीं जीवन और मनुष्य की जीवनासक्ति के लिए लिखते थे। मनुष्य और जीवन को बचाना इनका लक्ष्य था और यह तभी संभव है जब शोषण के अंधियारे को समाप्त किया जाय ।

एक अच्छी कविता हमें अपने अस्तित्व का साक्षात्कार कराती है । हमारी देह, हमारी आत्मा, हमारे स्वप्न, हमारी मृत्यु सब इस अच्छी कविता में आ जाते हैं । जो अब तक नहीं हुआ उसकी उपस्थिति का आभास कराने का आनंद एक अच्छी कविता के भीतर होता है। ये सब बातें हमें मिलती है नागार्जुन की कविताओं में। जो वस्तु या घटना औरों की संवेदना को अछूती छोड़ जाती है वही इनकी  कविता की अंतर्वस्तु बन जाती है। नेवला, मुर्गा, कटहल, तोताराम, पसीना, भुस का पुतला, वमन, पैंने दाॅतों वाली मादा सूअर जैसे साधारण विषयों पर इनके द्वारा कविताएं लिखी गई।इस तरह ये साधारणत्व का सौंदर्यशास्त्र रचते  हैं।  

बाबा में सामूहिकता की भावना गहरे तक पैठी हुई थी अकेलापन इन्हें दूर-दूर तक भी नहीं भाता था। समूह में रहना तथा सामूहिक संघर्ष करना इनकी फितरत में शामिल रहा । इनकी कविता का केंद्रीय बिंदु ’हम’ है। ये अकेले की मुक्ति और अकेले के स्वर्ग की बात नहीं करते -

 अधिकाधिक योग-क्षेम 
अधिकाधिक शुभ-लाभ 
 अधिकाधिक चेतना 
कर लॅू संचित लघुतम परिधि में 
 असीम रहे व्यक्तिगत हर्ष-उत्कर्ष 
अकेले ही सकुशल जी लॅू ,सौ वर्ष 
 यह कैसे होगा , यह क्योंकर होगा।

उनकी इच्छा रही- रहॅू साथ सबके ,भोगॅू साथ सुख-दुःख । इसी सामूहिकता की भावना ने उन्हें जनकवि बनाया। लोक के सहजबोध ,सामूहिकता और रागोत्सव के गायक कवि हैं ये। नगार्जुन ने जहाॅ भी दमन-शोषण तथा जीवन का अपमान देखा अपनी रचना से उसका प्रतिरोध किया।अपनी कविताओं द्वारा समाज की विसंगतियों -बिडंबनाओं को उद्घाटित कर शोषण-उत्पीड़न-अन्याय के विरूद्ध आवाज बुलंद की। केवल कविताओं में ही नहीं बल्कि जन आंदोलनों में शामिल होकर भी। नागार्जुन अनेक बार जेल भी गए। इनकी जनपक्षधता ही कहिए कि वे हिंदी के ऐसे अकेले कवि हैं जिन्होंने स्वतंत्र भारत के आरंभिक वर्षों में ही अमरिकी साम्राज्यवाद के खतरे की ओर संकेत कर दिया था ।एक जनकवि यश और धन प्राप्ति के लिए कविता नहीं लिखता बल्कि  जो उसे पढ़े ,सुने ,उसकी सोच-समझ सुधरे और वह अमानवीय करनी करने वाले के खॅूखार रूप पहचाने ,उसे वह सच्चा न मानकर ,आदमी की चाॅदमारी करने वाला शासकीय तंत्र का अलोकतंत्रीय व्यवहारी जाने ,ऐसी रक्त की प्यासी ,सत्ता को समर्थन बंद करे।  नागार्जुन ने जनता के पक्ष में खड़े होने की यह ताकत अपनी धरती और अपने जन से  ग्रहण की । साथ ही  माक्र्सवाद से।  जैसा कि नागार्जुन के परम् मित्र केदार बाबू ने अपनी एक बातचीत में कहा था - यह ध्रुव सत्य है कि माक्र्सवादी हुए बिना आप आदमी नहीं हो सकते और आदमी नहीं हो सकते तो अच्छी कविता नहीं लिख सकते। और आदमी होने के लिए यह जरूरी है कि यह जीवन दर्शन आप समझिए और जीवन को समझिए। ऐसा ही कुछ मानना नागार्जुन का भी है- हम सर्वहारा के साथ हैं ,अपनी राजनीति में ,अपने साहित्य में किंतु हमें इस विषय में किसी की लगाई कैद मंजूर नहीं । हम गरीब-किसान के साथ हैं,गरीब मजदूर के साथ हैं ,हरिजन के साथ हैं ,इनका उद्धार हो हम ऐसा चाहते हैं। वे इनके पक्ष में दुनिया को बदलने के पक्षधर रहे जबकि देश का अज्ञेय जैसे मध्यवर्गीय इसके पक्ष में कभी नहीं रहे । 

जनता का सच्चा कवि ही सत्ता और ताकतवर लोगों पर व्यंग्य करने का साहस कर सकता है। यहाॅ तक कि अपने पर भी व्यंग्य करने से नहीं चूकता है। बाबा में हमें व्यंग्य की चुटीली धार दिखाई देती है। इसीलिए नामवर सिंह ने नागार्जुन को  कबीर के बराबर का व्यंग्यकार माना । वह अपने व्यंग्य वाणों से राजनीतिज्ञ , सामंत ,पुरोहित ,पूजीपति तथा बुद्धिजीवी किसी को भी नहीं छोड़ते । इसकी एक बानगी नागार्जुन की इन पंक्तियों में देखी जा सकती है- 

आओ रानी ,हम ढोएंगे पालकी 
यही हुई है राय जवाहरलाल की 
रफू करेंगे फटे-पुराने जाल की 
यही हुई है राय जवाहरलाल की ।

साम्राज्यवाद के साथ हमारे शासक वर्ग के गठजोड़ पर यह करारी चोट है। तथाकथित गाॅधीवादियों पर उनका तिलमिला  देने वाला व्यंग्य देखिए -

मैं नाम तुम्हारा बेचॅूगा
मारूॅगा तुमको रोज-रोज
बापू!तुमको जो अप्रिय थे
वह काम करूॅगा खोज-खोज 
फिर तो अपनी कोठी होगी
चमकीली होगी नयी कार
नाती-पोते बहकेंगे तो
बहुएॅ लेंगी उनको सुधार! 

बाबा जनता के पक्ष में अपनी बात खरी-खरी कहते हैं। कभी हिचकते नहीं - जनता मुझसे पूछ रही है ,क्या बतलाऊॅ /जनकवि हॅू मैं साफ कहॅूगा, क्यों हकलाऊॅ ? निःसंदेह वह कभी नहीं हकलाए। देश में इमरजेंसी के दौरान भी उन्होंने इंदिरा सरकार की बखिया उधेड़ देने वाली कविताएं रची- इंदुजी ,इंदुजी क्या हुआ आपको/सत्ता की पीनक में भूल गई बाप को।ऐसी कविताएं नागार्जुन जैसा जनपक्षधर कवि ही लिख सकता है।  

नागार्जुन की काव्य की एक खास विशेषता है कि इनकी कविता अपने जातीय बोध और भारतीय काव्य परम्परा से गहरी संपृक्त रही है। इन्होंने पश्चिम की ओर पीठ करके हमेशा भारतीय प्रगतिशील और उदात्त गुणों को अपनी कविता में स्थान दिया । इनकी कविता की जड़ें अपनी जमीन पर हैं।रचना सीधे धरती से उगी है जन गंगा ने उसे सींच कर पुष्ट किया है। केवल अंतर्वस्तु ही नहीं उसका रूप भी जन-जीवन की बहुरंगी छवियों से निर्मित है।अपनी धरती की महक और वहाॅ रहने वालों का जीवन पूरी विशिष्टता के साथ इनकी कविताओं में व्यक्त हुआ है। लोक जीवन की बोली -बानी ,लोक-जीवन की लय ,गॅवई-गाॅव के तिथि-त्योहार ,लागों का स्वभाव उनकी आदतें सबको इन कवियों ने परखा-पहचाना है। गंवई-गाॅव के उठाए गए शब्द जो मिथिला में बोले जाते हैं , इनके यहाॅ फूटते हैं। इनमें जहाॅ एक ओर गहरी स्थानीयता है तो दूसरी ओर व्यापक विश्वदृष्टि। वे अपने परिवेश और अपने समय से जुड़े रहे। इनकी कविता जीवन की ठोस  और मजबूत बुनियाद पर टिकी हुई है।  इनकी कविता में मिथिलांचल अपने पूरे रूप-रस-गंध-ध्वनि और स्पर्श के साथ उपस्थित होता है। वहाॅ की धरती और वहाॅ के लोग अपनी पूरी पहचान के साथ प्रकट होते हैं। अपने अंचल के नदी, पहाड़ ,मैदान, गाॅव-गराॅव, पेड़-पौधे,पशु-पक्षी ,लोकगीत-नृत्य,बाजे-गाजे,नर-नारी सभी अपने नामों के साथ कविता में आते हैं।ऐसा लगता है जैसे कि पाठक स्वयं इन अंचलों की सैर कर रहा हो। अपने जन और जनपद से गहरी रागात्मकता रखने वाले कवि ही ऐसा प्रभाव पैदा कर सकते हैं। इनके लिए स्थानीयता का मतलब अपने जनपद या अंचल को शेष विश्व के खिलाफ खड़ा करना नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व में उसकी पहचान स्थापित करना  तथा अपने अंचल के लोक के माध्यम से पूरे वैश्विक लोक की पीड़ा और संघर्ष को मूर्त रूप में सामने लाना है। पाब्लो नेरुदा ,नाजिम हिकमत ,रसूल हमजातोव ,सारोवीवा ,काजी नजरूल इस्लाम,महमूद दरवेश आदि कवियों ने यही काम किया । हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लोक किसी भी अंचल या जनपद का हो उसकी स्थिति या संघर्ष कमोबेश एक समान ही होता है।इसलिए नागार्जुन अपनी कविता में जिस लोक को संबोधित करते हैं वह देश-देशांतर तक फैला और अपनी मुक्ति के लिए संघर्षरत लोक है । किसी देश या क्षेत्र की भौगोलिक सीमाओं में बंधा लोक न होकर धरती मात्र का लोक है। ये एक खास धरती के माध्यम से धरती मात्र की कथा कहना चाहते हैं।इनके सरोकार भी एक खास अंचल के मनुष्य और उनके जीवन से न होकर मनुष्य मात्र से हैं। ये कवि अपने अंचल और लोक को किसी भावुकता के साथ नहीं  बल्कि पूरी द्वंद्वात्मकता के साथ देखते हैं।लोक की कमजोरियों को रेखांकित करने से भी नहीं चूकते हैं। साथ ही उसकी आलोचना से भी ।  

नागार्जुन की कविताओं में काफी सरसता  है जो इनकी कविताओं में आई प्रकृति के चलते है। इनकी कविताओं में प्रकृति के विविध रूप-रंग देखे जा सकते हैं। उस समय रचनारत प्रगतिशील कवियों की कविताओं में जितनी प्रकृति हमें इनके यहाॅ दिखाई देती है केदार और त्रिलोचन को छोड़कर किसी अन्य के यहाॅ नहीं दिखती । प्रकृति उनके लिए अधूरे सपनों की नीड़ या धरती के दुःख-दर्द को भूलकर कोई आरामगाह नहीं रही। इनकी प्रकृतिपरक कविताओं में जीवन का सौंदर्य तथा जीवन का संघर्ष दोनों ही व्यक्त होता है। प्रकृति के माध्यम से भी उन्होंने अपने आसपास की विसंगतियों और विद्रूपताओं पर चोट करने का प्रयास किया। इनके यहाॅ प्रकृति के अनेक सघन एवं सांद्र दृश्य दिखाई देते हैं। नागार्जुन की कविताओं में उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक के प्राकृतिक दूश्य उनकी कविता को बहुरंगी बनाते हैं। वर्षा और बादलों पर इनकी अनेक कविताएं हैं जहाॅ एक ओर बादलों को वे इस रूप में देखते हैं - 

अमल धवल गिरि के शिखरों पर 
बादल को घिरते देख है
छोटे-छोटे मोती जैसे 
उसके शीतल तुहिन कणों को 
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है
 बादलों को घिरते देखा है। 

तो दूसरी ओर -धिन धिन धा धमक धमक मेघ बजे ’ गा उठते हैं। पहाड़ में मौसम के पहले वरदान के रूप में बादल का भिगोना उन्हें बहुत भाता है-बादल भिगो गए रातोरात/सलेटी छतों के/कच्चे-पक्के घरों को/प्रमुदित हैं गिरिजन।नाशपाती का जिक्र उनकी कविताओं में बार-बार आता है। कहीं ग्रीष्म में उसकी छाया में बैठे -

फलवाली प्रजाति का यह तरुण तरु
आज मुझे बिल्कुल नया-नया लगता है
ताम्रवर्णी पत्तियोंवाली टहनियाॅ
चाॅदी के फूलों से ढक गई हैं
लगता ही नहीं कि यह वही पेड़ है!

और कहीं डियर तोता राम द्वारा उल्टा लटकर नासपाती को कुतरते हुए । चमक भरता हुआ सूर्य ,फिसल रही चाॅदनी ,शिशिर की निशा ,सिके हुए दो भुट्टे ,नीम की दो टहनियाॅ , इनकी कविताओं में अनूठे अंदाज में आते हैं। यह कपूरी धूप/शिशिर की यह दुपहरी ,यह प्रकृति का उल्लास /रोम-रोम बुझा लेगा ताजगी की प्यास । प्रकृति के ये रूप सहृदय के मन में अॅट-अॅट जाते हैं। पढ़ने वाले को अपनी खबरिया नहीं रहती। इन प्रकृति चित्रों में गहरी एंेद्रिकता और सूक्ष्म सौंदर्य दृष्टि दिखाई  देती है। इनसे गुजरते हुए लगता है जैसे हम कविता पढ़ नहीं प्रकृति के उन सुरम्य चित्रों को देख-सुन रहे हैं। प्रकृति की हर लीला को एक अलग ही नजरिए से देखने की दृष्टि है इनमें । फिर भला वे लोकप्रिय क्यों ना हों? एक जन संबद्ध कवि ही बहुत दिनों बाद अपने लोगों और अपनी धरती की गंध-रूप-रस-शब्द-स्पर्श पाकर इतना प्रमुदित हो सकता है-

बहुत दिनों के बाद 
अब की मैंने जी-भर देखी
पकी-सुनहली फसलों की मुसकान
.......अब की मैं जी-भर सुन पाया 
धान कूटती किशोरियों की कोकिल कंठी तान 
......अबकी मैं ने जी-भर सॅूघे 
 मौलसिरी के ढेर-ढेर से ताजे-टटके फूल
बहुत दिनों के बाद।

 वे प्रकृति को एक किसान की नजर से देखते हैं।किसान सी आत्मीयता झलकती है इनकी प्रकृति चित्रों में।
  
नागार्जुन ने केदार बाबू पर एक कविता लिखी है जिसमें वह कहते हैं-

 कुपित कृषक की टेड़ी भौहें ,वह भी तुम हो 
 खड़ी सुनहरी फसलों की छटा निराली 
 वह भी तुम हो 
 लाठी लेकर काल रात्रि में करता जो उनकी रखवाली 
वह भी तुम हो 
 जन-गण-मन के जाग्रत शिल्पी 
 तुम धरती के पुत्र गगन के तुम जामाता 
 नक्षत्रों के स्वजन कुटंबी ,सगे बंधु तुम 
नद नदियों के तुम।

ये पंक्तियाँ भले ही केदार बाबू के लिए लिखी गई हों लेकिन स्वयं नागार्जुन पर भी सटीक बैठती हैं। ये दोनों कवि जन-गण-मन के जाग्रत शिल्पी हैं। धरती के पुत्र हैं जो कालरात्रि में उसकी रखवाली करते हैं। इनकी कविताएं जनता के यथार्थ बोध को जाग्रत कर उसकी चेतना का विस्तार करते हुए जनता के मुक्ति संघर्ष को शक्ति और दिशा देती हैं।ये छायाप्रतीतियों को बेधकर सारतत्व को बताती हैं।इनमें क्रियाशील सामान्यजन के सजीव चित्र हैं। कविताओं में व्यक्त वैचारिक रुझान अपने समय के गर्भ से उपजा लगता है। अपने समय और समाज की जनता की इच्छाओं, भावनाओं, जीवन उद्देश्यों और संघर्षों को अभिव्यक्त करने के कारण ही नागार्जुन की कविताएं लोकप्रिय हैं और इन्हें जनकवि होने का सम्मान प्राप्त है। 
         




महेश पुनेठा अभी के चर्चित कवि और समी‍क्षक हैं. हिंदी की प्रतिनिधि पत्रिकाओं में लगातार कविताऐं और कविता समीक्षाएं प्रकाशित.  'भय अतल में' नाम से इनका एक कविता संग्रह काफी पसंद किया गया. इंटरनेट में इनसे punetha.mahesh@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.